समास क्या है? समास की परिभाषा, भेद, प्रकार, उदाहरण, समास विग्रह और अंतर

समास-samas-Hindistack
Contents
  1. 1 समास किसे कहते हैं?
  2. 2 समास-विग्रह क्या है?
  3. 3 समास के कितने प्रकार होते हैं?
  4. 4 समास के मुख्य प्रकार
  5. 5 अव्ययीभाव समास
  6. 6 तत्पुरुष समास
  7. 7 निम्नलिखित सामासिक शब्दों का समास-विग्रह तथा तत्पुरुष समास का भेद लिखिए।
  8. 8 सही विकल्प चुनिए।
  9. 9 रिक्त स्थान भरिए।
  10. 10 उत्तर
  11. 11 निम्नलिखित तत्पुरुष समासों का प्रकार पहचानिए।
  12. 12 उत्तर
  13. 13 निम्नलिखित का मिलान कीजिए।
  14. 14 उत्तर
  15. 15 निम्नलिखित सामासिक शब्दों का समास-विग्रह कीजिए तथा बताइए कि इनमें कौन-सी विभक्ति का लोप हुआ है।
  16. 16 1. केवल शब्द देखकर समास का प्रकार तय कर देना
  17. 17 2. समास-विग्रह किए बिना उत्तर लिख देना
  18. 18 3. “से” देखकर हमेशा करण तत्पुरुष मान लेना
  19. 19 4. “का” और “के लिए” में भ्रम कर देना
  20. 20 5. स्थान और साधन में अंतर न समझ पाना

हिन्दी भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है कि यह कम शब्दों में अधिक अर्थ व्यक्त करने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता, प्रशासनिक भाषा तथा दैनिक व्यवहार में अनेक ऐसे शब्द मिलते हैं जो वास्तव में दो या दो से अधिक शब्दों के संयोग से बने होते हैं। इन शब्दों का प्रयोग न केवल भाषा को संक्षिप्त बनाता है, बल्कि उसे अधिक प्रभावशाली, स्पष्ट और अभिव्यक्तिपूर्ण भी बनाता है।

यदि प्रत्येक बात को विस्तार से लिखा जाए, तो भाषा अनावश्यक रूप से लंबी और बोझिल हो जाती है। उदाहरण के लिए “राजा का पुत्र” कहने के स्थान पर केवल “राजपुत्र”, “शक्ति के अनुसार” के स्थान पर “यथाशक्ति”, तथा “माता और पिता” के स्थान पर “माता-पिता” कहना अधिक सहज और प्रभावी माना जाता है। यह संक्षिप्तीकरण किसी संयोगवश नहीं होता, बल्कि हिन्दी व्याकरण के एक सुव्यवस्थित नियम के अनुसार होता है, जिसे समास कहा जाता है।

यही कारण है कि समास को केवल व्याकरण का एक अध्याय नहीं माना जाता, बल्कि भाषा को सरल, प्रभावशाली और अर्थपूर्ण बनाने वाली एक महत्वपूर्ण शब्द-रचना प्रक्रिया (Word Formation Process) माना जाता है। हिन्दी के अधिकांश साहित्यिक ग्रंथों, समाचार-पत्रों, प्रशासनिक दस्तावेज़ों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में सामासिक शब्दों का व्यापक प्रयोग देखने को मिलता है। इसलिए समास का सही ज्ञान केवल परीक्षा की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि शुद्ध एवं प्रभावी हिन्दी लेखन के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

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Samas | hindi stack

समास किसे कहते हैं?

जब दो या दो से अधिक परस्पर संबंधित शब्द मिलकर एक नया, संक्षिप्त तथा सार्थक शब्द बनाते हैं, तब उस प्रक्रिया को समास कहा जाता है। समास द्वारा निर्मित नया शब्द अपने मूल शब्दों की अपेक्षा छोटा होता है, लेकिन उसका अर्थ पूर्णतः सुरक्षित रहता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो समास भाषा में अर्थ की हानि किए बिना शब्दों का संक्षिप्तीकरण करने की प्रक्रिया है।

व्याकरण की दृष्टि से समास केवल शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी संरचनात्मक प्रक्रिया है जिसमें दो या अधिक पदों के बीच प्रयुक्त विभक्तियाँ या संबंधसूचक शब्द लुप्त हो जाते हैं और उनके स्थान पर एक नया सामासिक शब्द निर्मित हो जाता है।

उदाहरण के लिए—

  • राजा का पुत्र → राजपुत्र
  • विद्या के लिए आलय → विद्यालय
  • माता और पिता → माता-पिता
  • शक्ति के अनुसार → यथाशक्ति

यदि इन उदाहरणों को ध्यान से देखा जाए, तो स्पष्ट होगा कि मूल वाक्यांशों में प्रयुक्त “का”, “के लिए”, “और”, “के अनुसार” जैसे शब्द समास बनने पर दिखाई नहीं देते, लेकिन उनका अर्थ पूर्ण रूप से बना रहता है। यही समास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।

समास का शाब्दिक अर्थ

“समास” शब्द संस्कृत धातु से बना है, जिसका सामान्य अर्थ संक्षेप, संक्षिप्तीकरण, एकत्र करना अथवा छोटा रूप प्रदान करना माना जाता है। व्याकरण में भी इसका अर्थ यही है कि अनेक शब्दों को मिलाकर एक ऐसा नया शब्द बनाया जाए जो अर्थ की दृष्टि से पूर्ण हो और भाषा को अधिक प्रभावशाली बनाए।

समास का उद्देश्य केवल शब्दों की संख्या कम करना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य भाषा को अधिक व्यवस्थित, सुस्पष्ट और प्रभावी बनाना है। यदि समास का प्रयोग न किया जाए, तो अनेक सामान्य वाक्यांश अनावश्यक रूप से लंबे हो जाएंगे।

नीचे दी गई सारणी इस अंतर को स्पष्ट करती है—

बिना समाससमास के बाद
राजा का पुत्रराजपुत्र
विद्या के लिए आलयविद्यालय
शक्ति के अनुसारयथाशक्ति
माता और पितामाता-पिता
चार राहों का समूहचौराहा

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि समास बनने के बाद शब्द आकार में छोटे हो गए हैं, किन्तु उनके अर्थ में कोई कमी नहीं आई। यही कारण है कि हिन्दी भाषा में समास का प्रयोग अत्यंत व्यापक है।

समास को समझना क्यों आवश्यक है?

समास का अध्ययन केवल इसलिए नहीं किया जाता कि यह हिन्दी व्याकरण का एक अध्याय है। वास्तव में समास का ज्ञान भाषा की संरचना को समझने की आधारशिला है। यदि किसी विद्यार्थी को सामासिक शब्दों का सही ज्ञान नहीं है, तो वह न तो उनका सही विग्रह कर पाएगा और न ही उनका सही अर्थ समझ सकेगा।

हिन्दी साहित्य में प्रयुक्त अधिकांश प्रमुख शब्द किसी न किसी प्रकार के समास से बने होते हैं। उदाहरण के लिए राजपुत्र, राष्ट्रपति, जलमग्न, नीलकमल, दशानन, चतुर्भुज, गंगाजल, प्रतिदिन, पंचवटी आदि शब्द सामान्य रूप से पढ़ने में आते हैं। इनका सही अर्थ तभी समझा जा सकता है जब उनके निर्माण की प्रक्रिया स्पष्ट हो।

इसी प्रकार प्रतियोगी परीक्षाओं में समास से जुड़े प्रश्न केवल परिभाषा तक सीमित नहीं रहते। अनेक बार किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह, समास का प्रकार, तत्पुरुष का उपभेद, दो समासों के बीच का अंतर अथवा संदर्भ के अनुसार बदलने वाले समासों की पहचान भी पूछी जाती है। इसलिए समास की मूल अवधारणा जितनी स्पष्ट होगी, आगे के सभी प्रकारों को समझना उतना ही सरल होगा।

समास की रचना

समास की मूल अवधारणा को समझने के बाद अगला महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि आखिर दो या दो से अधिक स्वतंत्र शब्द मिलकर एक नया सामासिक शब्द कैसे बनाते हैं। केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं है कि समास शब्दों का संक्षिप्तीकरण है, बल्कि यह समझना भी आवश्यक है कि यह संक्षिप्तीकरण किस नियम के अनुसार होता है।

समास की रचना एक निश्चित व्याकरणिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में दो या दो से अधिक परस्पर संबंधित शब्दों को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि उनके बीच प्रयुक्त विभक्ति, परसर्ग अथवा संबंधसूचक शब्दों का लोप हो जाता है, जबकि उनका मूल अर्थ सुरक्षित रहता है। परिणामस्वरूप एक नया, छोटा और अधिक प्रभावशाली शब्द बनता है, जिसे समस्त पद या सामासिक शब्द कहा जाता है।

उदाहरण के लिए यदि हम “राजा का पुत्र” वाक्यांश को देखें, तो यहाँ “राजा” और “पुत्र” दो स्वतंत्र शब्द हैं, जिनके बीच “का” संबंधसूचक शब्द प्रयुक्त हुआ है। समास बनने पर यही “का” लुप्त हो जाता है और नया शब्द राजपुत्र बन जाता है।

इसी प्रकार “विद्या के लिए आलय” का संक्षिप्त रूप विद्यालय, “हाथ से लिखित” का संक्षिप्त रूप हस्तलिखित, तथा “माता और पिता” का संक्षिप्त रूप माता-पिता बन जाता है।

इस प्रक्रिया को निम्न सारणी के माध्यम से और अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है—

मूल शब्द समूहलुप्त होने वाला शब्दसमस्त पद
राजा का पुत्रकाराजपुत्र
विद्या के लिए आलयके लिएविद्यालय
हाथ से लिखितसेहस्तलिखित
माता और पिताऔरमाता-पिता
शक्ति के अनुसारके अनुसारयथाशक्ति

ऊपर दिए गए प्रत्येक उदाहरण में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि समास बनने के बाद बीच का संबंधसूचक शब्द हट गया है, लेकिन अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। यही समास-रचना का मूल सिद्धांत है।

समास की रचना किन-किन तत्वों से मिलकर होती है?

समास की प्रक्रिया को सही प्रकार से समझने के लिए उसके प्रमुख घटकों (Components) का ज्ञान आवश्यक है। प्रत्येक सामासिक शब्द कुछ निश्चित पदों से मिलकर बनता है। यदि इन पदों की भूमिका स्पष्ट हो जाए, तो आगे समास के सभी प्रकारों को समझना अत्यंत सरल हो जाता है।

समास की रचना मुख्य रूप से निम्नलिखित घटकों पर आधारित होती है—

घटकअर्थ
पूर्वपदसमास का पहला शब्द
उत्तरपदसमास का दूसरा शब्द
समस्त पददोनों पदों से मिलकर बना नया शब्द
सामासिक शब्दसमस्त पद का दूसरा नाम
समास-विग्रहसमस्त पद को पुनः अलग-अलग शब्दों में विभाजित करना

इन पाँचों शब्दों का प्रयोग पूरे समास अध्याय में बार-बार होता है। इसलिए आगे बढ़ने से पहले इनका अर्थ अच्छी तरह समझ लेना आवश्यक है।

समास बनने की प्रक्रिया को चरणबद्ध ढंग से समझें

कई विद्यार्थियों को यह भ्रम रहता है कि समास केवल दो शब्दों को जोड़ देने से बन जाता है। वास्तव में ऐसा नहीं है। समास बनने की एक निश्चित क्रमबद्ध प्रक्रिया होती है।

नीचे इस पूरी प्रक्रिया को क्रमवार प्रस्तुत किया गया है—

चरणक्या होता है?
पहलादो या दो से अधिक संबंधित शब्द लिए जाते हैं।
दूसराउनके बीच का संबंध निर्धारित किया जाता है।
तीसरासंबंधसूचक विभक्ति या परसर्ग का लोप होता है।
चौथाशब्दों को जोड़कर नया सामासिक शब्द बनाया जाता है।
पाँचवाँनया शब्द पहले की अपेक्षा छोटा, स्पष्ट और अर्थपूर्ण बन जाता है।

यदि इस प्रक्रिया को “राजा का पुत्र” के उदाहरण से समझें, तो क्रम इस प्रकार होगा—

राजा + का + पुत्र

“का” का लोप

राजपुत्र

यही प्रक्रिया समास-निर्माण का मूल आधार है।

क्या समास में हमेशा विभक्ति का लोप होता है?

अधिकांश सामासिक शब्दों में दो पदों के बीच प्रयुक्त विभक्ति या परसर्ग का लोप हो जाता है। यही कारण है कि समास को संक्षिप्तीकरण की प्रक्रिया कहा जाता है।

उदाहरण के लिए—

  • राजा का पुत्र → राजपुत्र
  • जल में मग्न → जलमग्न
  • हाथ से लिखित → हस्तलिखित
  • विद्या के लिए आलय → विद्यालय

इन सभी उदाहरणों में विभक्ति या परसर्ग हट गया है।

हालाँकि, हिन्दी और विशेषकर संस्कृत व्याकरण में कुछ ऐसे सामासिक शब्द भी मिलते हैं जहाँ विभक्ति का पूर्ण लोप नहीं होता या शब्द की संरचना सामान्य नियमों से थोड़ी भिन्न होती है। ऐसे उदाहरण अपेक्षाकृत कम हैं और उच्च स्तर के व्याकरण में विस्तार से पढ़ाए जाते हैं। सामान्य अध्ययन तथा अधिकांश परीक्षाओं के लिए यह समझना पर्याप्त है कि समास बनने की प्रक्रिया में सामान्यतः विभक्ति या संबंधसूचक शब्द लुप्त हो जाते हैं।

समास-रचना को एक उदाहरण से विस्तार से समझें

मान लीजिए हमारे पास वाक्यांश है—

“रसोई के लिए घर”

सबसे पहले इसमें दो मुख्य शब्दों की पहचान की जाती है—

  • रसोई
  • घर

इन दोनों के बीच “के लिए” संबंधसूचक पद प्रयुक्त हुआ है। समास बनने पर “के लिए” हट जाता है और नया शब्द रसोईघर बनता है।

इसी प्रकार—

“घोड़ों की दौड़”

“की” का लोप

घुड़दौड़

और

“भय से भीत”

“से” का लोप

भयभीत

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि समास केवल शब्दों को जोड़ने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि संबंधसूचक पदों के लोप के बाद अर्थपूर्ण नए शब्द का निर्माण है।

समास-रचना को समझना आगे क्यों आवश्यक है?

समास के छह प्रकारों का अध्ययन करने से पहले यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि सामासिक शब्द बनते कैसे हैं। यदि यह आधार स्पष्ट नहीं होगा, तो आगे चलकर पूर्वपद, उत्तरपद, समस्त पद, समास-विग्रह, तत्पुरुष के उपभेद तथा विभिन्न समासों की पहचान करते समय भ्रम उत्पन्न हो सकता है।

इसी कारण हिन्दी व्याकरण में समास के प्रकारों का अध्ययन करने से पहले उसकी रचना और संरचना को समझाया जाता है। एक बार यह आधार स्पष्ट हो जाने पर आगे आने वाले सभी समास—चाहे वे अव्ययीभाव हों, तत्पुरुष हों या बहुव्रीहि—अधिक सरल और तार्किक प्रतीत होने लगते हैं।

अब जबकि समास बनने की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट हो चुकी है, अगला चरण उन मूल शब्दों को समझना है जिनसे प्रत्येक सामासिक शब्द का निर्माण होता है। इसलिए अगले भाग में हम पूर्वपद, उत्तरपद, समस्त पद तथा सामासिक शब्द की अवधारणाओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे, क्योंकि यही पूरे समास अध्याय की आधारशिला हैं।

समास की रचना को समझने के बाद अब उन मूल घटकों (Basic Components) को समझना आवश्यक है, जिनके आधार पर प्रत्येक सामासिक शब्द का निर्माण होता है। वास्तव में समास की पूरी प्रक्रिया इन्हीं घटकों के इर्द-गिर्द घूमती है। यदि पूर्वपद, उत्तरपद, समस्त पद और सामासिक शब्द का अर्थ स्पष्ट हो जाए, तो आगे समास के सभी प्रकारों की पहचान करना बहुत आसान हो जाता है।

कई बार विद्यार्थी समास के प्रकार तो याद कर लेते हैं, लेकिन इन आधारभूत शब्दों का अंतर स्पष्ट नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप समास-विग्रह करते समय या किसी सामासिक शब्द का विश्लेषण करते समय भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसलिए आगे बढ़ने से पहले इन सभी शब्दों को विस्तार से समझना आवश्यक है।

पूर्वपद क्या होता है?

समास बनने वाले शब्द का पहला भाग पूर्वपद कहलाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो समास की रचना में सबसे पहले आने वाला पद पूर्वपद होता है।

यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक समास में पूर्वपद ही प्रधान हो। कुछ समासों में पूर्वपद का महत्व अधिक होता है, जबकि कुछ में उसका महत्व गौण हो जाता है। इसलिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि पहला शब्द पूर्वपद है, बल्कि यह भी समझना आवश्यक है कि अलग-अलग समासों में उसकी भूमिका बदल सकती है।

उदाहरण देखें—

सामासिक शब्दपूर्वपद
राजपुत्रराज
विद्यालयविद्या
यथाशक्तियथा
माता-पितामाता
पंचवटीपंच

इन उदाहरणों में प्रत्येक शब्द का पहला भाग पूर्वपद है। आगे जब हम समास के प्रकार पढ़ेंगे, तब यह भी समझेंगे कि किन समासों में पूर्वपद प्रधान होता है और किनमें नहीं।

उत्तरपद क्या होता है?

समास में आने वाला दूसरा पद उत्तरपद कहलाता है। यह समास का अंतिम भाग होता है और अनेक समासों में यही मुख्य अर्थ का वाहक भी होता है।

विशेष रूप से तत्पुरुष, कर्मधारय और द्विगु समासों में उत्तरपद का महत्व अधिक होता है। यही कारण है कि इन समासों की पहचान करते समय उत्तरपद की भूमिका को विशेष रूप से देखा जाता है।

उदाहरण—

सामासिक शब्दउत्तरपद
राजपुत्रपुत्र
विद्यालयआलय
जलमग्नमग्न
नीलकमलकमल
पंचवटीवटी

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि प्रत्येक सामासिक शब्द का अंतिम भाग उत्तरपद कहलाता है।

पूर्वपद और उत्तरपद को एक साथ समझें

अब तक आपने पूर्वपद और उत्तरपद को अलग-अलग समझा। अब दोनों को एक साथ देखने पर इनकी भूमिका और स्पष्ट हो जाती है।

सामासिक शब्दपूर्वपदउत्तरपद
राजपुत्रराजपुत्र
विद्यालयविद्याआलय
रसोईघररसोईघर
यथाशक्तियथाशक्ति
माता-पितामातापिता
नीलकमलनीलकमल

यदि इस सारणी का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए, तो यह समझना आसान हो जाता है कि किसी भी सामासिक शब्द में पहला भाग पूर्वपद और दूसरा भाग उत्तरपद कहलाता है। यही दोनों मिलकर आगे समस्त पद का निर्माण करते हैं।

समस्त पद क्या होता है?

जब पूर्वपद और उत्तरपद आपस में मिलकर एक नया शब्द बनाते हैं, तो उस नए शब्द को समस्त पद कहा जाता है। अर्थात् समास बनने के बाद जो अंतिम शब्द प्राप्त होता है, वही समस्त पद होता है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझते हैं।

राज + पुत्र

राजपुत्र

यहाँ—

  • राज = पूर्वपद
  • पुत्र = उत्तरपद
  • राजपुत्र = समस्त पद

इसी प्रकार—

विद्या + आलय

विद्यालय

यहाँ—

  • विद्या = पूर्वपद
  • आलय = उत्तरपद
  • विद्यालय = समस्त पद

इसी नियम का पालन प्रत्येक सामासिक शब्द में होता है।

सामासिक शब्द क्या होता है?

समास के नियमों द्वारा निर्मित प्रत्येक नया शब्द सामासिक शब्द कहलाता है। व्याकरण की दृष्टि से सामासिक शब्द और समस्त पद दोनों लगभग समान अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।

अर्थात्—

  • राजपुत्र एक सामासिक शब्द है।
  • विद्यालय एक सामासिक शब्द है।
  • माता-पिता एक सामासिक शब्द है।
  • पंचवटी एक सामासिक शब्द है।
  • नीलकमल एक सामासिक शब्द है।

व्याकरण की पुस्तकों में कहीं “समस्त पद” शब्द मिलता है, तो कहीं “सामासिक शब्द”। व्यवहार में दोनों का आशय एक ही होता है।

चारों शब्दों का संबंध एक साथ समझें

अब तक पढ़े गए सभी शब्दों को यदि एक साथ देखा जाए, तो पूरी प्रक्रिया अत्यंत सरल दिखाई देती है।

पूर्वपदउत्तरपदसमस्त पद / सामासिक शब्द
राजपुत्रराजपुत्र
विद्याआलयविद्यालय
रसोईघररसोईघर
मातापितामाता-पिता
नीलकमलनीलकमल
पंचवटीपंचवटी

यह सारणी पूरे समास अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत सारणियों में से एक है। यदि विद्यार्थी इसे अच्छी तरह समझ ले, तो आगे समास-विग्रह तथा समास की पहचान करना बहुत सरल हो जाता है।

क्या प्रत्येक समास में पूर्वपद और उत्तरपद का महत्व समान होता है?

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है।

यद्यपि प्रत्येक सामासिक शब्द में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों होते हैं, लेकिन सभी समासों में दोनों की प्रधानता समान नहीं होती।

किसी समास में पहला पद प्रधान होता है, किसी में दूसरा पद, किसी में दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि कुछ समासों में दोनों पद मिलकर किसी तीसरे अर्थ की ओर संकेत करते हैं।

इसी आधार पर समासों का वर्गीकरण किया गया है।

नीचे दी गई सारणी इस तथ्य को संक्षेप में स्पष्ट करती है—

समासप्रधान पद
अव्ययीभावपूर्वपद
तत्पुरुषउत्तरपद
कर्मधारयउत्तरपद
द्विगुउत्तरपद
द्वंद्वदोनों पद
बहुव्रीहिकोई भी नहीं (तीसरा अर्थ प्रधान)

अभी इस सारणी को केवल एक परिचय के रूप में समझना पर्याप्त है। आगे जब प्रत्येक समास का विस्तार से अध्ययन करेंगे, तब इन सभी बिंदुओं को उदाहरण सहित समझेंगे।

इन अवधारणाओं को समझना क्यों आवश्यक है?

समास के अधिकांश प्रश्न—चाहे वे समास-विग्रह से संबंधित हों, समास की पहचान से जुड़े हों या विभिन्न समासों के बीच अंतर पर आधारित हों—इन्हीं मूल अवधारणाओं पर आधारित होते हैं।

यदि विद्यार्थी यह पहचानना सीख जाए कि किसी सामासिक शब्द में पूर्वपद कौन-सा है, उत्तरपद कौन-सा है और समस्त पद किसे कहते हैं, तो आगे समास के प्रकारों को समझने में उसे किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती।

इसी कारण हिन्दी व्याकरण में समास के प्रकारों का अध्ययन प्रारम्भ करने से पहले इन आधारभूत शब्दों की स्पष्ट समझ विकसित करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

अब जबकि समास की संरचना पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है, अगला चरण उस प्रक्रिया को समझना है जिसके माध्यम से किसी सामासिक शब्द को पुनः उसके मूल शब्दों में विभाजित किया जाता है। इसी प्रक्रिया को समास-विग्रह कहा जाता है, और आगे समास के प्रत्येक प्रकार की पहचान में इसकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

समास-विग्रह क्या है?

अब तक आपने यह समझ लिया कि समास कैसे बनता है, पूर्वपद और उत्तरपद क्या होते हैं तथा दोनों के मेल से समस्त पद या सामासिक शब्द का निर्माण कैसे होता है। लेकिन समास का अध्ययन यहीं समाप्त नहीं होता। जितना महत्वपूर्ण सामासिक शब्द बनाना है, उतना ही महत्वपूर्ण उसे पुनः उसके मूल रूप में समझना भी है।

यही कार्य समास-विग्रह के माध्यम से किया जाता है।

वास्तव में समास और समास-विग्रह एक-दूसरे की पूरक प्रक्रियाएँ हैं। जहाँ समास कई शब्दों को मिलाकर एक नया शब्द बनाता है, वहीं समास-विग्रह उसी सामासिक शब्द को पुनः उसके मूल शब्दों में विभाजित करके उनके बीच छिपे हुए संबंध को स्पष्ट करता है। इसलिए यदि समास को “संक्षेप” कहा जाए, तो समास-विग्रह को उसका “विस्तार” कहा जा सकता है।

समास-विग्रह की परिभाषा

किसी सामासिक शब्द को उसके मूल शब्दों में विभाजित करके उनके बीच छिपे हुए संबंध, विभक्ति या परसर्ग को स्पष्ट करने की प्रक्रिया को समास-विग्रह कहते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो—

समस्त पद को उसके मूल रूप में वापस लिखना ही समास-विग्रह है।

उदाहरण के लिए—

  • राजपुत्र → राजा का पुत्र
  • विद्यालय → विद्या के लिए आलय
  • जलमग्न → जल में मग्न
  • यथाशक्ति → शक्ति के अनुसार
  • माता-पिता → माता और पिता

इन सभी उदाहरणों में सामासिक शब्द को उसके मूल वाक्यांश में परिवर्तित किया गया है। यही समास-विग्रह कहलाता है।

समास और समास-विग्रह का संबंध

समास और समास-विग्रह को अलग-अलग नहीं समझा जा सकता। दोनों एक ही प्रक्रिया के दो विपरीत पक्ष हैं। समास में शब्द छोटे होते हैं, जबकि समास-विग्रह में वही शब्द पुनः विस्तृत रूप में लिखे जाते हैं। इसे निम्न सारणी से आसानी से समझा जा सकता है—

समास (संक्षिप्त रूप)समास-विग्रह (विस्तृत रूप)
राजपुत्रराजा का पुत्र
विद्यालयविद्या के लिए आलय
हस्तलिखितहाथ से लिखित
जलमग्नजल में मग्न
माता-पितामाता और पिता
पंचवटीपाँच वटों का समूह

यदि ध्यान से देखा जाए, तो प्रत्येक समास-विग्रह में वह शब्द या विभक्ति पुनः दिखाई देती है जो समास बनाते समय लुप्त हो गई थी।

समास-विग्रह क्यों आवश्यक है?

कई विद्यार्थी सीधे समास का प्रकार याद करने का प्रयास करते हैं, जबकि सही तरीका इसके बिल्कुल विपरीत है।

समास की पहचान करने का सबसे विश्वसनीय तरीका पहले समास-विग्रह करना है। जब विग्रह सही होगा, तभी यह स्पष्ट होगा कि शब्दों के बीच कौन-सा संबंध है और उसी आधार पर समास का प्रकार निर्धारित किया जाएगा।

उदाहरण के लिए यदि “राजपुत्र” का विग्रह “राजा का पुत्र” है, तो “का” के आधार पर यह सम्बन्ध तत्पुरुष सिद्ध होता है। यदि “माता-पिता” का विग्रह “माता और पिता” है, तो “और” के आधार पर यह द्वंद्व समास होगा। इसी प्रकार “यथाशक्ति” का विग्रह “शक्ति के अनुसार” होने के कारण यह अव्ययीभाव समास माना जाएगा।

अर्थात्—

सही समास की पहचान का पहला चरण हमेशा सही समास-विग्रह होता है।

समास-विग्रह करने की चरणबद्ध विधि

किसी भी सामासिक शब्द का विग्रह करते समय एक निश्चित क्रम अपनाना चाहिए। यदि यह क्रम स्पष्ट हो जाए, तो कठिन से कठिन सामासिक शब्द का भी सही विश्लेषण किया जा सकता है।

नीचे समास-विग्रह की पूरी प्रक्रिया क्रमवार दी गई है—

चरणक्या करना है?
पहलासामासिक शब्द को ध्यान से पढ़ें।
दूसरापूर्वपद और उत्तरपद की पहचान करें।
तीसरादोनों पदों के बीच छिपे संबंध का अनुमान लगाएँ।
चौथाउचित विभक्ति या परसर्ग जोड़ें।
पाँचवाँपूर्ण एवं अर्थपूर्ण विग्रह लिखें।

यह क्रम अभ्यास के साथ अत्यंत सरल हो जाता है और आगे समास के सभी प्रकारों की पहचान में सहायता करता है।

समास-विग्रह के उदाहरण

अब कुछ प्रमुख सामासिक शब्दों का विग्रह क्रमवार देखते हैं—

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
राजपुत्रराजा का पुत्र
विद्यालयविद्या के लिए आलय
हस्तलिखितहाथ से लिखित
पथभ्रष्टपथ से भ्रष्ट
जलमग्नजल में मग्न
प्रतिदिनप्रत्येक दिन
यथाशक्तिशक्ति के अनुसार
माता-पितामाता और पिता
पंचवटीपाँच वटों का समूह
नीलकमलनीला है जो कमल
दशाननदस हैं आनन जिसके (रावण)

इन उदाहरणों को देखने से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक समास-विग्रह में कोई-न-कोई संबंधसूचक शब्द अवश्य जुड़ता है। यही संबंध आगे समास की पहचान का आधार बनता है।

समास-विग्रह करते समय किन बातों का ध्यान रखें?

समास-विग्रह केवल शब्दों को अलग-अलग लिख देना नहीं है। यदि संबंधसूचक शब्द गलत लिख दिया जाए, तो समास का प्रकार भी बदल सकता है। इसलिए कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।

ध्यान रखने योग्य बातकारण
विग्रह हमेशा अर्थपूर्ण होना चाहिए।केवल शब्द अलग करना पर्याप्त नहीं है।
उचित विभक्ति का प्रयोग करें।यही समास का प्रकार निर्धारित करती है।
शब्द का वास्तविक अर्थ समझें।संदर्भ बदलने पर समास भी बदल सकता है।
केवल रटकर उत्तर न दें।पहले विग्रह, फिर समास पहचानें।

क्या एक ही शब्द का एक से अधिक समास-विग्रह हो सकता है?

यह समास का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है और यहीं से उच्च स्तर के प्रश्न पूछे जाते हैं। कुछ सामासिक शब्द ऐसे होते हैं जिनका समास-विग्रह संदर्भ के अनुसार बदल सकता है। परिणामस्वरूप उनका समास भी बदल जाता है। उदाहरण के लिए—

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसमास
नीलकंठनीला है जो कंठकर्मधारय
नीलकंठनीला कंठ है जिसका (शिव)बहुव्रीहि
पीताम्बरपीला है जो अम्बर (वस्त्र)कर्मधारय
पीताम्बरपीले वस्त्र धारण करने वाले श्रीकृष्णबहुव्रीहि
त्रिनेत्रतीन नेत्रों का समूहद्विगु
त्रिनेत्रतीन नेत्र हैं जिसके (शिव)बहुव्रीहि

इसी कारण समास-विग्रह करते समय केवल शब्द नहीं, बल्कि अर्थ और संदर्भ दोनों को समझना आवश्यक होता है।

समास-विग्रह का अभ्यास क्यों आवश्यक है?

समास अध्याय का अधिकांश भाग समास-विग्रह पर आधारित है। यदि विद्यार्थी किसी भी सामासिक शब्द का सही विग्रह करना सीख जाए, तो उसके लिए समास की पहचान, तत्पुरुष के उपभेद, कर्मधारय और बहुव्रीहि का अंतर तथा वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का समाधान करना बहुत सरल हो जाता है।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो—

समास-विग्रह समास अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत कौशल (Core Skill) है।

यही कारण है कि अधिकांश व्याकरणाचार्य समास का अध्ययन हमेशा समास-विग्रह के अभ्यास के साथ करने की सलाह देते हैं।

अब जबकि समास की रचना, उसके घटक और समास-विग्रह की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट हो चुकी है, अगला स्वाभाविक चरण समासों के वर्गीकरण को समझना है। आगे हम विस्तार से जानेंगे कि समास के कितने प्रकार होते हैं, उनका आधार क्या है और प्रत्येक प्रकार की अपनी विशिष्ट पहचान क्या होती है। यही आधार आगे पूरे समास अध्याय को व्यवस्थित रूप से समझने में हमारी सहायता करेगा।

समास के कितने प्रकार होते हैं?

अब तक हमने समास की मूल अवधारणा, उसकी रचना, समस्त पद, पूर्वपद, उत्तरपद तथा समास-विग्रह को विस्तार से समझ लिया है। अब प्रश्न यह उठता है कि सभी सामासिक शब्द एक ही प्रकार से क्यों नहीं बनते? यदि प्रत्येक समास केवल शब्दों को जोड़ने की प्रक्रिया होती, तो सभी शब्दों का निर्माण एक ही नियम के अनुसार होता। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है।

कुछ सामासिक शब्दों में पहला पद अधिक महत्वपूर्ण होता है, कुछ में दूसरा पद प्रधान होता है, कुछ में दोनों पद समान महत्व रखते हैं और कुछ में दोनों पद मिलकर किसी तीसरे अर्थ की ओर संकेत करते हैं। इन्हीं विशेषताओं के आधार पर व्याकरणाचार्यों ने समास का वर्गीकरण किया है।

यही वर्गीकरण हमें यह समझने में सहायता करता है कि किसी सामासिक शब्द का निर्माण किस सिद्धांत पर हुआ है और उसका सही समास-विग्रह तथा समास का प्रकार क्या होगा।

समास के मुख्य प्रकार

हिन्दी व्याकरण में समास के छः प्रमुख प्रकार माने जाते हैं। प्रत्येक प्रकार की अपनी अलग पहचान, संरचना और नियम हैं। किसी भी सामासिक शब्द का सही वर्गीकरण तभी संभव है जब इन सभी प्रकारों की विशेषताओं को क्रमबद्ध रूप से समझा जाए।

समास के छह मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं—

क्रमसमास का प्रकारप्रधान पद
1अव्ययीभाव समासपूर्वपद
2तत्पुरुष समासउत्तरपद
3कर्मधारय समासउत्तरपद
4द्विगु समासउत्तरपद
5द्वंद्व समासदोनों पद
6बहुव्रीहि समासकोई भी पद प्रधान नहीं, अन्य अर्थ प्रधान

यह सारणी केवल नाम याद करने के लिए नहीं है, बल्कि पूरे समास अध्याय का आधार है। आगे जब प्रत्येक समास का विस्तार से अध्ययन करेंगे, तो यही प्रधानता (प्रधान पद) उनकी सबसे बड़ी पहचान बनेगी।

समासों का वर्गीकरण किस आधार पर किया गया है?

यह प्रश्न अक्सर विद्यार्थियों के मन में आता है कि समासों को छह अलग-अलग वर्गों में विभाजित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। इसका उत्तर समास की संरचना में ही छिपा हुआ है।

समास का प्रकार केवल शब्दों के मेल से निर्धारित नहीं होता, बल्कि निम्नलिखित बातों के आधार पर तय होता है—

  • कौन-सा पद प्रधान है?
  • दोनों पदों के बीच किस प्रकार का संबंध है?
  • विग्रह करने पर कौन-सा संबंधसूचक शब्द प्राप्त होता है?
  • क्या समस्त पद किसी समूह का बोध कराता है?
  • क्या दोनों पद समान महत्व रखते हैं?
  • क्या पूरा शब्द किसी तीसरे अर्थ की ओर संकेत करता है?

इन्हीं प्रश्नों के उत्तर यह निर्धारित करते हैं कि कोई सामासिक शब्द किस समास के अंतर्गत आएगा।

प्रत्येक समास की मूल पहचान

अब प्रत्येक समास की मूल विशेषता को एक साथ समझते हैं। इससे आगे के विस्तृत अध्ययन को समझना अधिक सरल हो जाएगा।

समासमुख्य पहचानउदाहरण
अव्ययीभावपहला पद अव्यय एवं प्रधान होता हैयथाशक्ति, प्रतिदिन
तत्पुरुषदूसरा पद प्रधान, विभक्ति का लोपराजपुत्र, विद्यालय
कर्मधारयविशेषण–विशेष्य या उपमान–उपमेय संबंधनीलकमल, चंद्रमुख
द्विगुपहला पद संख्यावाचक, समूह का बोधत्रिलोक, पंचवटी
द्वंद्वदोनों पद समान रूप से प्रधानमाता-पिता, सुख-दुःख
बहुव्रीहिदोनों पद मिलकर किसी अन्य अर्थ का बोध कराते हैंदशानन, नीलकंठ

यदि इस सारणी को ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि प्रत्येक समास की पहचान अलग सिद्धांत पर आधारित है। यही कारण है कि केवल उदाहरण याद कर लेना पर्याप्त नहीं होता; उसकी संरचना को समझना भी उतना ही आवश्यक है।

क्या केवल परिभाषा याद करना पर्याप्त है?

अधिकांश विद्यार्थी समास के नाम और उनकी परिभाषाएँ याद कर लेते हैं, लेकिन वास्तविक कठिनाई तब आती है जब किसी सामासिक शब्द का प्रकार पहचानना होता है।

उदाहरण के लिए—

  • माता-पिता और राजपुत्र दोनों ही दो शब्दों से बने हैं, फिर भी दोनों का समास अलग है।
  • नीलकमल और नीलकंठ दोनों में “नील” शब्द समान है, लेकिन संदर्भ बदलने पर दोनों का समास बदल सकता है।
  • त्रिलोक और त्रिनेत्र दोनों में संख्या है, फिर भी दोनों का समास हर बार समान नहीं होगा।

इससे स्पष्ट होता है कि समास की पहचान केवल शब्द देखकर नहीं, बल्कि उसके विग्रह, अर्थ और संरचना को समझकर की जाती है।

क्या सभी समासों को याद करना कठिन है?

पहली दृष्टि में समास के छह प्रकार अलग-अलग प्रतीत होते हैं, लेकिन जब उनकी मूल पहचान समझ ली जाती है, तो उन्हें याद रखना कठिन नहीं रहता।

उदाहरण के लिए—

  • यदि पहला पद अव्यय है, तो अव्ययीभाव की संभावना होगी।
  • यदि दूसरा पद प्रधान है और विभक्ति का लोप हुआ है, तो तत्पुरुष की ओर ध्यान जाएगा।
  • यदि विशेषण और विशेष्य का संबंध है, तो कर्मधारय होगा।
  • यदि संख्या के साथ समूह का अर्थ है, तो द्विगु होगा।
  • यदि “और” या “या” का भाव है, तो द्वंद्व होगा।
  • यदि पूरा शब्द किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु का बोध करा रहा है, तो बहुव्रीहि होगा।

यद्यपि यह केवल प्रारम्भिक संकेत हैं, लेकिन आगे प्रत्येक समास का विस्तार से अध्ययन करने पर इनकी पहचान और अधिक स्पष्ट होती जाएगी।

अव्ययीभाव समास

समास के छह प्रकारों में अव्ययीभाव समास को सबसे पहले रखा जाता है। इसका कारण केवल परंपरा नहीं है, बल्कि इसकी संरचना अन्य सभी समासों से भिन्न है। जहाँ अधिकांश समासों में संज्ञा, विशेषण या संख्या प्रधान भूमिका निभाते हैं, वहीं अव्ययीभाव समास में अव्यय सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है। इसलिए इसे समझने का तरीका भी अन्य समासों से अलग है।

यदि समास के सभी प्रकारों की तुलना की जाए, तो यह एकमात्र ऐसा समास है जिसमें पूर्वपद (पहला पद) प्रधान होता है। यही इसकी सबसे बड़ी पहचान है। आगे चलकर आप देखेंगे कि अन्य समासों की पहचान में कभी उत्तरपद, कभी दोनों पद या कभी कोई तीसरा अर्थ प्रधान होता है, लेकिन अव्ययीभाव समास में पूरा अर्थ पहले पद के इर्द-गिर्द निर्मित होता है।

इसी कारण समास की पहचान करते समय सबसे पहले यह देखा जाता है कि कहीं पहला पद अव्यय तो नहीं है। यदि ऐसा है, तो अव्ययीभाव समास होने की संभावना सबसे अधिक होती है।

अव्ययीभाव समास की परिभाषा

जिस समास में पहला पद अव्यय हो तथा वही पूरे समास का मुख्य अर्थ निर्धारित करे, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो—

यदि किसी सामासिक शब्द का पहला पद अव्यय हो और समस्त पद का अर्थ उसी के आधार पर निर्धारित हो, तो वह अव्ययीभाव समास कहलाता है।

यहाँ “अव्यय” का अर्थ ऐसे शब्द से है जिसका रूप लिंग, वचन, पुरुष या कारक के अनुसार नहीं बदलता।

उदाहरण—

  • यथाशक्ति
  • प्रतिदिन
  • आजीवन
  • यथासंभव
  • आमरण

इन सभी शब्दों में पहला पद अव्यय है और वही पूरे शब्द का अर्थ निर्धारित कर रहा है।

अव्यय क्या होता है?

अव्ययीभाव समास को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि अव्यय किसे कहते हैं। यदि अव्यय की अवधारणा स्पष्ट नहीं होगी, तो अव्ययीभाव समास की पहचान करना भी कठिन हो जाएगा।

हिन्दी व्याकरण में अव्यय ऐसे शब्दों को कहा जाता है जिनके रूप में किसी भी परिस्थिति में परिवर्तन नहीं होता। अर्थात् लिंग, वचन, पुरुष अथवा कारक बदलने पर भी उनका स्वरूप वही रहता है।

उदाहरण के लिए—

  • यथा
  • प्रति
  • अनु
  • बे
  • निर्
  • बिना

ये सभी ऐसे शब्द हैं जिनका रूप नहीं बदलता। यही कारण है कि जब ये किसी अन्य शब्द के साथ मिलकर सामासिक शब्द बनाते हैं, तो अव्ययीभाव समास का निर्माण होता है।

अव्ययीभाव समास की मुख्य पहचान

किसी भी सामासिक शब्द को देखते ही यह पहचान लेना कि वह अव्ययीभाव समास है या नहीं, अभ्यास के साथ सरल हो जाता है। इसके लिए कुछ प्रमुख विशेषताओं को समझना आवश्यक है।

नीचे दी गई सारणी इसकी पहचान को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करती है—

पहचानविवरण
पहला पद अव्यय होता है।जैसे—यथा, प्रति, आ, बे, निर् आदि।
पहला पद प्रधान होता है।पूरा अर्थ उसी के आधार पर बनता है।
विग्रह में “के अनुसार”, “प्रत्येक”, “तक”, “भर”, “बिना” आदि शब्द आते हैं।यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण पहचान है।
समस्त पद प्रायः क्रियाविशेषणीय अर्थ देता है।जैसे—प्रतिदिन, आजीवन, यथाक्रम।

यदि किसी शब्द में ये विशेषताएँ एक साथ दिखाई दें, तो उसके अव्ययीभाव समास होने की संभावना अत्यधिक होती है।

अव्ययीभाव समास की पहचान विग्रह से कैसे करें?

केवल शब्द देखकर समास की पहचान करना हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए सबसे पहले उसका समास-विग्रह किया जाता है।

यदि विग्रह में निम्न प्रकार के संबंध प्राप्त हों—

  • के अनुसार
  • प्रत्येक
  • तक
  • भर
  • बिना
  • ही-ही
  • पर्यन्त

तो सामान्यतः वह अव्ययीभाव समास होता है। उदाहरण—

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
यथाशक्तिशक्ति के अनुसार
यथासंभवसंभव के अनुसार
प्रतिदिनप्रत्येक दिन
प्रतिवर्षप्रत्येक वर्ष
आजीवनजीवन भर
आमरणमरण तक
भरपेटपेट भरकर
बेशकशक के बिना

यदि इन विग्रहों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि प्रत्येक शब्द में पहला पद ही अर्थ का आधार बन रहा है।

अव्ययीभाव समास को उदाहरणों से समझें

अब कुछ प्रमुख उदाहरणों का विश्लेषण करते हैं—

सामासिक शब्दविग्रहपहला पदसमास
यथाशक्तिशक्ति के अनुसारयथाअव्ययीभाव
यथासंभवसंभव के अनुसारयथाअव्ययीभाव
प्रतिदिनप्रत्येक दिनप्रतिअव्ययीभाव
प्रतिवर्षप्रत्येक वर्षप्रतिअव्ययीभाव
आजन्मजन्म से लेकरअव्ययीभाव
आजीवनजीवन भरअव्ययीभाव
आमरणमरण तकअव्ययीभाव
भरपेटपेट भरकरभरअव्ययीभाव
बेशकशक के बिनाबेअव्ययीभाव
निडरडर के बिनानिअव्ययीभाव

इन उदाहरणों में स्पष्ट दिखाई देता है कि प्रत्येक शब्द का पहला भाग पूरे अर्थ को नियंत्रित कर रहा है। यही अव्ययीभाव समास की मूल विशेषता है।

क्या प्रत्येक अव्यय से अव्ययीभाव समास बनता है?

यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

उत्तर है—नहीं।

केवल पहला पद अव्यय होने से ही अव्ययीभाव समास नहीं बन जाता। यह भी आवश्यक है कि वही अव्यय पूरे शब्द के अर्थ को नियंत्रित करे।

उदाहरण के लिए—

यथाशक्ति

यहाँ “यथा” केवल जुड़ा हुआ शब्द नहीं है, बल्कि पूरा अर्थ “शक्ति के अनुसार” उसी से बन रहा है।

इसी प्रकार—

प्रतिदिन

का अर्थ “प्रत्येक दिन” है, जहाँ “प्रति” पूरे अर्थ का आधार है।

अर्थात् केवल अव्यय का होना पर्याप्त नहीं है; उसका प्रधान होना भी आवश्यक है।

अव्ययीभाव समास की मूल अवधारणा

यदि अब तक पढ़ी गई सभी बातों को एक वाक्य में समझना हो, तो कहा जा सकता है—

अव्ययीभाव समास की पहचान हमेशा पहले पद से होती है, क्योंकि वही अव्यय पूरे समस्त पद के अर्थ को नियंत्रित करता है।

यही कारण है कि समास की पहचान करते समय अधिकांश व्याकरणाचार्य सबसे पहले यह देखने की सलाह देते हैं कि कहीं पहला पद अव्यय तो नहीं है।

अव्ययीभाव समास के निर्माण के आधार

अब तक आपने यह समझ लिया कि अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय होता है और वही पूरे समस्त पद का अर्थ निर्धारित करता है। लेकिन केवल इतनी जानकारी पर्याप्त नहीं है। व्यवहार में अव्ययीभाव समास अनेक रूपों में मिलता है। कहीं इसका निर्माण उपसर्गों के माध्यम से होता है, कहीं किसी शब्द की पुनरावृत्ति से और कहीं दो समान शब्दों के विशेष प्रयोग से।

इसी कारण केवल परिभाषा याद कर लेने से अव्ययीभाव समास की सही पहचान संभव नहीं होती। इसके निर्माण के आधारों को समझना आवश्यक है। जब विद्यार्थी यह समझ लेता है कि अव्ययीभाव समास किन-किन रूपों में बनता है, तब वह कठिन से कठिन उदाहरण की भी सही पहचान कर सकता है।

व्याकरण की दृष्टि से अव्ययीभाव समास का निर्माण मुख्यतः निम्नलिखित आधारों पर होता है—

क्रमनिर्माण का आधारसंक्षिप्त परिचय
1उपसर्ग या अव्यय के योग सेपहला पद अव्यय होता है, जैसे—यथा, प्रति, आ, बे, निर् आदि।
2एक ही शब्द की पुनरावृत्ति सेएक ही शब्द दो बार आता है, जैसे—घर-घर, नगर-नगर।
3समान शब्दों के विशेष योग सेदोनों शब्दों के बीच मात्रा या व्यंजन का प्रयोग होता है, जैसे—हाथोंहाथ, दिनोदिन।

अब इन तीनों आधारों को क्रमवार विस्तार से समझते हैं।

1. उपसर्ग अथवा अव्यय के योग से बनने वाले अव्ययीभाव समास

अव्ययीभाव समास का सबसे सामान्य और सर्वाधिक प्रचलित रूप यही है। इसमें पहला पद किसी अव्यय या उपसर्ग के रूप में प्रयुक्त होता है और दूसरा पद उसके साथ मिलकर नया सामासिक शब्द बनाता है।

इस प्रकार के शब्दों में पहला पद कभी भी अपना रूप नहीं बदलता और वही पूरे शब्द का अर्थ निर्धारित करता है। नीचे दी गई सारणी इसके प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत करती है—

सामासिक शब्दसमास-विग्रहप्रयुक्त अव्यय
यथाशक्तिशक्ति के अनुसारयथा
यथासंभवसंभव के अनुसारयथा
यथाक्रमक्रम के अनुसारयथा
यथाविधिविधि के अनुसारयथा
प्रतिदिनप्रत्येक दिनप्रति
प्रतिवर्षप्रत्येक वर्षप्रति
प्रतिक्षणप्रत्येक क्षणप्रति
आजन्मजन्म से लेकर
आजीवनजीवन भर
आमरणमरण तक
बेघरघर के बिनाबे
बेशकशक के बिनाबे
निर्दोषदोष रहितनिर्
निस्संदेहसंदेह के बिनानिस्

यदि इन उदाहरणों का विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि प्रत्येक शब्द में पहला पद ही अर्थ की दिशा निर्धारित कर रहा है। उदाहरण के लिए “यथा” जहाँ भी आता है, वहाँ उसका अर्थ “के अनुसार” होता है। इसी प्रकार “प्रति” का अर्थ “प्रत्येक”, “आ” का अर्थ “तक” या “भर” तथा “बे” या “निर्” का अर्थ “बिना” या “रहित” होता है।

यही कारण है कि ऐसे शब्दों की पहचान अपेक्षाकृत सरल होती है।

2. एक ही शब्द की पुनरावृत्ति से बनने वाले अव्ययीभाव समास

अव्ययीभाव समास का दूसरा महत्वपूर्ण रूप वह है जिसमें एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होती है। यहाँ दोनों शब्द समान होते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य किसी स्थान, समय या क्रम की निरंतरता को व्यक्त करना होता है।

इन शब्दों में किसी प्रकार की विभक्ति का प्रयोग नहीं होता, फिर भी पूरा शब्द अव्ययी अर्थ देता है।

उदाहरण देखें—

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
घर-घरप्रत्येक घर
नगर-नगरप्रत्येक नगर
गाँव-गाँवप्रत्येक गाँव
गली-गलीप्रत्येक गली
रोज़-रोज़प्रतिदिन
पल-पलप्रत्येक पल
क्षण-क्षणप्रत्येक क्षण

इन उदाहरणों में किसी विशेष व्यक्ति या वस्तु का उल्लेख नहीं है, बल्कि व्यापकता और निरंतरता का भाव व्यक्त किया गया है। “घर-घर” का अर्थ किसी एक घर से नहीं, बल्कि प्रत्येक घर से है। इसी प्रकार “नगर-नगर” का अर्थ हर नगर तथा “पल-पल” का अर्थ प्रत्येक पल होता है।

इस प्रकार की पुनरावृत्ति हिन्दी भाषा को अधिक प्रभावशाली और अभिव्यक्तिपूर्ण बनाती है।

3. समान शब्दों के विशेष योग से बनने वाले अव्ययीभाव समास

अव्ययीभाव समास का तीसरा रूप थोड़ा भिन्न होता है। इसमें दो समान शब्दों के बीच मात्रा, अनुस्वार या अन्य ध्वन्यात्मक परिवर्तन दिखाई देता है। देखने में यह सामान्य पुनरावृत्ति जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में यह एक विशिष्ट संरचना होती है।

इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग हिन्दी में अत्यंत स्वाभाविक रूप से किया जाता है।

इसके प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं—

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
हाथोंहाथहाथ ही हाथ में
दिनोदिनदिन-प्रतिदिन
रातोंरातरात ही रात में
बातोंबातबात ही बात में
देखते-देखतेदेखते ही देखते
चलते-चलतेचलते ही चलते

यदि इन शब्दों को ध्यान से देखा जाए, तो इनमें गति, क्रम, तात्कालिकता या निरंतरता का भाव दिखाई देता है। उदाहरण के लिए “हाथोंहाथ” का अर्थ है तुरंत, बिना विलंब के। “रातोंरात” का अर्थ है बहुत कम समय में, जबकि “दिनोदिन” का अर्थ है लगातार प्रत्येक दिन।

ऐसे शब्द साहित्य, पत्रकारिता तथा सामान्य बोलचाल की भाषा में अत्यधिक प्रयुक्त होते हैं।

अव्ययीभाव समास के निर्माण का समग्र विश्लेषण

अब तक पढ़े गए तीनों आधारों को यदि एक साथ देखा जाए, तो अव्ययीभाव समास की पूरी संरचना स्पष्ट हो जाती है।

निर्माण का आधारपहचानप्रमुख उदाहरण
अव्यय या उपसर्ग का प्रयोगपहला पद अव्यय होता हैयथाशक्ति, प्रतिदिन, आजीवन
शब्द की पुनरावृत्तिएक ही शब्द दो बार आता हैघर-घर, नगर-नगर, पल-पल
विशेष पुनरावृत्तिबीच में मात्रा या ध्वनि परिवर्तनहाथोंहाथ, दिनोदिन, रातोंरात

इस सारणी से स्पष्ट है कि अव्ययीभाव समास केवल एक प्रकार की संरचना तक सीमित नहीं है। इसके निर्माण के कई रूप हैं, लेकिन इन सभी में एक समान विशेषता यह है कि पूरा शब्द अव्ययी अर्थ प्रदान करता है और उसका पहला भाग अर्थ की दिशा निर्धारित करता है।

अव्ययीभाव समास के प्रमुख उदाहरण (विस्तृत विश्लेषण)

किसी भी समास को समझने का सबसे प्रभावी तरीका उसके अधिकाधिक उदाहरणों का अध्ययन करना है। परिभाषा केवल यह बताती है कि समास क्या है, लेकिन वास्तविक समझ तब विकसित होती है जब अलग-अलग प्रकार के सामासिक शब्दों का विश्लेषण किया जाए।

अव्ययीभाव समास के साथ भी यही बात लागू होती है। यदि विद्यार्थी केवल “यथाशक्ति” और “प्रतिदिन” जैसे दो-चार उदाहरण याद करके आगे बढ़ जाता है, तो नए शब्दों की पहचान करने में उसे कठिनाई होती है। इसके विपरीत यदि वह विभिन्न प्रकार के उदाहरणों का समास-विग्रह, अर्थ और संरचना समझ ले, तो किसी भी नए शब्द का विश्लेषण करना उसके लिए सरल हो जाता है।

इसी उद्देश्य से नीचे अव्ययीभाव समास के प्रमुख उदाहरणों को विभिन्न श्रेणियों में व्यवस्थित किया गया है।

(क) “यथा” से बनने वाले अव्ययीभाव समास

“यथा” का सामान्य अर्थ “के अनुसार”, “जैसा” अथवा “अनुसार” होता है। जब “यथा” किसी शब्द के साथ मिलकर नया सामासिक शब्द बनाता है, तो अधिकांश स्थितियों में वह अव्ययीभाव समास होता है। नीचे दिए गए उदाहरणों को ध्यानपूर्वक देखें—

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअर्थ
यथाशक्तिशक्ति के अनुसारजितनी शक्ति हो, उसी के अनुसार
यथासंभवसंभव के अनुसारजितना संभव हो
यथाक्रमक्रम के अनुसारनिर्धारित क्रम में
यथाविधिविधि के अनुसारनियमों के अनुसार
यथामतिमति (बुद्धि) के अनुसारअपनी समझ के अनुसार
यथोचितउचित के अनुसारउचित रीति से
यथास्थानस्थान के अनुसारउचित स्थान पर
यथासमयसमय के अनुसारउचित समय पर
यथार्थअर्थ के अनुसारवास्तविक रूप में

यदि इन सभी उदाहरणों का विश्लेषण किया जाए, तो एक समान विशेषता दिखाई देती है—हर शब्द में “यथा” पूरे अर्थ का आधार बन रहा है। इसी कारण इन शब्दों की पहचान करना अपेक्षाकृत सरल होता है।

(ख) “प्रति” से बनने वाले अव्ययीभाव समास

“प्रति” का सामान्य अर्थ “प्रत्येक”, “हर” या “एक-एक” होता है। जब यह किसी संज्ञा के साथ जुड़ता है, तो नियमितता या पुनरावृत्ति का भाव व्यक्त करता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअर्थ
प्रतिदिनप्रत्येक दिनहर दिन
प्रतिवर्षप्रत्येक वर्षहर वर्ष
प्रतिमाहप्रत्येक माहहर महीने
प्रतिक्षणप्रत्येक क्षणहर क्षण
प्रतिपलप्रत्येक पलहर पल
प्रतिघंटाप्रत्येक घंटेहर घंटे
प्रतिव्यक्तिप्रत्येक व्यक्तिहर व्यक्ति
प्रतिग्रामप्रत्येक ग्रामहर गाँव

इन शब्दों में “प्रति” का अर्थ कभी नहीं बदलता। जहाँ भी यह आता है, वहाँ “प्रत्येक” या “हर” का भाव उपस्थित रहता है। इसलिए ऐसे शब्दों की पहचान भी सरल होती है।

(ग) “आ” से बनने वाले अव्ययीभाव समास

“आ” उपसर्ग सामान्यतः “तक”, “से लेकर” या “भर” का बोध कराता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअर्थ
आजन्मजन्म से लेकरजन्म से
आजीवनजीवन भरपूरे जीवन तक
आमरणमरण तकमृत्यु तक
आकंठकंठ तकगले तक
आजानुघुटनों तकघुटनों तक पहुँचने वाला

इन उदाहरणों में “आ” किसी सीमा या अवधि का बोध कराता है। यही इसकी प्रमुख पहचान है।

(घ) “बे”, “निर्”, “निस्” आदि से बनने वाले शब्द

इन उपसर्गों का सामान्य अर्थ “बिना”, “रहित” अथवा “अभाव” होता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअर्थ
बेघरघर के बिनाजिसका घर न हो
बेशकशक के बिनानिस्संदेह
बेदागदाग के बिनानिर्दोष
निर्दोषदोष रहितजिसमें दोष न हो
निस्संदेहसंदेह के बिनानिश्चित रूप से
निडरडर के बिनानिर्भय
निष्कपटकपट के बिनासरल एवं निष्कलुष

इन सभी उदाहरणों में अभाव या रहित होने का भाव स्पष्ट दिखाई देता है।

(ङ) पुनरावृत्ति से बनने वाले अव्ययीभाव समास

अव्ययीभाव समास का यह रूप हिन्दी भाषा में अत्यंत प्रचलित है। इसमें एक ही शब्द दो बार प्रयुक्त होता है और उसका अर्थ व्यापकता, निरंतरता या पुनरावृत्ति का बोध कराता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअर्थ
घर-घरप्रत्येक घरसभी घरों में
नगर-नगरप्रत्येक नगरहर नगर में
गाँव-गाँवप्रत्येक गाँवसभी गाँवों में
गली-गलीप्रत्येक गलीहर गली में
पल-पलप्रत्येक पलनिरंतर
क्षण-क्षणप्रत्येक क्षणहर क्षण
रोज़-रोज़प्रत्येक दिनबार-बार

इन उदाहरणों का उद्देश्य किसी एक स्थान या समय का उल्लेख करना नहीं है, बल्कि व्यापकता को व्यक्त करना है।

(च) विशेष पुनरावृत्ति वाले अव्ययीभाव समास

कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनमें एक जैसी ध्वनि या शब्दों के बीच विशेष रूप बनता है। ऐसे शब्द हिन्दी की अभिव्यक्ति को अधिक प्रभावशाली बनाते हैं।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअर्थ
हाथोंहाथहाथ ही हाथ मेंतुरंत
दिनोदिनदिन-प्रतिदिनलगातार बढ़ते हुए
रातोंरातरात ही रात मेंबहुत कम समय में
बातोंबातबात ही बात मेंबातचीत करते-करते
देखते-देखतेदेखते ही देखतेअचानक, शीघ्र
चलते-चलतेचलते ही चलतेमार्ग में या क्रमशः

इन शब्दों का प्रयोग साहित्य, पत्रकारिता और दैनिक भाषा में बहुत अधिक होता है।

एक साथ सभी प्रमुख उदाहरण

अब तक पढ़े गए प्रमुख उदाहरणों को एक ही स्थान पर देखने से पुनरावृत्ति (Revision) भी हो जाती है और तुलना करना भी आसान हो जाता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
यथाशक्तिशक्ति के अनुसार
यथासंभवसंभव के अनुसार
यथाविधिविधि के अनुसार
यथाक्रमक्रम के अनुसार
प्रतिदिनप्रत्येक दिन
प्रतिवर्षप्रत्येक वर्ष
प्रतिक्षणप्रत्येक क्षण
आजन्मजन्म से लेकर
आजीवनजीवन भर
आमरणमरण तक
बेघरघर के बिना
बेशकशक के बिना
निर्दोषदोष रहित
निस्संदेहसंदेह के बिना
घर-घरप्रत्येक घर
नगर-नगरप्रत्येक नगर
पल-पलप्रत्येक पल
हाथोंहाथहाथ ही हाथ में
दिनोदिनदिन-प्रतिदिन
रातोंरातरात ही रात में

इन उदाहरणों से क्या समझ में आता है?

यदि इन सभी उदाहरणों का समग्र रूप से अध्ययन किया जाए, तो अव्ययीभाव समास की पहचान स्वतः स्पष्ट होने लगती है। अधिकांश शब्दों में पहला पद किसी अव्यय या उपसर्ग के रूप में प्रयुक्त हुआ है, जबकि कुछ शब्द पुनरावृत्ति अथवा विशेष संरचना से बने हैं। इन सभी का सामान्य गुण यह है कि पूरा समस्त पद किसी क्रिया, समय, क्रम, सीमा या रीति का बोध कराता है और उसका अर्थ पहले पद से नियंत्रित होता है।

अव्ययीभाव समास की पहचान कैसे करें?

अब तक आपने अव्ययीभाव समास की परिभाषा, उसकी संरचना, निर्माण के आधार तथा अनेक उदाहरणों का विस्तार से अध्ययन किया। लेकिन व्यवहार में सबसे अधिक कठिनाई तब आती है जब किसी सामासिक शब्द का समास पहचानना होता है। कई बार विद्यार्थी परिभाषा तो याद रखते हैं, फिर भी प्रश्नपत्र में नया शब्द देखकर भ्रमित हो जाते हैं।

इसका मुख्य कारण यह है कि वे केवल उदाहरण याद करते हैं, पहचानने की विधि (Identification Method) नहीं समझते।

वास्तव में किसी भी समास की पहचान रटकर नहीं की जाती, बल्कि एक निश्चित क्रम (Logical Process) अपनाकर की जाती है। यदि यह प्रक्रिया स्पष्ट हो जाए, तो पहले कभी न देखे गए सामासिक शब्द का भी सही विश्लेषण किया जा सकता है।

इसी उद्देश्य से नीचे अव्ययीभाव समास की पहचान करने की क्रमबद्ध विधि दी जा रही है।

चरण 1 : सबसे पहले समास-विग्रह करें

किसी भी सामासिक शब्द को देखते ही उसका प्रकार बताने का प्रयास नहीं करना चाहिए। सबसे पहले उसका समास-विग्रह करना आवश्यक है।

उदाहरण—

यथाशक्ति

शक्ति के अनुसार

अब यहाँ “के अनुसार” संबंध स्पष्ट हो गया।

इसी प्रकार—

प्रतिदिन

प्रत्येक दिन

और

आजीवन

जीवन भर

समास-विग्रह करने के बाद आगे की पहचान बहुत आसान हो जाती है।

चरण 2 : पहला पद ध्यान से देखें

समास-विग्रह करने के बाद यह देखें कि सामासिक शब्द का पहला पद कौन-सा है।

यदि पहला पद निम्न प्रकार के अव्ययों में से कोई हो—

  • यथा
  • प्रति
  • अनु
  • बे
  • निर्
  • निस्
  • भर

तो अव्ययीभाव समास होने की संभावना बहुत अधिक हो जाती है। उदाहरण—

सामासिक शब्दपहला पद
यथाशक्तियथा
प्रतिवर्षप्रति
आजन्म
बेघरबे
निर्दोषनिर्
निस्संदेहनिस्

यह प्रारम्भिक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

चरण 3 : विग्रह में आने वाले शब्दों पर ध्यान दें

अब समास-विग्रह में प्रयुक्त संबंधसूचक शब्दों को देखें। यदि विग्रह में सामान्यतः निम्न प्रकार के शब्द मिलते हैं—

  • के अनुसार
  • प्रत्येक
  • तक
  • भर
  • बिना
  • रहित
  • ही-ही

तो अधिकांश स्थितियों में वह अव्ययीभाव समास होता है। नीचे सारणी में इसे व्यवस्थित रूप से समझाया गया है—

विग्रह में प्रयुक्त शब्दसंभावित समास
के अनुसारअव्ययीभाव
प्रत्येकअव्ययीभाव
तकअव्ययीभाव
भरअव्ययीभाव
बिनाअव्ययीभाव
रहितअव्ययीभाव
ही-हीअव्ययीभाव

यद्यपि कुछ विशेष परिस्थितियों में अपवाद मिल सकते हैं, फिर भी सामान्य अध्ययन में यह नियम अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है।

चरण 4 : देखें कि अर्थ किस पद से नियंत्रित हो रहा है

अब यह समझने का प्रयास करें कि पूरे सामासिक शब्द का मुख्य अर्थ किस पद से बन रहा है। यदि पहला पद पूरे शब्द की दिशा निर्धारित कर रहा है, तो वह अव्ययीभाव समास होगा।

उदाहरण—

शब्दअर्थ किससे बन रहा है?निष्कर्ष
यथाशक्ति“यथा” (के अनुसार)अव्ययीभाव
प्रतिदिन“प्रति” (प्रत्येक)अव्ययीभाव
आजीवन“आ” (जीवन भर)अव्ययीभाव
बेघर“बे” (बिना)अव्ययीभाव

इन उदाहरणों में स्पष्ट है कि पहला पद हटाने पर पूरा अर्थ बदल जाता है।

अव्ययीभाव समास पहचान का संक्षिप्त सूत्र

यदि किसी शब्द के बारे में तुरंत निर्णय लेना हो, तो निम्न सूत्र याद रखा जा सकता है—

जाँच करेंयदि उत्तर “हाँ” है
क्या पहला पद अव्यय है?आगे जाँच करें
क्या वही अर्थ को नियंत्रित कर रहा है?आगे जाँच करें
क्या विग्रह में “के अनुसार”, “प्रत्येक”, “भर”, “तक”, “बिना” आदि आते हैं?अव्ययीभाव समास होने की प्रबल संभावना

यह सूत्र विशेष रूप से वस्तुनिष्ठ प्रश्नों तथा त्वरित पहचान में अत्यंत उपयोगी होता है।

अव्ययीभाव समास पहचानते समय होने वाली सामान्य गलतियाँ

अव्ययीभाव समास की पहचान करते समय विद्यार्थी कुछ सामान्य त्रुटियाँ करते हैं। इन्हीं कारणों से सही उत्तर जानते हुए भी कई बार गलत विकल्प चुन लिया जाता है। नीचे ऐसी प्रमुख गलतियों को सारणीबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है—

सामान्य गलतीसही तरीका
केवल पहला पद देखकर निर्णय लेनापहले समास-विग्रह करें, फिर निर्णय लें।
सभी उपसर्ग वाले शब्दों को अव्ययीभाव मान लेनादेखें कि पहला पद वास्तव में अव्यय है या नहीं।
विग्रह किए बिना समास बतानाहमेशा विग्रह के बाद ही समास निर्धारित करें।
अर्थ की उपेक्षा करनासमास की पहचान में अर्थ सबसे महत्वपूर्ण आधार है।
रटे हुए उदाहरणों पर निर्भर रहनानियम समझकर नए शब्दों का विश्लेषण करें।

यदि इन गलतियों से बचा जाए, तो समास की पहचान अधिक सटीक हो जाती है।

परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले अव्ययीभाव समास

कुछ सामासिक शब्द ऐसे हैं जो विभिन्न परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं। इनका समास-विग्रह और समास का प्रकार अच्छी तरह याद होना चाहिए।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसमास
यथाशक्तिशक्ति के अनुसारअव्ययीभाव
यथासंभवसंभव के अनुसारअव्ययीभाव
यथाक्रमक्रम के अनुसारअव्ययीभाव
प्रतिदिनप्रत्येक दिनअव्ययीभाव
प्रतिवर्षप्रत्येक वर्षअव्ययीभाव
आजन्मजन्म से लेकरअव्ययीभाव
आजीवनजीवन भरअव्ययीभाव
आमरणमरण तकअव्ययीभाव
निस्संदेहसंदेह के बिनाअव्ययीभाव
भरपेटपेट भरकरअव्ययीभाव
हाथोंहाथहाथ ही हाथ मेंअव्ययीभाव
दिनोदिनदिन-प्रतिदिनअव्ययीभाव

इन शब्दों का बार-बार अभ्यास करने से पहचान की गति और शुद्धता दोनों बढ़ती हैं।

अव्ययीभाव समास को याद रखने का सरल सिद्धांत

यदि पूरे अध्याय का सार एक ही विचार में समझना हो, तो इसे इस प्रकार याद रखा जा सकता है—

जहाँ पहला पद अव्यय हो, वही पूरे शब्द का अर्थ नियंत्रित करे और समास-विग्रह में “के अनुसार”, “प्रत्येक”, “भर”, “तक”, “बिना” जैसे संबंध प्राप्त हों, वहाँ सामान्यतः अव्ययीभाव समास होता है।

इस सिद्धांत के आधार पर अधिकांश प्रश्नों का समाधान आसानी से किया जा सकता है।

अव्ययीभाव समास और अन्य समासों में अंतर

अब तक आपने अव्ययीभाव समास का विस्तृत अध्ययन कर लिया है। इसकी परिभाषा, पहचान, निर्माण के आधार, उदाहरण तथा समास-विग्रह की प्रक्रिया भी स्पष्ट हो चुकी है। लेकिन व्यवहार में सबसे अधिक भ्रम तब उत्पन्न होता है, जब किसी सामासिक शब्द का प्रकार निर्धारित करना होता है।

कई बार दो अलग-अलग समासों के उदाहरण देखने में लगभग समान प्रतीत होते हैं। यदि केवल शब्द को देखकर निर्णय लिया जाए, तो गलत उत्तर मिलने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि हिन्दी व्याकरण में तुलनात्मक अध्ययन (Comparative Study) को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस भाग में हम अव्ययीभाव समास की तुलना अन्य प्रमुख समासों से करेंगे। इससे यह स्पष्ट होगा कि समान दिखाई देने वाले शब्द वास्तव में अलग-अलग समास क्यों होते हैं।

अव्ययीभाव समास और तत्पुरुष समास में अंतर

यह सबसे सामान्य भ्रम है। दोनों समासों में दो शब्द मिलकर नया शब्द बनाते हैं और दोनों में ही समास-विग्रह करने पर कोई संबंधसूचक शब्द प्राप्त हो सकता है। इसी कारण विद्यार्थी अक्सर इन दोनों में अंतर नहीं कर पाते।

वास्तविक अंतर उनकी प्रधानता (प्रधान पद) में होता है।

अव्ययीभाव समास में पहला पद प्रधान होता है, जबकि तत्पुरुष समास में दूसरा पद प्रधान होता है।

इसे निम्न सारणी से समझिए—

आधारअव्ययीभाव समासतत्पुरुष समास
प्रधान पदपहला पद (अव्यय)दूसरा पद
पहला पदअव्यय होता हैसामान्यतः संज्ञा या विशेषण
विग्रह“के अनुसार”, “प्रत्येक”, “तक”, “बिना” आदि“का”, “के”, “की”, “को”, “से”, “में”, “पर”, “के लिए” आदि
अर्थपहला पद निर्धारित करता हैदूसरा पद मुख्य अर्थ देता है
उदाहरणयथाशक्ति, प्रतिदिनराजपुत्र, विद्यालय

ऊपर की सारणी से स्पष्ट है कि दोनों समासों का निर्माण अलग सिद्धांतों पर आधारित है।

उदाहरण द्वारा तुलना
शब्दविग्रहसमास
यथाशक्तिशक्ति के अनुसारअव्ययीभाव
प्रतिदिनप्रत्येक दिनअव्ययीभाव
राजपुत्रराजा का पुत्रतत्पुरुष
विद्यालयविद्या के लिए आलयतत्पुरुष

यदि विग्रह में “के अनुसार”, “प्रत्येक”, “तक” जैसे शब्द मिलें, तो अव्ययीभाव की संभावना अधिक होती है। यदि “का”, “के लिए”, “से”, “में” आदि मिलें, तो तत्पुरुष की ओर ध्यान देना चाहिए।

अव्ययीभाव समास और द्वंद्व समास में अंतर

कुछ विद्यार्थी ऐसे शब्दों को भी अव्ययीभाव मान लेते हैं जिनमें दो शब्द साथ-साथ प्रयुक्त होते हैं। उदाहरण के लिए माता-पिता, सुख-दुःख, दिन-रात आदि। वास्तव में ये अव्ययीभाव नहीं, बल्कि द्वंद्व समास के उदाहरण हैं।

इन दोनों समासों के बीच का अंतर निम्न प्रकार से समझा जा सकता है—

आधारअव्ययीभाव समासद्वंद्व समास
प्रधान पदपहला पददोनों पद
विग्रहके अनुसार, प्रत्येक, तक, बिनाऔर, अथवा, या
अर्थपहला पद नियंत्रित करता हैदोनों शब्द समान महत्व रखते हैं
उदाहरणयथासंभव, प्रतिवर्षमाता-पिता, सुख-दुःख
उदाहरण द्वारा तुलना
शब्दविग्रहसमास
प्रतिदिनप्रत्येक दिनअव्ययीभाव
यथाक्रमक्रम के अनुसारअव्ययीभाव
माता-पितामाता और पिताद्वंद्व
दिन-रातदिन और रातद्वंद्व

यहाँ स्पष्ट दिखाई देता है कि द्वंद्व समास में दोनों शब्द स्वतंत्र रूप से अपना अर्थ बनाए रखते हैं, जबकि अव्ययीभाव में पूरा अर्थ पहले पद से नियंत्रित होता है।

अव्ययीभाव समास और कर्मधारय समास में अंतर

यह भ्रम अपेक्षाकृत कम होता है, फिर भी कई बार प्रश्नों में ऐसे उदाहरण दिए जाते हैं जिनसे विद्यार्थी भ्रमित हो सकते हैं। कर्मधारय समास में विशेषण–विशेष्य अथवा उपमान–उपमेय का संबंध होता है। इसके विपरीत अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय होता है।

आधारअव्ययीभावकर्मधारय
पहला पदअव्ययविशेषण या उपमान
संबंधक्रियाविशेषणीयविशेषण–विशेष्य
उदाहरणयथाशक्तिनीलकमल
उदाहरण
शब्दविग्रहसमास
यथाशक्तिशक्ति के अनुसारअव्ययीभाव
नीलकमलनीला है जो कमलकर्मधारय

यहाँ “यथा” अव्यय है, जबकि “नील” विशेषण है। यही दोनों समासों का सबसे बड़ा अंतर है।

अव्ययीभाव समास और बहुव्रीहि समास में अंतर

बहुव्रीहि समास में पूरा शब्द किसी तीसरे अर्थ की ओर संकेत करता है, जबकि अव्ययीभाव समास में ऐसा नहीं होता।

आधारअव्ययीभावबहुव्रीहि
प्रधान पदपहला पदकोई भी नहीं
अर्थपहला पद नियंत्रित करता हैपूरा शब्द किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु का बोध कराता है
उदाहरणआजीवनदशानन
उदाहरण
शब्दविग्रहसमास
आजीवनजीवन भरअव्ययीभाव
दशाननदस हैं आनन जिसके (रावण)बहुव्रीहि

इन दोनों की संरचना पूरी तरह भिन्न है, इसलिए इनका भ्रम अपेक्षाकृत कम होता है।

एक नज़र में सभी अंतर

अब तक पढ़े गए सभी तुलनात्मक बिंदुओं को एक साथ देखने से अव्ययीभाव समास की स्थिति और अधिक स्पष्ट हो जाती है।

समासमुख्य पहचानविग्रह में सामान्य शब्द
अव्ययीभावपहला पद अव्ययके अनुसार, प्रत्येक, तक, बिना
तत्पुरुषदूसरा पद प्रधानका, की, के, को, से, में, पर
कर्मधारयविशेषण–विशेष्यनीला है जो, बड़ा है जो
द्वंद्वदोनों पद प्रधानऔर, अथवा, या
बहुव्रीहितीसरा अर्थ प्रधानजिसका, जिसकी, जिसके

यह सारणी केवल तुलना के लिए नहीं, बल्कि समास की पहचान करने के लिए भी अत्यंत उपयोगी है।

विद्यार्थी सबसे अधिक कहाँ भ्रमित होते हैं?

अभ्यास के दौरान कुछ विशेष प्रकार की त्रुटियाँ बार-बार देखने को मिलती हैं। यदि इन पर पहले से ध्यान दिया जाए, तो समास की पहचान अधिक सटीक हो जाती है।

भ्रम की स्थितिसही विश्लेषण
“प्रति” देखकर भी तत्पुरुष मान लेनापहले विग्रह करें; “प्रत्येक” मिले तो अव्ययीभाव होगा।
“माता-पिता” को अव्ययीभाव समझ लेना“और” मिलने पर द्वंद्व होगा।
“नीलकमल” में पहला शब्द देखकर अव्ययीभाव मान लेना“नील” अव्यय नहीं, विशेषण है; इसलिए कर्मधारय होगा।
“राजपुत्र” में पहला शब्द देखकर निर्णय लेना“राजा का पुत्र” होने से सम्बन्ध तत्पुरुष होगा।

यदि पहचान करते समय केवल शब्द नहीं, बल्कि विग्रह + अर्थ + प्रधान पद—इन तीनों को साथ में देखा जाए, तो ऐसी अधिकांश गलतियाँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

तत्पुरुष समास

अव्ययीभाव समास के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि किसी समास की पहचान उसके प्रधान पद और समास-विग्रह के आधार पर की जाती है। अब हम समास के दूसरे तथा सबसे महत्वपूर्ण प्रकार तत्पुरुष समास का अध्ययन प्रारम्भ करते हैं। यदि समास अध्याय को सम्पूर्ण रूप से समझना हो, तो तत्पुरुष समास की स्पष्ट समझ अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि हिन्दी व्याकरण में प्रयुक्त सामासिक शब्दों का बड़ा भाग इसी श्रेणी में आता है।

राजपुत्र, विद्यालय, गृहस्वामी, जलमग्न, भयभीत, हस्तलिखित, सत्याग्रह, पथभ्रष्ट, ऋणमुक्त, शरणागत जैसे अनेक शब्द हमारे दैनिक जीवन, साहित्य और प्रशासनिक भाषा में सामान्य रूप से प्रयुक्त होते हैं। पहली दृष्टि में ये सभी अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन इनके निर्माण का मूल सिद्धांत एक ही है। यही सिद्धांत तत्पुरुष समास कहलाता है।

अन्य समासों की तुलना में तत्पुरुष समास का क्षेत्र सबसे व्यापक है। यही कारण है कि इसके अंतर्गत आगे कई उपभेदों का भी अध्ययन किया जाता है। इसलिए इस अध्याय को धीरे-धीरे और क्रमबद्ध रूप से समझना अधिक उपयोगी रहता है।

तत्पुरुष समास की परिभाषा

जिस समास में उत्तरपद (दूसरा पद) प्रधान होता है तथा दोनों पदों के बीच प्रयुक्त कारक-चिह्न या विभक्ति का लोप हो जाता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं।

सरल शब्दों में कहा जाए तो—

जब दो शब्दों के बीच “का”, “की”, “के”, “को”, “से”, “में”, “पर”, “के लिए” आदि संबंधसूचक शब्द हटाकर नया सामासिक शब्द बनाया जाता है और दूसरा पद मुख्य अर्थ देता है, तब वह तत्पुरुष समास कहलाता है।

यह परिभाषा छोटी अवश्य है, लेकिन इसके भीतर तत्पुरुष समास की पूरी संरचना छिपी हुई है। इसलिए इसके प्रत्येक भाग को समझना आवश्यक है।

तत्पुरुष समास का शाब्दिक अर्थ

“तत्पुरुष” शब्द संस्कृत के “तत् + पुरुष” से बना है। यहाँ “तत्” का अर्थ है “उसका” और “पुरुष” का अर्थ है “व्यक्ति”

व्याकरण की दृष्टि से इस शब्द का शाब्दिक अर्थ अधिक महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसकी संरचना महत्वपूर्ण है। इस समास में दूसरा पद पूरे शब्द का मुख्य आधार होता है, इसलिए इसे उत्तरपद-प्रधान समास भी कहा जाता है।

उदाहरण के लिए—

राजा का पुत्र → राजपुत्र

यहाँ पूरा शब्द “पुत्र” के आधार पर समझा जाता है। “राज” केवल यह बताता है कि वह पुत्र किसका है।

इसी प्रकार—

विद्या के लिए आलय → विद्यालय

यहाँ भी मुख्य अर्थ “आलय” (स्थान) से बन रहा है। “विद्या” केवल उसका उद्देश्य स्पष्ट कर रही है।

यही उत्तरपद की प्रधानता तत्पुरुष समास की सबसे महत्वपूर्ण पहचान है।

तत्पुरुष समास की मुख्य विशेषताएँ

तत्पुरुष समास को सही ढंग से समझने के लिए उसकी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन आवश्यक है। यदि ये विशेषताएँ स्पष्ट हो जाएँ, तो किसी भी सामासिक शब्द का विश्लेषण करना काफी आसान हो जाता है।

नीचे इसकी प्रमुख विशेषताओं को सारणीबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है—

विशेषताविवरण
उत्तरपद प्रधान होता है।दूसरा पद पूरे शब्द का मुख्य अर्थ देता है।
दो पदों के बीच विभक्ति का लोप होता है।जैसे—का, की, के, को, से, में, पर आदि।
समास-विग्रह करने पर कारक स्पष्ट होता है।उसी के आधार पर उपभेद निर्धारित किया जाता है।
अधिकांश शब्द संज्ञा + संज्ञा अथवा संज्ञा + विशेषण से बनते हैं।जैसे—राजपुत्र, गृहस्वामी।
हिन्दी के सर्वाधिक सामासिक शब्द इसी समास में मिलते हैं।साहित्य एवं सामान्य भाषा में अत्यधिक प्रयोग।

यदि इन विशेषताओं का ध्यान रखा जाए, तो तत्पुरुष समास को अन्य समासों से अलग पहचानना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है।

तत्पुरुष समास की संरचना कैसे बनती है?

तत्पुरुष समास का निर्माण एक निश्चित व्याकरणिक प्रक्रिया के अनुसार होता है। इसमें दो स्वतंत्र शब्द लिए जाते हैं और उनके बीच प्रयुक्त कारक-चिह्न या विभक्ति का लोप कर दिया जाता है। इसके बाद दोनों शब्द मिलकर नया सामासिक शब्द बनाते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया को निम्न उदाहरणों से समझा जा सकता है—

मूल शब्द समूहलुप्त विभक्तिसमस्त पद
राजा का पुत्रकाराजपुत्र
विद्या के लिए आलयके लिएविद्यालय
हाथ से लिखितसेहस्तलिखित
जल में मग्नमेंजलमग्न
पथ से भ्रष्टसेपथभ्रष्ट
भय से भीतसेभयभीत

इन उदाहरणों में एक समान नियम दिखाई देता है—बीच का संबंधसूचक शब्द हट गया है, लेकिन उसका अर्थ बना हुआ है।

उत्तरपद को प्रधान क्यों कहा जाता है?

यह तत्पुरुष समास की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है। जब किसी सामासिक शब्द का अर्थ समझा जाता है, तो उसका मूल आधार दूसरा पद होता है। पहला पद केवल उस दूसरे पद के बारे में अतिरिक्त जानकारी देता है।

उदाहरण—

1. राजपुत्र

राजा का पुत्र

यहाँ मुख्य शब्द “पुत्र” है। “राजा” केवल यह बताता है कि वह पुत्र किसका है।

2. गृहस्वामी

गृह का स्वामी

यहाँ मुख्य अर्थ “स्वामी” है। “गृह” केवल उसका संबंध स्पष्ट कर रहा है।

3. जलमग्न

जल में मग्न

यहाँ मुख्य अर्थ “मग्न” शब्द से बन रहा है।

4. हस्तलिखित

हाथ से लिखित

यहाँ भी मुख्य अर्थ “लिखित” है।

इन सभी उदाहरणों में स्पष्ट दिखाई देता है कि दूसरा पद हटाने पर पूरा अर्थ समाप्त हो जाता है, जबकि पहला पद केवल उसकी विशेषता या संबंध बताता है। इसी कारण इसे उत्तरपद-प्रधान समास कहा जाता है।

तत्पुरुष समास में विभक्ति का लोप

तत्पुरुष समास की पहचान का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण आधार विभक्ति का लोप है। सामान्यतः निम्न प्रकार की विभक्तियाँ या संबंधसूचक शब्द समास बनने पर लुप्त हो जाते हैं—

विभक्ति / कारकउदाहरण
का / की / केराजा का पुत्र → राजपुत्र
कोसिद्धि को प्राप्त → सिद्धिप्राप्त
सेहाथ से लिखित → हस्तलिखित
के लिएविद्या के लिए आलय → विद्यालय
मेंजल में मग्न → जलमग्न
परआत्मा पर विश्वास → आत्मविश्वास

यदि समास-विग्रह करते समय इनमें से कोई विभक्ति प्राप्त होती है, तो तत्पुरुष समास होने की संभावना अत्यधिक होती है।

क्या प्रत्येक तत्पुरुष समास समान होता है?

यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है। यद्यपि सभी तत्पुरुष समासों में उत्तरपद प्रधान होता है, लेकिन सभी में समान प्रकार की विभक्ति नहीं मिलती। कहीं “का” का लोप होता है, कहीं “से”, कहीं “को”, कहीं “में” और कहीं “के लिए”।

इसी कारण तत्पुरुष समास को आगे कारकों के आधार पर छह प्रमुख उपभेदों में विभाजित किया गया है—

  • कर्म तत्पुरुष
  • करण तत्पुरुष
  • सम्प्रदान तत्पुरुष
  • अपादान तत्पुरुष
  • सम्बन्ध तत्पुरुष
  • अधिकरण तत्पुरुष

इन्हीं उपभेदों के कारण तत्पुरुष समास समासों में सबसे विस्तृत अध्याय माना जाता है।

तत्पुरुष समास के भेद

अब तक आपने यह समझ लिया कि तत्पुरुष समास में उत्तरपद प्रधान होता है तथा दोनों पदों के बीच प्रयुक्त विभक्ति या कारक-चिह्न का लोप हो जाता है। लेकिन यहीं पर तत्पुरुष समास का अध्ययन समाप्त नहीं होता। वास्तव में इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत कई प्रकार के संबंध पाए जाते हैं। यही कारण है कि हिन्दी व्याकरण में तत्पुरुष समास को सबसे विस्तृत समास माना जाता है।

यदि केवल “राजपुत्र” और “जलमग्न” को देखा जाए, तो दोनों तत्पुरुष समास हैं, लेकिन दोनों के विग्रह में प्रयुक्त विभक्ति अलग-अलग है। “राजपुत्र” में ‘का’ का लोप हुआ है, जबकि “जलमग्न” में ‘में’ का। इसी प्रकार “हस्तलिखित” में ‘से’, “विद्यालय” में ‘के लिए’ तथा “सिद्धिप्राप्त” में ‘को’ का लोप हुआ है।

यही अंतर यह स्पष्ट करता है कि तत्पुरुष समास के सभी शब्द एक ही प्रकार के नहीं होते। इनका वर्गीकरण उन कारकों के आधार पर किया जाता है, जिनकी विभक्ति समास बनने पर लुप्त हो जाती है।

तत्पुरुष समास के कितने भेद होते हैं?

संस्कृत व्याकरण में तत्पुरुष समास के आठ भेद माने गए हैं, क्योंकि वहाँ सभी आठ कारकों को आधार बनाया जाता है। किन्तु हिन्दी व्याकरण में कर्ता कारक और संबोधन कारक के आधार पर तत्पुरुष समास नहीं बनते। इसलिए हिन्दी में तत्पुरुष समास के छः प्रमुख भेद स्वीकार किए गए हैं।

ये छह भेद निम्नलिखित हैं—

क्रमतत्पुरुष समास का भेदलुप्त विभक्ति / कारक
1कर्म तत्पुरुषको
2करण तत्पुरुषसे / के द्वारा
3सम्प्रदान तत्पुरुषके लिए
4अपादान तत्पुरुषसे (अलग होने का भाव)
5सम्बन्ध तत्पुरुषका, की, के
6अधिकरण तत्पुरुषमें, पर

यह सारणी पूरे तत्पुरुष समास अध्याय की आधारशिला है। यदि इन छह कारकों को सही प्रकार से समझ लिया जाए, तो अधिकांश सामासिक शब्दों का वर्गीकरण सहज हो जाता है।

इन छह भेदों का आधार क्या है?

कई विद्यार्थियों के मन में यह प्रश्न आता है कि एक ही तत्पुरुष समास को छह भागों में बाँटने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

इसका उत्तर समास-विग्रह में छिपा हुआ है।

जब किसी सामासिक शब्द का विग्रह किया जाता है, तब दोनों पदों के बीच कोई-न-कोई संबंध अवश्य प्राप्त होता है। यही संबंध किसी कारक के रूप में व्यक्त होता है। जिस कारक की विभक्ति समास बनने पर लुप्त हुई होती है, उसी के आधार पर तत्पुरुष समास का उपभेद निर्धारित किया जाता है।

उदाहरण के लिए—

सामासिक शब्दसमास-विग्रहकारकभेद
सिद्धिप्राप्तसिद्धि को प्राप्तकर्मकर्म तत्पुरुष
हस्तलिखितहाथ से लिखितकरणकरण तत्पुरुष
विद्यालयविद्या के लिए आलयसम्प्रदानसम्प्रदान तत्पुरुष
पथभ्रष्टपथ से भ्रष्टअपादानअपादान तत्पुरुष
राजपुत्रराजा का पुत्रसम्बन्धसम्बन्ध तत्पुरुष
जलमग्नजल में मग्नअधिकरणअधिकरण तत्पुरुष

यदि इस सारणी को ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक भेद की पहचान केवल विग्रह में प्रयुक्त कारक से होती है।

सभी भेदों को एक साथ समझें

अभी प्रत्येक उपभेद का विस्तार से अध्ययन नहीं किया जा रहा है। फिलहाल उद्देश्य केवल यह समझना है कि छहों भेद एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं।

भेदमुख्य प्रश्नउदाहरण
कर्मकिसको?स्वर्गप्राप्त, सिद्धिप्राप्त
करणकिससे? / किसके द्वारा?हस्तलिखित, रेखांकित
सम्प्रदानकिसके लिए?विद्यालय, रसोईघर
अपादानकिससे अलग?पथभ्रष्ट, ऋणमुक्त
सम्बन्धकिसका?राजपुत्र, गृहस्वामी
अधिकरणकहाँ? किसमें? किस पर?जलमग्न, शरणागत

इस सारणी से यह स्पष्ट होता है कि सभी भेदों का आधार अलग-अलग कारक हैं, जबकि समास का मूल सिद्धांत समान रहता है।

क्या “से” आने पर हमेशा एक ही भेद होगा?

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है।

तत्पुरुष समास में “से” दो अलग-अलग भेदों में आता है—

  • करण तत्पुरुष
  • अपादान तत्पुरुष

यही कारण है कि विद्यार्थी अक्सर इन दोनों में भ्रमित हो जाते हैं।

किन्तु दोनों में प्रयुक्त “से” का अर्थ समान नहीं होता।

भेद“से” का अर्थ
करण तत्पुरुषकिसी साधन, माध्यम या कर्ता के द्वारा
अपादान तत्पुरुषकिसी वस्तु या स्थान से अलग होना, दूर होना या मुक्त होना

उदाहरण—

हस्तलिखित

हाथ से लिखित

यहाँ हाथ लिखने का साधन है, इसलिए यह करण तत्पुरुष है।

दूसरी ओर—

पथभ्रष्ट

पथ से भ्रष्ट

यहाँ पथ से अलग होने का भाव है, इसलिए यह अपादान तत्पुरुष है। यद्यपि दोनों में “से” आया है, फिर भी अर्थ बदल जाने के कारण समास का भेद भी बदल जाता है।

कौन-सा भेद सबसे अधिक पूछा जाता है?

यदि विभिन्न प्रश्नपत्रों के उदाहरणों का अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सम्बन्ध, करण और अपादान तत्पुरुष से सर्वाधिक प्रश्न पूछे जाते हैं। इसका कारण यह है कि इन तीनों में प्रयुक्त विभक्तियों को लेकर विद्यार्थियों में भ्रम की संभावना अधिक रहती है।

इसी प्रकार विद्यालय, रसोईघर, सत्याग्रह जैसे शब्दों के माध्यम से सम्प्रदान तत्पुरुष तथा जलमग्न, आत्मविश्वास, शरणागत जैसे शब्दों के माध्यम से अधिकरण तत्पुरुष की भी नियमित जाँच की जाती है।

इसलिए प्रत्येक उपभेद को केवल परिभाषा के आधार पर नहीं, बल्कि पर्याप्त उदाहरणों और तुलनात्मक विश्लेषण के साथ समझना आवश्यक है।

कर्म तत्पुरुष समास

तत्पुरुष समास के छह भेदों का परिचय प्राप्त करने के बाद अब हम इसके प्रथम और अत्यंत महत्वपूर्ण भेद कर्म तत्पुरुष समास का विस्तृत अध्ययन प्रारम्भ करते हैं। यह वह समास है जिसकी पहचान विद्यार्थी प्रारम्भ में तो सरल समझते हैं, किन्तु अभ्यास के समय इसे करण तत्पुरुष अथवा सम्बन्ध तत्पुरुष के साथ मिला बैठते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वे केवल शब्द देखकर उत्तर देने का प्रयास करते हैं, जबकि समास की सही पहचान हमेशा समास-विग्रह और कारक के आधार पर की जाती है।

कर्म तत्पुरुष समास को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि कर्म कारक किसे कहते हैं और समास बनने पर उसमें कौन-सी विभक्ति लुप्त होती है। जब यह आधार स्पष्ट हो जाता है, तब इस प्रकार के सभी सामासिक शब्द स्वतः समझ में आने लगते हैं।

कर्म तत्पुरुष समास की परिभाषा

जिस तत्पुरुष समास में दोनों पदों के बीच कर्म कारक की विभक्ति “को” का लोप हो जाता है, उसे कर्म तत्पुरुष समास कहते हैं।

अर्थात् यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “को” शब्द प्राप्त हो, तो वह कर्म तत्पुरुष समास कहलाता है।

इसे सरल शब्दों में इस प्रकार भी समझा जा सकता है—

जहाँ कोई कार्य, क्रिया या प्राप्ति किसी वस्तु या व्यक्ति “को” लक्षित करती है और समास बनने पर “को” हट जाता है, वहाँ कर्म तत्पुरुष समास होता है।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि “को” समास में दिखाई नहीं देता, लेकिन समास-विग्रह करते समय उसका प्रयोग अवश्य होता है।

कर्म तत्पुरुष समास का मूल सिद्धांत

कर्म तत्पुरुष समास में सामान्यतः कोई क्रिया किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थान या लक्ष्य पर घटित होती है। वही लक्ष्य कर्म कहलाता है।

उदाहरण के लिए—

स्वर्गप्राप्त

स्वर्ग को प्राप्त

यहाँ “प्राप्त” होने की क्रिया “स्वर्ग” को लक्ष्य बनाकर की गई है। इसलिए “स्वर्ग” कर्म है और “को” कर्म कारक की विभक्ति है।

इसी प्रकार—

सिद्धिप्राप्त

सिद्धि को प्राप्त

यहाँ भी प्राप्ति का लक्ष्य “सिद्धि” है।

इसी सिद्धांत के कारण यह कर्म तत्पुरुष समास कहलाता है।

कर्म तत्पुरुष समास की पहचान

किसी भी सामासिक शब्द को देखते ही उसे कर्म तत्पुरुष घोषित नहीं करना चाहिए। पहले उसका समास-विग्रह करना आवश्यक है।

यदि समास-विग्रह करने पर निम्न स्थिति प्राप्त हो—

संज्ञा + “को” + क्रिया

तो सामान्यतः वह कर्म तत्पुरुष समास होता है।

उदाहरण—

सामासिक शब्दसमास-विग्रहनिष्कर्ष
स्वर्गप्राप्तस्वर्ग को प्राप्तकर्म तत्पुरुष
सिद्धिप्राप्तसिद्धि को प्राप्तकर्म तत्पुरुष
गगनचुम्बीगगन को चूमने वालाकर्म तत्पुरुष
बसचालकबस को चलाने वालाकर्म तत्पुरुष
माखनचोरमाखन को चुराने वालाकर्म तत्पुरुष
जनप्रियजनता को प्रियकर्म तत्पुरुष

इन सभी उदाहरणों में “को” का लोप हुआ है। यही इनकी सबसे बड़ी पहचान है।

कर्म तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ

किसी भी व्याकरणिक विषय को गहराई से समझने के लिए उसकी विशेषताओं को जानना आवश्यक होता है। यही विशेषताएँ आगे चलकर पहचान का आधार बनती हैं।

नीचे कर्म तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ दी गई हैं—

विशेषताविवरण
यह तत्पुरुष समास का एक उपभेद है।उत्तरपद प्रधान रहता है।
कर्म कारक की विभक्ति “को” का लोप होता है।समास-विग्रह में “को” प्राप्त होता है।
दूसरा पद प्रायः क्रिया या क्रियावाचक अर्थ देता है।जैसे—प्राप्त, चालक, चोर, प्रिय।
पहला पद क्रिया का लक्ष्य (कर्म) होता है।जैसे—स्वर्ग, बस, माखन।
समास-विग्रह करने पर अर्थ तुरंत स्पष्ट हो जाता है।“को” जोड़ते ही संबंध समझ में आ जाता है।

यदि इन विशेषताओं को ध्यान में रखा जाए, तो कर्म तत्पुरुष समास की पहचान करना अत्यंत सरल हो जाता है।

कर्म तत्पुरुष समास की संरचना

कर्म तत्पुरुष समास का निर्माण एक निश्चित व्याकरणिक ढाँचे के अनुसार होता है। इसमें पहला पद सामान्यतः कर्म का कार्य करता है और दूसरा पद किसी क्रिया या क्रिया से संबंधित अर्थ देता है।

इस संरचना को निम्न सारणी से समझा जा सकता है—

मूल वाक्यांशलुप्त विभक्तिसमस्त पद
स्वर्ग को प्राप्तकोस्वर्गप्राप्त
सिद्धि को प्राप्तकोसिद्धिप्राप्त
बस को चलाने वालाकोबसचालक
गगन को चूमने वालाकोगगनचुम्बी
माखन को चुराने वालाकोमाखनचोर
जनता को प्रियकोजनप्रिय

इन सभी उदाहरणों में समास बनने से पहले “को” उपस्थित था, लेकिन समस्त पद बनने पर उसका लोप हो गया।

इन उदाहरणों का विश्लेषण

केवल समास-विग्रह देख लेने से विषय पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता। प्रत्येक उदाहरण के पीछे छिपे व्याकरणिक संबंध को समझना भी आवश्यक है।

सामासिक शब्दक्रिया किस पर हो रही है?कर्मसमास
स्वर्गप्राप्तप्राप्त होनास्वर्गकर्म तत्पुरुष
सिद्धिप्राप्तप्राप्त होनासिद्धिकर्म तत्पुरुष
बसचालकचलानाबसकर्म तत्पुरुष
माखनचोरचुरानामाखनकर्म तत्पुरुष
गगनचुम्बीचूमनागगनकर्म तत्पुरुष
जनप्रियप्रिय होनाजनताकर्म तत्पुरुष

यदि इस दृष्टि से देखा जाए, तो प्रत्येक उदाहरण में पहला पद किसी-न-किसी क्रिया का लक्ष्य (Object) है। यही कारण है कि इन्हें कर्म तत्पुरुष कहा जाता है।

कर्म तत्पुरुष समास को याद रखने का सरल नियम

कई बार विद्यार्थी परीक्षा के समय यह भूल जाते हैं कि “को” कहाँ लगाया जाए। ऐसी स्थिति में निम्न नियम अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है—

यदि समास-विग्रह करते समय पहला पद किसी क्रिया का लक्ष्य बनता हो और उसके साथ “को” सहज रूप से लगाया जा सके, तो वह सामान्यतः कर्म तत्पुरुष समास होगा।

उदाहरण—

  • माखन को चुराने वाला ✔
  • बस को चलाने वाला ✔
  • स्वर्ग को प्राप्त ✔
  • सिद्धि को प्राप्त ✔

यह नियम अधिकांश प्रश्नों में सही पहचान करने में सहायता करता है।

कर्म तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण (विस्तृत विश्लेषण)

अब तक आपने कर्म तत्पुरुष समास की परिभाषा, उसकी संरचना तथा पहचान का अध्ययन किया। अब आवश्यकता है कि इसके अधिकाधिक उदाहरणों का विश्लेषण किया जाए। व्याकरण में केवल परिभाषा याद कर लेना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि प्रश्नपत्रों में अधिकांश प्रश्न नए शब्दों के रूप में पूछे जाते हैं। यदि विद्यार्थी केवल दो-चार उदाहरण याद करके आगे बढ़ जाता है, तो अपरिचित सामासिक शब्दों का समास निर्धारित करना कठिन हो जाता है।

इसी कारण इस भाग में कर्म तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरणों को विस्तार से समझाया गया है। प्रत्येक उदाहरण में समास-विग्रह, कर्म कारक तथा उसके पीछे छिपे व्याकरणिक संबंध का विश्लेषण किया गया है, जिससे केवल उत्तर याद न रहे, बल्कि उसके बनने का कारण भी स्पष्ट हो जाए।

(क) प्राप्ति का बोध कराने वाले कर्म तत्पुरुष

इस प्रकार के शब्दों में दूसरा पद सामान्यतः “प्राप्त”, “गत”, “लाभ” आदि होता है। पहला पद उस वस्तु या स्थान का बोध कराता है जिसे प्राप्त किया जा रहा है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहकर्म (को)अर्थ
स्वर्गप्राप्तस्वर्ग को प्राप्तस्वर्गजिसने स्वर्ग प्राप्त किया
सिद्धिप्राप्तसिद्धि को प्राप्तसिद्धिजिसने सिद्धि प्राप्त की
यशप्राप्तयश को प्राप्तयशजिसने यश पाया
सम्मानप्राप्तसम्मान को प्राप्तसम्मानजिसे सम्मान मिला
पुरस्कारप्राप्तपुरस्कार को प्राप्तपुरस्कारजिसे पुरस्कार मिला
इन उदाहरणों को समझें

इन सभी शब्दों में प्राप्ति की क्रिया किसी वस्तु या उपलब्धि की ओर निर्देशित है। यदि “को” जोड़कर विग्रह किया जाए, तो अर्थ सहज रूप से स्पष्ट हो जाता है—

  • स्वर्ग को प्राप्त
  • यश को प्राप्त
  • सम्मान को प्राप्त

अतः इन सभी में कर्म कारक की विभक्ति “को” लुप्त हुई है।

(ख) किसी वस्तु पर क्रिया करने वाले शब्द

इस समूह में दूसरा पद किसी कार्य (क्रिया) को व्यक्त करता है और पहला पद उस वस्तु का बोध कराता है जिस पर वह कार्य किया जा रहा है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहकर्मअर्थ
माखनचोरमाखन को चुराने वालामाखनमाखन चुराने वाला
बसचालकबस को चलाने वालाबसबस चलाने वाला
गगनचुम्बीगगन को चूमने वालागगनबहुत ऊँचा
शत्रुघ्नशत्रु को मारने वालाशत्रुशत्रुओं का विनाश करने वाला
ग्रामविजयीग्राम को जीतने वालाग्रामगाँव पर विजय प्राप्त करने वाला
इन उदाहरणों का विश्लेषण

इन सभी उदाहरणों में पहला पद क्रिया का लक्ष्य है।

  • क्या चलाया जा रहा है? → बस
  • क्या चुराया जा रहा है? → माखन
  • किसे चूमा जा रहा है? → गगन

अर्थात् क्रिया सीधे पहले पद पर घटित हो रही है। इसलिए यह कर्म तत्पुरुष समास है।

(ग) “प्रिय” वाले कर्म तत्पुरुष

“प्रिय” वाले शब्द परीक्षा में विशेष रूप से पूछे जाते हैं। इनकी पहचान करते समय यह देखना चाहिए कि कौन किसे प्रिय है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहकर्मअर्थ
जनप्रियजनता को प्रियजनताजो जनता को प्रिय हो
सर्वप्रियसभी को प्रियसभीजो सबको प्रिय हो
प्राणप्रियप्राणों को प्रियप्राणअत्यंत प्रिय
लोकप्रियलोक को प्रियलोकजो समाज में प्रिय हो
इन उदाहरणों का विश्लेषण

यहाँ “प्रिय” विशेषण अवश्य है, लेकिन उसका संबंध कर्म कारक से बन रहा है।

उदाहरण—

जनप्रिय

जनता को प्रिय

यहाँ “प्रिय” होने का संबंध जनता से है और “जनता” कर्म का कार्य कर रही है। इसलिए यह कर्म तत्पुरुष समास है।

(घ) धार्मिक एवं साहित्यिक प्रयोगों में मिलने वाले उदाहरण

संस्कृत तथा हिन्दी साहित्य में अनेक कर्म तत्पुरुष समास ऐसे मिलते हैं जो आज भी प्रचलित हैं।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसमास
वेदज्ञवेद को जानने वालाकर्म तत्पुरुष
शास्त्रज्ञशास्त्र को जानने वालाकर्म तत्पुरुष
आत्मज्ञआत्मा को जानने वालाकर्म तत्पुरुष
तत्त्वज्ञतत्त्व को जानने वालाकर्म तत्पुरुष
धर्मपालधर्म को पालन करने वालाकर्म तत्पुरुष

इन शब्दों में “जानना” अथवा “पालन करना” जैसी क्रियाएँ पहले पद को लक्ष्य बनाती हैं। इसलिए इनका संबंध भी कर्म कारक से है।

परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण उदाहरण

कुछ शब्द ऐसे हैं जो विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं। इनका अभ्यास अवश्य करना चाहिए।

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
बसचालकबस को चलाने वाला
गगनचुम्बीगगन को चूमने वाला
माखनचोरमाखन को चुराने वाला
स्वर्गप्राप्तस्वर्ग को प्राप्त
सिद्धिप्राप्तसिद्धि को प्राप्त
यशप्राप्तयश को प्राप्त
जनप्रियजनता को प्रिय
प्राणप्रियप्राणों को प्रिय
वेदज्ञवेद को जानने वाला
शास्त्रज्ञशास्त्र को जानने वाला

इन उदाहरणों का बार-बार अभ्यास करने से कर्म तत्पुरुष समास की पहचान सहज हो जाती है।

इन उदाहरणों का तुलनात्मक विश्लेषण

अब तक दिए गए सभी उदाहरणों का यदि एक साथ अध्ययन किया जाए, तो एक समान व्याकरणिक नियम दिखाई देता है।

सामासिक शब्दकौन-सी क्रिया है?पहला पद क्या है?“को” लग रहा है?समास
बसचालकचलानाबसकर्म तत्पुरुष
माखनचोरचुरानामाखनकर्म तत्पुरुष
गगनचुम्बीचूमनागगनकर्म तत्पुरुष
स्वर्गप्राप्तप्राप्त करनास्वर्गकर्म तत्पुरुष
जनप्रियप्रिय होनाजनताकर्म तत्पुरुष
वेदज्ञजाननावेदकर्म तत्पुरुष

यदि किसी सामासिक शब्द में पहला पद किसी क्रिया का लक्ष्य बन रहा हो और उसके साथ सहज रूप से “को” लगाया जा सके, तो वह सामान्यतः कर्म तत्पुरुष समास होगा।

अभ्यास करते समय किन बातों का ध्यान रखें?

कर्म तत्पुरुष समास की पहचान करते समय केवल शब्द देखकर उत्तर देना उचित नहीं है। पहले उसका समास-विग्रह करें, फिर देखें कि क्या दोनों पदों के बीच “को” लगाया जा सकता है। यदि “को” लगाने पर अर्थ स्वाभाविक और पूर्ण बनता है, तो वह कर्म तत्पुरुष होने की प्रबल संभावना है।

साथ ही यह भी ध्यान रखें कि कुछ शब्द देखने में समान प्रतीत होते हैं, लेकिन उनमें “को” के स्थान पर “से”, “का”, “के लिए” या “में” मिलता है। ऐसे शब्द कर्म तत्पुरुष नहीं, बल्कि तत्पुरुष के अन्य उपभेदों में आते हैं।

इसी कारण अगले भाग में हम कर्म तत्पुरुष समास और करण, सम्बन्ध तथा सम्प्रदान तत्पुरुष के बीच का अंतर विस्तार से समझेंगे। यही तुलनात्मक अध्ययन उन सभी सामान्य भ्रमों को दूर करेगा जिनके कारण विद्यार्थी अक्सर सही उत्तर जानते हुए भी गलत विकल्प चुन लेते हैं।

कर्म तत्पुरुष समास और अन्य तत्पुरुष भेदों में अंतर

अब तक आपने कर्म तत्पुरुष समास की परिभाषा, संरचना, पहचान तथा अनेक उदाहरणों का विस्तार से अध्ययन किया। अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—यदि किसी सामासिक शब्द में दो पदों के बीच कोई विभक्ति लुप्त हुई है, तो यह कैसे निश्चित किया जाए कि वह कर्म तत्पुरुष है, करण तत्पुरुष नहीं? या फिर सम्बन्ध तत्पुरुष अथवा सम्प्रदान तत्पुरुष क्यों नहीं?

यही वह स्थान है जहाँ अधिकांश विद्यार्थी भ्रमित हो जाते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि उन्हें परिभाषाएँ याद नहीं होतीं, बल्कि वे कारक के अर्थ (Sense of Case) को समझे बिना केवल शब्द देखकर उत्तर देने का प्रयास करते हैं।

वास्तव में तत्पुरुष समास के सभी उपभेदों में केवल एक बात बदलती है—दोनों पदों के बीच का संबंध। यदि यह संबंध सही पहचान लिया जाए, तो समास का प्रकार भी स्वतः स्पष्ट हो जाता है।

इसी उद्देश्य से इस भाग में कर्म तत्पुरुष की तुलना अन्य प्रमुख तत्पुरुष भेदों से की जा रही है।

कर्म तत्पुरुष और करण तत्पुरुष में अंतर

यह सबसे सामान्य भ्रम है, क्योंकि दोनों में क्रिया का संबंध दिखाई देता है। अंतर केवल इतना है कि कर्म तत्पुरुष में क्रिया किस पर हो रही है, जबकि करण तत्पुरुष में क्रिया किसके द्वारा या किस साधन से सम्पन्न हो रही है।

नीचे दी गई सारणी इस अंतर को स्पष्ट करती है—

आधारकर्म तत्पुरुषकरण तत्पुरुष
लुप्त विभक्तिकोसे / के द्वारा
पहला पदक्रिया का लक्ष्य (कर्म)क्रिया का साधन या माध्यम
मुख्य प्रश्नकिसको?किससे? / किसके द्वारा?
उदाहरणबसचालकहस्तलिखित
विग्रहबस को चलाने वालाहाथ से लिखित

उदाहरण द्वारा तुलना

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसमास
बसचालकबस को चलाने वालाकर्म तत्पुरुष
माखनचोरमाखन को चुराने वालाकर्म तत्पुरुष
हस्तलिखितहाथ से लिखितकरण तत्पुरुष
रेखांकितरेखा द्वारा अंकितकरण तत्पुरुष

यदि पहला पद क्रिया का लक्ष्य है तो कर्म तत्पुरुष होगा, और यदि वही पद साधन है तो करण तत्पुरुष होगा।

कर्म तत्पुरुष और सम्प्रदान तत्पुरुष में अंतर

इन दोनों में भी कई बार भ्रम होता है, क्योंकि दोनों में कोई उद्देश्य या संबंध दिखाई देता है। लेकिन इनके अर्थ बिल्कुल अलग होते हैं। कर्म तत्पुरुष में क्रिया किसी वस्तु को लक्षित करती है, जबकि सम्प्रदान तत्पुरुष में कोई वस्तु या स्थान किसी उद्देश्य या किसी के लिए होता है।

आधारकर्म तत्पुरुषसम्प्रदान तत्पुरुष
लुप्त विभक्तिकोके लिए
संबंधक्रिया का लक्ष्यउद्देश्य या प्रयोजन
मुख्य प्रश्नकिसको?किसके लिए?
उदाहरणस्वर्गप्राप्तविद्यालय
उदाहरण द्वारा तुलना
सामासिक शब्दसमास-विग्रहसमास
सिद्धिप्राप्तसिद्धि को प्राप्तकर्म तत्पुरुष
जनप्रियजनता को प्रियकर्म तत्पुरुष
विद्यालयविद्या के लिए आलयसम्प्रदान तत्पुरुष
रसोईघररसोई के लिए घरसम्प्रदान तत्पुरुष

यदि विग्रह में “के लिए” स्वाभाविक रूप से आता है, तो वह सम्प्रदान तत्पुरुष होगा।

कर्म तत्पुरुष और सम्बन्ध तत्पुरुष में अंतर

यह अंतर समझना भी अत्यंत आवश्यक है। सम्बन्ध तत्पुरुष में दो पदों के बीच स्वामित्व अथवा संबंध व्यक्त होता है, जबकि कर्म तत्पुरुष में क्रिया का लक्ष्य व्यक्त होता है।

आधारकर्म तत्पुरुषसम्बन्ध तत्पुरुष
लुप्त विभक्तिकोका / की / के
संबंधक्रिया का कर्मस्वामित्व या संबंध
मुख्य प्रश्नकिसको?किसका?
उदाहरणमाखनचोरराजपुत्र
उदाहरण द्वारा तुलना
सामासिक शब्दसमास-विग्रहसमास
माखनचोरमाखन को चुराने वालाकर्म तत्पुरुष
बसचालकबस को चलाने वालाकर्म तत्पुरुष
राजपुत्रराजा का पुत्रसम्बन्ध तत्पुरुष
गृहस्वामीगृह का स्वामीसम्बन्ध तत्पुरुष

यहाँ स्पष्ट दिखाई देता है कि सम्बन्ध तत्पुरुष में कोई क्रिया नहीं, बल्कि केवल संबंध व्यक्त हो रहा है।

एक साथ तुलना

अब तक पढ़े गए तीनों अंतरों को एक ही सारणी में देखने से विषय और अधिक स्पष्ट हो जाता है।

समासलुप्त विभक्तिपहला पद क्या बताता है?उदाहरण
कर्म तत्पुरुषकोक्रिया का लक्ष्यमाखनचोर
करण तत्पुरुषसे / द्वारासाधनहस्तलिखित
सम्प्रदान तत्पुरुषके लिएउद्देश्यविद्यालय
सम्बन्ध तत्पुरुषका / की / केसंबंधराजपुत्र

यदि विद्यार्थी इस सारणी को समझ ले, तो तत्पुरुष समास के अधिकांश प्रश्न बिना किसी कठिनाई के हल किए जा सकते हैं।

पहचान करते समय होने वाली सामान्य गलतियाँ

अभ्यास के दौरान कुछ विशेष प्रकार की त्रुटियाँ बार-बार देखने को मिलती हैं। इन्हें पहले से समझ लेना आवश्यक है।

सामान्य गलतीसही विश्लेषण
“हस्तलिखित” को कर्म तत्पुरुष मान लेनाहाथ से लिखित → करण तत्पुरुष
“विद्यालय” को कर्म तत्पुरुष समझ लेनाविद्या के लिए आलय → सम्प्रदान तत्पुरुष
“राजपुत्र” को कर्म तत्पुरुष मान लेनाराजा का पुत्र → सम्बन्ध तत्पुरुष
केवल दूसरा पद देखकर उत्तर देनापहले समास-विग्रह करें, फिर कारक पहचानें।
“को” और “के लिए” में अंतर न करनापहले संबंध समझें, फिर समास निर्धारित करें।

इन त्रुटियों से बचने का सबसे सरल उपाय है—हर शब्द का समास-विग्रह अवश्य करें।

कर्म तत्पुरुष पहचानने की अंतिम जाँच

यदि किसी सामासिक शब्द के बारे में अभी भी संदेह हो, तो निम्न प्रश्न क्रम से पूछें—

स्वयं से पूछेंयदि उत्तर “हाँ” है
क्या समास-विग्रह में “को” आता है?आगे बढ़िए
क्या पहला पद किसी क्रिया का लक्ष्य है?आगे बढ़िए
क्या दूसरा पद क्रिया या क्रियावाचक अर्थ दे रहा है?आगे बढ़िए
क्या “का”, “से”, “के लिए”, “में” लगाने पर अर्थ बदल जाता है?तब यह कर्म तत्पुरुष होगा

यह जाँच-पद्धति विशेष रूप से वस्तुनिष्ठ प्रश्नों और समास पहचानने वाले अभ्यास में अत्यंत प्रभावी सिद्ध होती है।

करण तत्पुरुष समास

कर्म तत्पुरुष समास के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि तत्पुरुष समास के प्रत्येक उपभेद की पहचान उसके समास-विग्रह में प्रयुक्त कारक के आधार पर की जाती है। अब हम तत्पुरुष समास के दूसरे महत्वपूर्ण भेद करण तत्पुरुष समास का अध्ययन करेंगे।

यह समास विद्यार्थियों के लिए इसलिए विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि इसमें प्रयुक्त “से” शब्द के कारण इसका भ्रम अक्सर अपादान तत्पुरुष से हो जाता है। कई बार दोनों में “से” दिखाई देता है, लेकिन दोनों का अर्थ और व्याकरणिक संबंध पूरी तरह अलग होता है। इसलिए करण तत्पुरुष को समझते समय केवल विभक्ति नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे अर्थ (Semantic Relation) को भी समझना आवश्यक है।

हिन्दी साहित्य, प्रशासनिक भाषा, समाचार-पत्रों तथा दैनिक प्रयोग में हस्तलिखित, रेखांकित, स्वरचित, तुलसीकृत, मदांध, शोकग्रस्त, कष्टसाध्य जैसे अनेक शब्द मिलते हैं। ये सभी करण तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण हैं। यदि इनकी संरचना समझ ली जाए, तो इस प्रकार के अधिकांश सामासिक शब्दों की पहचान सहज हो जाती है।

करण तत्पुरुष समास की परिभाषा

जिस तत्पुरुष समास में दोनों पदों के बीच करण कारक की विभक्ति “से” अथवा “के द्वारा” का लोप हो जाता है, उसे करण तत्पुरुष समास कहते हैं।

अर्थात् यदि समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “से” या “के द्वारा” प्राप्त हो और पहला पद किसी कार्य को सम्पन्न करने वाले साधन, माध्यम या कर्ता का बोध कराए, तो वह करण तत्पुरुष समास कहलाता है।

इसे सरल भाषा में इस प्रकार समझा जा सकता है—

जहाँ कोई कार्य किसी साधन, माध्यम या कर्ता के द्वारा सम्पन्न हो और समास बनने पर “से” अथवा “के द्वारा” का लोप हो जाए, वहाँ करण तत्पुरुष समास होता है।

करण कारक क्या होता है?

करण तत्पुरुष समास को समझने से पहले करण कारक की अवधारणा स्पष्ट होना आवश्यक है।

व्याकरण में जिस साधन, माध्यम या उपकरण की सहायता से कोई कार्य सम्पन्न होता है, उसे करण कारक कहा जाता है।

उदाहरण के लिए—

  • विद्यार्थी कलम से लिखता है।
  • बढ़ई आरी से लकड़ी काटता है।
  • चित्रकार ब्रश से चित्र बनाता है।
  • लेखक कंप्यूटर से लेख तैयार करता है।

इन सभी वाक्यों में कार्य तो अलग-अलग हैं, लेकिन कार्य को सम्पन्न करने वाला माध्यम या साधन एक विशेष भूमिका निभा रहा है। यही करण कारक का मूल सिद्धांत है।

इसी सिद्धांत पर करण तत्पुरुष समास का निर्माण होता है।

करण तत्पुरुष समास का मूल सिद्धांत

करण तत्पुरुष समास में पहला पद यह बताता है कि कोई कार्य किसके द्वारा या किस साधन से किया गया है। दूसरा पद उस कार्य या उसकी अवस्था को व्यक्त करता है।

उदाहरण—

हस्तलिखित

हाथ से लिखित

यहाँ “लिखित” कार्य है और “हाथ” वह साधन है जिससे लिखने का कार्य सम्पन्न हुआ।

इसी प्रकार—

रेखांकित

रेखा द्वारा अंकित

यहाँ “रेखा” अंकन का माध्यम है।

इसी कारण दोनों शब्द करण तत्पुरुष समास कहलाते हैं।

करण तत्पुरुष समास की पहचान

करण तत्पुरुष समास की पहचान करने के लिए किसी भी सामासिक शब्द का पहले समास-विग्रह करना चाहिए। यदि विग्रह करते समय दोनों पदों के बीच “से” अथवा “के द्वारा” सहज रूप से लगाया जा सके और अर्थ स्वाभाविक लगे, तो वह करण तत्पुरुष समास होगा।

नीचे दिए गए उदाहरणों को ध्यानपूर्वक देखें—

सामासिक शब्दसमास-विग्रहकरण (साधन)
हस्तलिखितहाथ से लिखितहाथ
रेखांकितरेखा द्वारा अंकितरेखा
स्वरचितस्वयं द्वारा रचितस्वयं
तुलसीकृततुलसी द्वारा कृततुलसी
मदांधमद से अंधमद
शोकग्रस्तशोक से ग्रस्तशोक
कष्टसाध्यकष्ट से साध्यकष्ट

इन सभी उदाहरणों में पहला पद कार्य का साधन, कारण या माध्यम है।

करण तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ

करण तत्पुरुष समास को सही ढंग से समझने के लिए उसकी प्रमुख विशेषताओं को जानना आवश्यक है। यही विशेषताएँ आगे चलकर पहचान का आधार बनती हैं।

विशेषताविवरण
यह तत्पुरुष समास का उपभेद है।उत्तरपद प्रधान रहता है।
“से” या “के द्वारा” का लोप होता है।समास-विग्रह में स्पष्ट दिखाई देता है।
पहला पद साधन, माध्यम या कर्ता होता है।उसी से कार्य सम्पन्न होता है।
दूसरा पद कार्य, अवस्था या परिणाम का बोध कराता है।जैसे—लिखित, अंकित, ग्रस्त, अंध।
अर्थ में साधन या माध्यम की भूमिका स्पष्ट रहती है।यही इसकी पहचान है।

यदि इन विशेषताओं को ध्यान में रखा जाए, तो करण तत्पुरुष समास की पहचान सहज हो जाती है।

करण तत्पुरुष समास की संरचना

इस समास का निर्माण भी अन्य तत्पुरुष समासों की भाँति दो पदों के मेल से होता है। अंतर केवल इतना है कि यहाँ दोनों पदों के बीच करण कारक की विभक्ति लुप्त होती है।

इसे निम्न सारणी द्वारा समझा जा सकता है—

मूल वाक्यांशलुप्त विभक्तिसमस्त पद
हाथ से लिखितसेहस्तलिखित
रेखा द्वारा अंकितद्वारारेखांकित
स्वयं द्वारा रचितद्वारास्वरचित
तुलसी द्वारा कृतद्वारातुलसीकृत
मद से अंधसेमदांध
शोक से ग्रस्तसेशोकग्रस्त
कष्ट से साध्यसेकष्टसाध्य

यदि इन सभी उदाहरणों को एक साथ देखा जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि समस्त पद बनने पर केवल विभक्ति का लोप हुआ है, अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं आया।

उत्तरपद की प्रधानता यहाँ भी क्यों रहती है?

जैसा कि सभी तत्पुरुष समासों में होता है, करण तत्पुरुष में भी उत्तरपद (दूसरा पद) ही प्रधान होता है।

उदाहरण—

हस्तलिखित

हाथ से लिखित

यहाँ मुख्य अर्थ “लिखित” शब्द से बन रहा है। “हाथ” केवल यह बता रहा है कि लिखने का कार्य किस साधन से सम्पन्न हुआ।

इसी प्रकार—

शोकग्रस्त

शोक से ग्रस्त

मुख्य अर्थ “ग्रस्त” है, जबकि “शोक” केवल उसकी अवस्था का कारण बता रहा है।

इस प्रकार उत्तरपद ही पूरे शब्द का मुख्य अर्थ देता है।

करण तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण (विस्तृत विश्लेषण)

किसी भी समास को वास्तविक रूप से समझने का सर्वोत्तम माध्यम उसके उदाहरण होते हैं। परिभाषा हमें केवल नियम बताती है, जबकि उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि वह नियम व्यवहार में किस प्रकार लागू होता है। यही कारण है कि प्रतियोगी परीक्षाओं, विद्यालयी प्रश्नपत्रों तथा उच्च शिक्षा में समास की पहचान करते समय केवल परिभाषा नहीं, बल्कि उदाहरणों का विश्लेषण अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

करण तत्पुरुष समास के साथ भी यही बात लागू होती है। यदि विद्यार्थी केवल “हस्तलिखित” और “रेखांकित” जैसे दो उदाहरण याद कर ले, तो नए शब्दों की पहचान करना कठिन हो सकता है। लेकिन यदि वह यह समझ ले कि किसी कार्य के सम्पन्न होने में साधन, माध्यम, कारण अथवा कर्ता की क्या भूमिका है, तो वह पहले कभी न देखे गए शब्द का भी सही समास निर्धारित कर सकता है।

इसी उद्देश्य से नीचे करण तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरणों को अलग-अलग श्रेणियों में व्यवस्थित किया गया है।

(क) “से” (साधन) का बोध कराने वाले उदाहरण

इस प्रकार के शब्दों में पहला पद उस साधन का बोध कराता है जिसकी सहायता से कोई कार्य सम्पन्न होता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसाधन (करण)अर्थ
हस्तलिखितहाथ से लिखितहाथहाथ से लिखा गया
मदांधमद से अंधमदघमण्ड के कारण अंधा
शोकग्रस्तशोक से ग्रस्तशोकशोक से पीड़ित
कष्टसाध्यकष्ट से साध्यकष्टकठिन परिश्रम से पूरा होने वाला
श्रमसाध्यश्रम से साध्यश्रमअधिक श्रम से सम्पन्न होने वाला
परिश्रमसिद्धपरिश्रम से सिद्धपरिश्रमपरिश्रम द्वारा प्राप्त
इन उदाहरणों को समझें

यदि इन सभी शब्दों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए, तो एक समान व्याकरणिक संबंध दिखाई देता है। प्रत्येक शब्द में पहला पद यह बता रहा है कि कार्य किस साधन या कारण से सम्पन्न हुआ।

उदाहरण के लिए—

  • हाथ से लिखा गया → हस्तलिखित
  • शोक से ग्रस्त → शोकग्रस्त
  • कष्ट से साध्य → कष्टसाध्य

यहाँ “से” केवल विभक्ति नहीं है, बल्कि कार्य के साधन या कारण का बोध करा रहा है।

(ख) “के द्वारा” बनने वाले करण तत्पुरुष

कुछ शब्दों में “से” के स्थान पर “के द्वारा” अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। ऐसे शब्दों में पहला पद कार्य करने वाले व्यक्ति या माध्यम का बोध कराता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहकर्ता / माध्यम
स्वरचितस्वयं द्वारा रचितस्वयं
तुलसीकृततुलसी द्वारा कृततुलसी
वाल्मीकिरचितवाल्मीकि द्वारा रचितवाल्मीकि
वेदविहितवेद द्वारा विहितवेद
शासननिर्दिष्टशासन द्वारा निर्दिष्टशासन
इन उदाहरणों का विश्लेषण

इन सभी शब्दों में कोई कार्य किसी व्यक्ति, ग्रंथ या संस्था द्वारा सम्पन्न हुआ है।

उदाहरण—

स्वरचित

स्वयं द्वारा रचित

यहाँ रचना करने वाला स्वयं व्यक्ति है।

इसी प्रकार—

तुलसीकृत

तुलसी द्वारा कृत

यहाँ “तुलसी” कार्य करने वाले कर्ता के रूप में प्रयुक्त हुए हैं। इसलिए ऐसे शब्द करण तत्पुरुष समास के अंतर्गत आते हैं।

(ग) “अंकित”, “लिखित”, “निर्मित” प्रकार के शब्द

सरकारी परीक्षाओं में इस प्रकार के शब्द अत्यधिक पूछे जाते हैं क्योंकि इनका निर्माण एक ही व्याकरणिक नियम से होता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसमास
रेखांकितरेखा द्वारा अंकितकरण तत्पुरुष
हस्तलिखितहाथ से लिखितकरण तत्पुरुष
मुद्रितमुद्रण से लिखित / छपा हुआकरण तत्पुरुष
मशीननिर्मितमशीन से निर्मितकरण तत्पुरुष
हस्तनिर्मितहाथ से निर्मितकरण तत्पुरुष

इन सभी शब्दों में दूसरा पद कार्य का परिणाम बताता है, जबकि पहला पद उस कार्य के साधन या माध्यम का।

(घ) मानसिक एवं भावात्मक अवस्था व्यक्त करने वाले उदाहरण

करण तत्पुरुष केवल भौतिक साधनों तक सीमित नहीं है। कई बार पहला पद किसी मानसिक, भावनात्मक अथवा आंतरिक कारण का भी बोध कराता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहकारण
शोकग्रस्तशोक से ग्रस्तशोक
मदांधमद से अंधमद
भयाकुलभय से आकुलभय
क्रोधाग्निक्रोध से उत्पन्न अग्निक्रोध
प्रेमविह्वलप्रेम से विह्वलप्रेम

इन उदाहरणों में “से” किसी उपकरण का नहीं, बल्कि भाव या मानसिक स्थिति का कारण बता रहा है। फिर भी व्याकरण की दृष्टि से यह करण कारक ही माना जाता है।

परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण उदाहरण

कुछ सामासिक शब्द ऐसे हैं जो वर्षों से विभिन्न परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते रहे हैं। इनका समास-विग्रह और समास का प्रकार अच्छी तरह याद होना चाहिए।

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
हस्तलिखितहाथ से लिखित
रेखांकितरेखा द्वारा अंकित
स्वरचितस्वयं द्वारा रचित
तुलसीकृततुलसी द्वारा कृत
मदांधमद से अंध
शोकग्रस्तशोक से ग्रस्त
कष्टसाध्यकष्ट से साध्य
श्रमसाध्यश्रम से साध्य
हस्तनिर्मितहाथ से निर्मित
मशीननिर्मितमशीन से निर्मित

इन शब्दों का नियमित अभ्यास करने से करण तत्पुरुष समास से संबंधित अधिकांश प्रश्न सहजता से हल किए जा सकते हैं।

इन उदाहरणों का तुलनात्मक विश्लेषण

अब तक दिए गए सभी उदाहरणों का यदि एक साथ विश्लेषण किया जाए, तो एक निश्चित व्याकरणिक पैटर्न स्पष्ट दिखाई देता है।

सामासिक शब्दकार्य क्या है?पहला पद क्या बता रहा है?“से / द्वारा” लग रहा है?समास
हस्तलिखितलिखनासाधनकरण तत्पुरुष
रेखांकितअंकित करनामाध्यमकरण तत्पुरुष
स्वरचितरचना करनाकर्ताकरण तत्पुरुष
शोकग्रस्तग्रस्त होनाकारणकरण तत्पुरुष
कष्टसाध्यसाध्य होनासाधन / कारणकरण तत्पुरुष
मशीननिर्मितनिर्माण करनासाधनकरण तत्पुरुष

इस सारणी से स्पष्ट होता है कि करण तत्पुरुष में पहला पद हमेशा किसी-न-किसी रूप में कार्य के साधन, माध्यम, कारण अथवा कर्ता का बोध कराता है।

करण तत्पुरुष समास की पहचान करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

करण तत्पुरुष की पहचान करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि विग्रह में “से” आ रहा है। सबसे पहले यह समझना चाहिए कि “से” का अर्थ क्या है

यदि “से” का अर्थ साधन, माध्यम, उपकरण, कर्ता या कारण है, तो वह करण तत्पुरुष होगा। लेकिन यदि वही “से” अलग होने, दूर होने, मुक्त होने या वियोग का भाव व्यक्त करता है, तो वह करण नहीं, बल्कि अपादान तत्पुरुष होगा।

इसी कारण समास की पहचान करते समय शब्द नहीं, बल्कि उसके अर्थ का विश्लेषण करना अधिक आवश्यक है। यही कारण है कि अगले भाग में हम करण तत्पुरुष और अपादान तत्पुरुष के बीच का विस्तृत अंतर समझेंगे। यह तुलना उन सभी सामान्य भ्रमों को समाप्त कर देगी जो समास पहचानने में सबसे अधिक त्रुटियों का कारण बनते हैं।

करण तत्पुरुष समास और अपादान तत्पुरुष समास में अंतर

तत्पुरुष समास के विभिन्न भेदों का अध्ययन करते समय विद्यार्थियों को जिस विषय में सबसे अधिक भ्रम होता है, वह करण तत्पुरुष और अपादान तत्पुरुष का अंतर है। इसका मुख्य कारण यह है कि दोनों ही समासों के समास-विग्रह में “से” शब्द प्राप्त होता है। यदि केवल विभक्ति को देखकर निर्णय लिया जाए, तो दोनों समान प्रतीत होते हैं।

किन्तु व्याकरण में समास की पहचान केवल विभक्ति के आधार पर नहीं की जाती, बल्कि विभक्ति के अर्थ (Semantic Function) के आधार पर की जाती है। यही कारण है कि जहाँ एक ओर करण तत्पुरुष में “से” का अर्थ साधन, माध्यम, कारण अथवा कर्ता होता है, वहीं दूसरी ओर अपादान तत्पुरुष में “से” का अर्थ अलग होना, दूर होना, मुक्त होना, हटना या वियोग होता है।

यदि इस मूल अंतर को समझ लिया जाए, तो इन दोनों समासों में कभी भ्रम नहीं होगा।

सबसे पहले “से” का अर्थ समझिए

दोनों समासों में “से” शब्द अवश्य आता है, लेकिन उसका कार्य अलग-अलग होता है।

करण तत्पुरुष में “से” यह बताता है कि कोई कार्य किस साधन या माध्यम से सम्पन्न हुआ।

उदाहरण—

हस्तलिखित

हाथ से लिखित

यहाँ हाथ लिखने का साधन है।

दूसरी ओर—

पथभ्रष्ट

पथ से भ्रष्ट

यहाँ व्यक्ति पथ से अलग हो गया है। हाथ की तरह पथ कोई साधन नहीं है, बल्कि अलग होने का आधार है।

यही दोनों समासों का मूल अंतर है।

करण और अपादान का मूल सिद्धांत

नीचे दी गई सारणी इस अंतर को अत्यंत स्पष्ट रूप से समझाती है—

आधारकरण तत्पुरुषअपादान तत्पुरुष
लुप्त विभक्तिसे / के द्वारासे
“से” का अर्थसाधन, माध्यम, कारणअलग होना, दूर होना, मुक्त होना
पहला पदकार्य सम्पन्न करने वाला साधनजिससे अलग हुआ गया
संबंधकार्य का माध्यमवियोग या पृथक्करण
उदाहरणहस्तलिखितपथभ्रष्ट

यदि केवल इस सारणी का अर्थ समझ लिया जाए, तो दोनों समासों की पहचान अत्यंत सरल हो जाती है।

उदाहरणों द्वारा अंतर समझें

अब कुछ ऐसे उदाहरणों को साथ-साथ देखते हैं जिनमें दोनों समास स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देते हैं।

करण तत्पुरुषसमास-विग्रहअपादान तत्पुरुषसमास-विग्रह
हस्तलिखितहाथ से लिखितपथभ्रष्टपथ से भ्रष्ट
रेखांकितरेखा द्वारा अंकितऋणमुक्तऋण से मुक्त
शोकग्रस्तशोक से ग्रस्तभयमुक्तभय से मुक्त
कष्टसाध्यकष्ट से साध्यदेशनिकालादेश से निकाला
स्वरचितस्वयं द्वारा रचितजन्मांधजन्म से अंध

यदि इन उदाहरणों का ध्यानपूर्वक विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि करण में पहला पद कार्य को सम्पन्न करा रहा है, जबकि अपादान में वही पद किसी वियोग या मुक्ति का आधार बन रहा है।

“हस्तलिखित” और “पथभ्रष्ट” का विश्लेषण

इन दोनों शब्दों को विद्यार्थी अक्सर साथ में पढ़ते हैं, इसलिए इन्हें विस्तार से समझना आवश्यक है।

1. हस्तलिखित

समास-विग्रह—

हाथ से लिखित

यहाँ हाथ लिखने का साधन है। यदि हाथ न हो, तो लिखने की क्रिया उसी रूप में सम्भव नहीं होगी।

अतः—

  • हाथ = साधन
  • “से” = करण कारक
  • समास = करण तत्पुरुष
2. पथभ्रष्ट

समास-विग्रह—

पथ से भ्रष्ट

यहाँ पथ कोई साधन नहीं है। इसका अर्थ है—सही मार्ग से हट जाना।

अतः—

  • पथ = जिससे अलग हुआ
  • “से” = अपादान कारक
  • समास = अपादान तत्पुरुष

यही सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।

किन शब्दों में करण होगा और किनमें अपादान?

नीचे दी गई सारणी पहचान को और सरल बना देती है—

यदि अर्थ यह हो…समास
किसी साधन से कार्य हुआकरण तत्पुरुष
किसी माध्यम द्वारा कार्य हुआकरण तत्पुरुष
किसी कारण से अवस्था उत्पन्न हुईकरण तत्पुरुष
किसी वस्तु से अलग हुआअपादान तत्पुरुष
किसी बंधन से मुक्त हुआअपादान तत्पुरुष
किसी स्थान से दूर हुआअपादान तत्पुरुष

इस प्रकार अर्थ का विश्लेषण ही सही समास तक पहुँचने का सबसे विश्वसनीय माध्यम है।

विद्यार्थी सबसे अधिक कहाँ गलती करते हैं?

अभ्यास के दौरान कुछ सामान्य त्रुटियाँ बार-बार देखने को मिलती हैं। यदि इन पर पहले से ध्यान दिया जाए, तो अधिकांश गलतियाँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

सामान्य गलतीसही विश्लेषण
“से” देखकर सीधे करण तत्पुरुष मान लेनापहले देखें “से” साधन है या अलग होने का भाव।
“पथभ्रष्ट” को करण तत्पुरुष लिख देनायहाँ पथ साधन नहीं, बल्कि जिससे अलग हुआ है।
“शोकग्रस्त” को अपादान समझ लेनाशोक कारण है, इसलिए करण तत्पुरुष।
“ऋणमुक्त” को करण समझ लेनायहाँ ऋण से मुक्ति मिली है, इसलिए अपादान तत्पुरुष।
केवल विभक्ति देखकर उत्तर देनाविभक्ति का अर्थ समझना आवश्यक है।

एक साथ सभी प्रमुख उदाहरण

नीचे करण और अपादान दोनों के महत्वपूर्ण उदाहरण एक साथ दिए जा रहे हैं, जिससे दोनों की तुलना तुरंत की जा सके।

करण तत्पुरुषअपादान तत्पुरुष
हस्तलिखितपथभ्रष्ट
रेखांकितऋणमुक्त
स्वरचितभयमुक्त
शोकग्रस्तदेशनिकाला
मदांधजन्मांध
कष्टसाध्यरणविमुख
श्रमसाध्यगृहत्यागी

इन उदाहरणों को साथ-साथ पढ़ने से दोनों समासों के बीच का अंतर लंबे समय तक स्मरण रहता है।

पहचान की अंतिम जाँच

यदि किसी शब्द को देखकर अभी भी संदेह हो, तो निम्न क्रम अपनाइए—

स्वयं से पूछेंयदि उत्तर “हाँ” हैसमास
क्या पहला पद कार्य का साधन या माध्यम है?करण तत्पुरुष
क्या पहला पद कार्य का कारण है?करण तत्पुरुष
क्या पहला पद किसी वियोग या अलगाव का आधार है?अपादान तत्पुरुष
क्या “से” हटने, मुक्त होने या दूर होने का भाव दे रहा है?अपादान तत्पुरुष

यह छोटी-सी जाँच अधिकांश वस्तुनिष्ठ तथा वर्णनात्मक प्रश्नों में सही उत्तर तक पहुँचने में सहायता करती है

सम्प्रदान तत्पुरुष समास

तत्पुरुष समास के अंतर्गत अब तक हमने कर्म तत्पुरुष तथा करण तत्पुरुष का विस्तार से अध्ययन किया। इन दोनों में समास-विग्रह करते समय क्रमशः “को” तथा “से / के द्वारा” का लोप होता है। अब हम तत्पुरुष समास के तीसरे महत्वपूर्ण भेद सम्प्रदान तत्पुरुष समास को समझेंगे।

यह समास देखने में अपेक्षाकृत सरल प्रतीत होता है, लेकिन व्यवहार में विद्यार्थी इसे कई बार सम्बन्ध तत्पुरुष अथवा कर्म तत्पुरुष के साथ मिला देते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वे “के लिए” और “का” के अर्थ में अंतर नहीं कर पाते। यदि इस मूल अंतर को समझ लिया जाए, तो सम्प्रदान तत्पुरुष की पहचान अत्यंत सरल हो जाती है।

दैनिक जीवन में प्रयुक्त विद्यालय, रसोईघर, हवनसामग्री, सभाभवन, हथकड़ी, सत्याग्रह, परीक्षा भवन जैसे अनेक शब्द सम्प्रदान तत्पुरुष समास के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये सभी शब्द किसी उद्देश्य, प्रयोजन अथवा उपयोग का बोध कराते हैं।

सम्प्रदान तत्पुरुष समास की परिभाषा

जिस तत्पुरुष समास में दोनों पदों के बीच सम्प्रदान कारक की विभक्ति “के लिए” का लोप हो जाता है, उसे सम्प्रदान तत्पुरुष समास कहते हैं।

अर्थात् यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “के लिए” शब्द प्राप्त हो, तो वह सम्प्रदान तत्पुरुष समास कहलाता है।

इसे सरल शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है—

जहाँ कोई वस्तु, स्थान, साधन या व्यवस्था किसी विशेष उद्देश्य या प्रयोजन के लिए हो और समास बनने पर “के लिए” का लोप हो जाए, वहाँ सम्प्रदान तत्पुरुष समास होता है।

सम्प्रदान कारक क्या होता है?

सम्प्रदान तत्पुरुष को समझने के लिए पहले सम्प्रदान कारक की अवधारणा समझना आवश्यक है। व्याकरण में जिस व्यक्ति, वस्तु या उद्देश्य के लिए कोई कार्य किया जाता है अथवा कोई वस्तु निर्धारित होती है, वहाँ सम्प्रदान कारक होता है।

उदाहरण—

  • विद्यार्थी पढ़ाई के लिए विद्यालय जाता है।
  • यज्ञ के लिए हवन सामग्री लाई गई।
  • सभा के लिए भवन तैयार किया गया।
  • परीक्षा के लिए अलग कक्ष बनाया गया।

इन सभी वाक्यों में “के लिए” उद्देश्य या प्रयोजन का बोध करा रहा है। यही सम्प्रदान कारक का आधार है।

सम्प्रदान तत्पुरुष समास का मूल सिद्धांत

सम्प्रदान तत्पुरुष समास में पहला पद यह बताता है कि दूसरा पद किस उद्देश्य के लिए है।

दूसरे शब्दों में—

पहला पद = उद्देश्य

दूसरा पद = वस्तु, स्थान या साधन

उदाहरण—

विद्यालय

विद्या के लिए आलय

यहाँ आलय (स्थान) विद्या प्राप्त करने के उद्देश्य से बनाया गया है।

इसी प्रकार—

रसोईघर

रसोई के लिए घर

घर का वह भाग जिसका उद्देश्य भोजन बनाना है।

यही प्रयोजन का संबंध सम्प्रदान तत्पुरुष समास की पहचान है।

सम्प्रदान तत्पुरुष समास की पहचान

यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करते समय दोनों पदों के बीच “के लिए” सहज रूप से लगाया जा सके और अर्थ पूर्णतः स्वाभाविक लगे, तो वह सामान्यतः सम्प्रदान तत्पुरुष समास होगा। नीचे दिए गए उदाहरणों को ध्यानपूर्वक देखें—

सामासिक शब्दसमास-विग्रहउद्देश्य
विद्यालयविद्या के लिए आलयशिक्षा
रसोईघररसोई के लिए घरभोजन बनाना
सभाभवनसभा के लिए भवनसभा आयोजित करना
परीक्षा भवनपरीक्षा के लिए भवनपरीक्षा
हवनसामग्रीहवन के लिए सामग्रीहवन
हथकड़ीहाथ के लिए कड़ीहाथ बाँधना
सत्याग्रहसत्य के लिए आग्रहसत्य की प्राप्ति

इन सभी उदाहरणों में पहला पद किसी उद्देश्य या प्रयोजन का बोध कराता है।

सम्प्रदान तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ

सम्प्रदान तत्पुरुष समास की सही पहचान के लिए उसकी विशेषताओं को समझना आवश्यक है।

विशेषताविवरण
यह तत्पुरुष समास का उपभेद है।उत्तरपद प्रधान रहता है।
“के लिए” का लोप होता है।समास-विग्रह में स्पष्ट दिखाई देता है।
पहला पद उद्देश्य या प्रयोजन बताता है।उसी के लिए दूसरा पद बना होता है।
दूसरा पद स्थान, साधन, सामग्री या व्यवस्था का बोध कराता है।जैसे—आलय, भवन, सामग्री, घर।
समस्त पद किसी उपयोग या उद्देश्य को व्यक्त करता है।यही इसकी प्रमुख पहचान है।

इन विशेषताओं को ध्यान में रखकर सम्प्रदान तत्पुरुष की पहचान सरलता से की जा सकती है।

सम्प्रदान तत्पुरुष समास की संरचना

इस समास का निर्माण भी अन्य तत्पुरुष समासों की भाँति दो पदों के मेल से होता है। अंतर केवल इतना है कि यहाँ दोनों पदों के बीच “के लिए” का लोप होता है।

मूल वाक्यांशलुप्त विभक्तिसमस्त पद
विद्या के लिए आलयके लिएविद्यालय
रसोई के लिए घरके लिएरसोईघर
सभा के लिए भवनके लिएसभाभवन
परीक्षा के लिए भवनके लिएपरीक्षा भवन
हवन के लिए सामग्रीके लिएहवनसामग्री
हाथ के लिए कड़ीके लिएहथकड़ी
सत्य के लिए आग्रहके लिएसत्याग्रह

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि समस्त पद बनने पर केवल “के लिए” हटता है, जबकि अर्थ यथावत बना रहता है।

उत्तरपद की प्रधानता यहाँ कैसे दिखाई देती है?

सम्प्रदान तत्पुरुष में भी अन्य तत्पुरुष समासों की तरह उत्तरपद ही प्रधान होता है। उदाहरण—

विद्यालय

विद्या के लिए आलय

यहाँ मुख्य अर्थ “आलय” (स्थान) से बन रहा है। “विद्या” केवल उसका उद्देश्य बता रही है।

इसी प्रकार—

हवनसामग्री

हवन के लिए सामग्री

यहाँ मुख्य शब्द “सामग्री” है। “हवन” केवल यह स्पष्ट करता है कि सामग्री किस प्रयोजन के लिए है।

यही कारण है कि सम्प्रदान तत्पुरुष में भी उत्तरपद को प्रधान माना जाता है।

सम्प्रदान तत्पुरुष समास को समझने का मूल सूत्र

यदि सम्प्रदान तत्पुरुष की पूरी अवधारणा को एक वाक्य में समझना हो, तो उसे इस प्रकार याद रखा जा सकता है—

जहाँ समास-विग्रह में “के लिए” सहज रूप से लगाया जा सके और पहला पद दूसरे पद के उद्देश्य या प्रयोजन का बोध कराए, वहाँ सम्प्रदान तत्पुरुष समास होता है।

यह सूत्र आगे आने वाले उदाहरणों और तुलनात्मक अध्ययन को समझने में आधार का कार्य करेगा।

सम्प्रदान तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण (विस्तृत विश्लेषण)

सम्प्रदान तत्पुरुष समास की परिभाषा और उसकी संरचना को समझ लेने के बाद अब उसके उदाहरणों का विस्तृत अध्ययन करना आवश्यक है। किसी भी समास की वास्तविक समझ तभी विकसित होती है जब उसके विभिन्न प्रकार के शब्दों का विश्लेषण किया जाए और यह देखा जाए कि प्रत्येक शब्द में “के लिए” का संबंध किस प्रकार स्थापित हो रहा है।

सम्प्रदान तत्पुरुष समास के अधिकांश उदाहरण किसी उद्देश्य, उपयोग, प्रयोजन, व्यवस्था, स्थान या सामग्री का बोध कराते हैं। यही कारण है कि इस प्रकार के शब्द हमारे दैनिक जीवन में भी बड़ी संख्या में प्रयुक्त होते हैं।

आइए अब इन्हें अलग-अलग श्रेणियों में समझते हैं।

(क) स्थान या भवन का उद्देश्य बताने वाले उदाहरण

इस प्रकार के शब्दों में दूसरा पद सामान्यतः किसी स्थान, भवन या कक्ष का बोध कराता है, जबकि पहला पद यह स्पष्ट करता है कि वह स्थान किस उद्देश्य के लिए बनाया गया है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहउद्देश्य
विद्यालयविद्या के लिए आलयशिक्षा
सभाभवनसभा के लिए भवनसभा आयोजित करना
रसोईघररसोई के लिए घरभोजन बनाना
परीक्षा भवनपरीक्षा के लिए भवनपरीक्षा आयोजित करना
व्यायामशालाव्यायाम के लिए शालाव्यायाम करना
पुस्तकालयपुस्तकों के लिए आलयपुस्तकों का संग्रह एवं अध्ययन
इन उदाहरणों को समझें

यदि इन सभी शब्दों का विश्लेषण किया जाए, तो एक समान बात सामने आती है। पहला पद किसी कार्य या उद्देश्य का बोध कराता है, जबकि दूसरा पद उस उद्देश्य के लिए बने स्थान का।

उदाहरण—

  • विद्या के लिए आलय → विद्यालय
  • व्यायाम के लिए शाला → व्यायामशाला
  • सभा के लिए भवन → सभाभवन

इन सभी में “के लिए” का संबंध पूरी तरह स्पष्ट दिखाई देता है।

(ख) सामग्री या साधनों का उद्देश्य बताने वाले उदाहरण

कुछ सम्प्रदान तत्पुरुष समास ऐसे होते हैं जिनमें दूसरा पद किसी सामग्री, वस्तु या उपकरण का बोध कराता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहउद्देश्य
हवनसामग्रीहवन के लिए सामग्रीहवन
पूजासामग्रीपूजा के लिए सामग्रीपूजा
लेखनसामग्रीलेखन के लिए सामग्रीलिखना
खेलसामग्रीखेल के लिए सामग्रीखेल
शिक्षासामग्रीशिक्षा के लिए सामग्रीशिक्षण कार्य
इन उदाहरणों का विश्लेषण

यहाँ दूसरा पद “सामग्री” है और पहला पद यह बताता है कि वह सामग्री किस कार्य में प्रयुक्त होगी।

उदाहरण—

  • पूजा के लिए सामग्री
  • खेल के लिए सामग्री
  • लेखन के लिए सामग्री

अर्थात् पहला पद केवल उपयोग या प्रयोजन स्पष्ट कर रहा है।

(ग) किसी कार्य के उद्देश्य को व्यक्त करने वाले उदाहरण

कुछ सामासिक शब्दों में उद्देश्य किसी भवन या सामग्री का नहीं, बल्कि किसी विचार, कार्य या प्रयास का होता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहउद्देश्य
सत्याग्रहसत्य के लिए आग्रहसत्य की प्राप्ति
धर्मयुद्धधर्म के लिए युद्धधर्म की रक्षा
जनसेवाजन के लिए सेवाजनता की सेवा
राष्ट्रसेवाराष्ट्र के लिए सेवाराष्ट्र का हित
समाजसेवासमाज के लिए सेवासमाज का कल्याण
इन उदाहरणों को समझें

इन सभी शब्दों में कोई वस्तु नहीं, बल्कि एक उद्देश्य प्रमुख है।

उदाहरण—

सत्याग्रह

सत्य के लिए आग्रह

यहाँ आग्रह का उद्देश्य सत्य है।

इसी प्रकार—

राष्ट्रसेवा

राष्ट्र के लिए सेवा

सेवा का उद्देश्य राष्ट्र है।

इस प्रकार प्रयोजन का संबंध सम्प्रदान कारक को स्पष्ट करता है।

(घ) दैनिक जीवन में प्रयुक्त सामान्य उदाहरण

सम्प्रदान तत्पुरुष समास केवल साहित्यिक भाषा तक सीमित नहीं है। दैनिक जीवन में भी ऐसे अनेक शब्द प्रयुक्त होते हैं।

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
हथकड़ीहाथ के लिए कड़ी
नथनीनाक के लिए आभूषण
कानबालीकान के लिए बाली
जूतारैकजूते के लिए रैक
पुस्तकरैकपुस्तकों के लिए रैक

इन उदाहरणों में पहला पद यह स्पष्ट करता है कि वस्तु का उपयोग किसके लिए किया जाता है।

परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण उदाहरण

कुछ उदाहरण ऐसे हैं जो वर्षों से विभिन्न प्रश्नपत्रों में पूछे जाते रहे हैं। इनका अभ्यास विशेष रूप से उपयोगी होता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
विद्यालयविद्या के लिए आलय
पुस्तकालयपुस्तकों के लिए आलय
व्यायामशालाव्यायाम के लिए शाला
सभाभवनसभा के लिए भवन
रसोईघररसोई के लिए घर
हवनसामग्रीहवन के लिए सामग्री
पूजासामग्रीपूजा के लिए सामग्री
सत्याग्रहसत्य के लिए आग्रह
राष्ट्रसेवाराष्ट्र के लिए सेवा
समाजसेवासमाज के लिए सेवा

इन शब्दों का नियमित अभ्यास सम्प्रदान तत्पुरुष समास की पहचान को मजबूत बनाता है।

इन उदाहरणों का तुलनात्मक विश्लेषण

अब तक दिए गए सभी उदाहरणों का यदि एक साथ अध्ययन किया जाए, तो एक निश्चित व्याकरणिक संरचना स्पष्ट दिखाई देती है।

सामासिक शब्ददूसरा पद क्या है?पहला पद क्या बता रहा है?“के लिए” लग रहा है?समास
विद्यालयआलयउद्देश्यसम्प्रदान तत्पुरुष
व्यायामशालाशालाउद्देश्यसम्प्रदान तत्पुरुष
हवनसामग्रीसामग्रीउपयोगसम्प्रदान तत्पुरुष
राष्ट्रसेवासेवाउद्देश्यसम्प्रदान तत्पुरुष
सत्याग्रहआग्रहप्रयोजनसम्प्रदान तत्पुरुष
रसोईघरघरउपयोगसम्प्रदान तत्पुरुष

इस सारणी से स्पष्ट हो जाता है कि सम्प्रदान तत्पुरुष में पहला पद सदैव उद्देश्य, प्रयोजन या उपयोग का बोध कराता है, जबकि दूसरा पद उसी उद्देश्य से जुड़ी वस्तु, स्थान, सामग्री या कार्य को व्यक्त करता है।

सम्प्रदान तत्पुरुष की पहचान करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

सम्प्रदान तत्पुरुष की पहचान का सबसे सरल उपाय यह है कि पहले समास-विग्रह करें और देखें कि क्या दोनों पदों के बीच “के लिए” स्वाभाविक रूप से लगाया जा सकता है। यदि “के लिए” जोड़ने पर अर्थ स्पष्ट, पूर्ण और स्वाभाविक बनता है, तो वह सम्प्रदान तत्पुरुष होने की प्रबल संभावना है।

साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कई शब्दों में “का”, “की”, “के” भी स्वाभाविक लग सकते हैं। ऐसी स्थिति में अर्थ का विश्लेषण करना आवश्यक है। यदि पहला पद केवल संबंध बता रहा है, तो वह सम्बन्ध तत्पुरुष होगा; लेकिन यदि वह किसी वस्तु, स्थान या कार्य का उद्देश्य बता रहा है, तो वह सम्प्रदान तत्पुरुष कहलाएगा। यही सूक्ष्म अंतर दोनों समासों की सही पहचान का आधार है।

सम्प्रदान तत्पुरुष समास और सम्बन्ध तत्पुरुष समास में अंतर

सम्प्रदान तत्पुरुष समास का अध्ययन करने के बाद अब उसके सबसे निकट प्रतीत होने वाले समास सम्बन्ध तत्पुरुष से उसका अंतर समझना आवश्यक है। व्यवहार में सबसे अधिक भ्रम इन्हीं दोनों समासों के बीच होता है। इसका कारण यह है कि दोनों में पहला और दूसरा पद किसी-न-किसी प्रकार से जुड़े होते हैं, इसलिए कई बार विद्यार्थी बिना समास-विग्रह किए ही उत्तर लिख देते हैं।

किन्तु व्याकरण की दृष्टि से दोनों समासों का आधार पूर्णतः अलग है। सम्प्रदान तत्पुरुष में उद्देश्य (Purpose) प्रधान होता है, जबकि सम्बन्ध तत्पुरुष में स्वामित्व या संबंध (Possession / Relation) प्रधान होता है।

यदि इस एक अंतर को स्पष्ट रूप से समझ लिया जाए, तो दोनों समासों की पहचान करना अत्यंत सरल हो जाता है।

सबसे पहले “के लिए” और “का” का अंतर समझिए

सम्प्रदान तत्पुरुष में समास-विग्रह करने पर सामान्यतः “के लिए” प्राप्त होता है।

उदाहरण—

विद्यालय

विद्या के लिए आलय

यहाँ आलय (स्थान) का उद्देश्य विद्या प्राप्त करना है।

इसके विपरीत सम्बन्ध तत्पुरुष में समास-विग्रह करने पर “का”, “की” या “के” प्राप्त होता है।

उदाहरण—

राजपुत्र

राजा का पुत्र

यहाँ “पुत्र” किसी उद्देश्य के लिए नहीं है, बल्कि उसका संबंध राजा से है।

यही दोनों समासों का मूल अंतर है।

सम्प्रदान और सम्बन्ध का मूल सिद्धांत

नीचे दी गई सारणी दोनों समासों के बीच का अंतर स्पष्ट करती है—

आधारसम्प्रदान तत्पुरुषसम्बन्ध तत्पुरुष
लुप्त विभक्तिके लिएका / की / के
पहला पद क्या बताता है?उद्देश्य या प्रयोजनस्वामित्व या संबंध
मुख्य प्रश्नकिसके लिए?किसका?
संबंध का प्रकारउपयोग या प्रयोजनअधिकार, संबंध या स्वामित्व
उदाहरणविद्यालयराजपुत्र

यदि यह सारणी ध्यान में रहे, तो दोनों समासों में भ्रम की संभावना बहुत कम रह जाती है।

उदाहरणों द्वारा अंतर समझें

अब दोनों समासों के प्रमुख उदाहरणों को साथ-साथ देखकर अंतर समझते हैं।

सम्प्रदान तत्पुरुषसमास-विग्रहसम्बन्ध तत्पुरुषसमास-विग्रह
विद्यालयविद्या के लिए आलयराजपुत्रराजा का पुत्र
रसोईघररसोई के लिए घरगृहस्वामीगृह का स्वामी
हवनसामग्रीहवन के लिए सामग्रीग्रामप्रधानग्राम का प्रधान
सभाभवनसभा के लिए भवनदेवालयदेव का आलय
सत्याग्रहसत्य के लिए आग्रहहिमालयहिम का आलय

यदि इन उदाहरणों का विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि सम्प्रदान में पहला पद उद्देश्य बताता है, जबकि सम्बन्ध में वही पद स्वामित्व या संबंध का बोध कराता है।

“विद्यालय” और “राजपुत्र” का विश्लेषण

इन दोनों शब्दों को विस्तार से समझने से सम्प्रदान और सम्बन्ध का अंतर पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है।

विद्यालय

समास-विग्रह—

विद्या के लिए आलय

यहाँ आलय का निर्माण शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से हुआ है।

अतः—

  • विद्या = उद्देश्य
  • “के लिए” = सम्प्रदान कारक
  • समास = सम्प्रदान तत्पुरुष
राजपुत्र

समास-विग्रह—

राजा का पुत्र

यहाँ पुत्र का राजा से संबंध बताया जा रहा है।

अतः—

  • राजा = संबंध
  • “का” = सम्बन्ध कारक
  • समास = सम्बन्ध तत्पुरुष

दोनों शब्दों की संरचना समान दिखाई देती है, लेकिन दोनों का व्याकरणिक संबंध अलग है।

पहचान का सबसे सरल नियम

किसी भी सामासिक शब्द को देखकर निम्न प्रश्न पूछिए—

  • क्या दूसरा पद किसी उद्देश्य के लिए है?
  • या फिर दूसरा पद पहले पद से संबंधित है?

यदि उत्तर “उद्देश्य” है, तो वह सम्प्रदान तत्पुरुष होगा।

यदि उत्तर “संबंध” है, तो वह सम्बन्ध तत्पुरुष होगा।

उदाहरण—

  • पुस्तकालय → पुस्तकों के लिए आलय ✔
  • राष्ट्रसेवा → राष्ट्र के लिए सेवा ✔

लेकिन—

  • गृहस्वामी → गृह का स्वामी ✔
  • जलपात्र → जल का पात्र ✔

सामान्य गलतियाँ

सम्प्रदान और सम्बन्ध तत्पुरुष की पहचान करते समय विद्यार्थी प्रायः निम्न त्रुटियाँ करते हैं—

सामान्य गलतीसही विश्लेषण
विद्यालय को सम्बन्ध तत्पुरुष मान लेनाविद्या के लिए आलय → सम्प्रदान तत्पुरुष
पुस्तकालय में “का” जोड़ देनासही विग्रह: पुस्तकों के लिए आलय
राजपुत्र को सम्प्रदान तत्पुरुष समझ लेनाराजा का पुत्र → सम्बन्ध तत्पुरुष
गृहस्वामी में “के लिए” जोड़नासही विग्रह: गृह का स्वामी
केवल शब्द देखकर उत्तर देनापहले समास-विग्रह करें, फिर कारक पहचानें।

एक साथ तुलना

नीचे दी गई सारणी दोनों समासों का त्वरित पुनरावलोकन कराती है—

समासलुप्त विभक्तिपहला पद क्या बताता है?उदाहरण
सम्प्रदान तत्पुरुषके लिएउद्देश्य / प्रयोजनविद्यालय
सम्बन्ध तत्पुरुषका / की / केसंबंध / स्वामित्वराजपुत्र
सम्प्रदान तत्पुरुषके लिएउपयोगहवनसामग्री
सम्बन्ध तत्पुरुषका / की / केअधिकारगृहस्वामी
सम्प्रदान तत्पुरुषके लिएप्रयोजनसत्याग्रह
सम्बन्ध तत्पुरुषका / की / केसंबंधदेवालय

पहचान की अंतिम जाँच

यदि किसी शब्द के बारे में निर्णय लेने में कठिनाई हो रही हो, तो निम्न क्रम अपनाइए—

स्वयं से पूछेंयदि उत्तर “हाँ” हैसमास
क्या “के लिए” लगाने पर अर्थ स्वाभाविक बनता है?सम्प्रदान तत्पुरुष
क्या पहला पद उद्देश्य बता रहा है?सम्प्रदान तत्पुरुष
क्या “का / की / के” लगाने पर अर्थ बनता है?सम्बन्ध तत्पुरुष
क्या पहला पद केवल संबंध या स्वामित्व बता रहा है?सम्बन्ध तत्पुरुष

इस प्रकार किसी भी सामासिक शब्द का पहले समास-विग्रह और फिर कारक-संबंध का विश्लेषण करके सम्प्रदान तथा सम्बन्ध तत्पुरुष के बीच सही निर्णय लिया जा सकता है। यही पद्धति वस्तुनिष्ठ प्रश्नों, वर्णनात्मक उत्तरों तथा समास-विश्लेषण से जुड़े सभी प्रश्नों में सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होती है।

सम्बन्ध तत्पुरुष समास

तत्पुरुष समास के अंतर्गत अब तक हमने कर्म, करण तथा सम्प्रदान तत्पुरुष का विस्तार से अध्ययन किया। इन तीनों उपभेदों की पहचान क्रमशः “को”, “से / के द्वारा” तथा “के लिए” के आधार पर होती है। अब हम तत्पुरुष समास के सबसे अधिक प्रचलित और सर्वाधिक पूछे जाने वाले भेद सम्बन्ध तत्पुरुष समास का अध्ययन करेंगे।

सम्बन्ध तत्पुरुष समास हिन्दी व्याकरण का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि दैनिक जीवन में प्रयुक्त असंख्य सामासिक शब्द इसी श्रेणी में आते हैं। राजपुत्र, गृहस्वामी, देवालय, जलपात्र, हिमालय, ग्रामप्रधान, देशवासी, पुस्तकप्रेमी जैसे अनेक शब्द इसी समास के उदाहरण हैं।

इस समास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पहला और दूसरा पद किसी स्वामित्व, संबंध, अधिकार, अंग-प्रत्यंग, स्थान, व्यक्ति या वस्तु के माध्यम से जुड़े होते हैं। इसलिए इसकी पहचान अन्य तत्पुरुष समासों की अपेक्षा अपेक्षाकृत सरल होती है।

सम्बन्ध तत्पुरुष समास की परिभाषा

जिस तत्पुरुष समास में दोनों पदों के बीच सम्बन्ध कारक की विभक्तियाँ “का”, “की” अथवा “के” का लोप हो जाता है, उसे सम्बन्ध तत्पुरुष समास कहते हैं।

अर्थात् यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “का”, “की” या “के” प्राप्त हो, तो वह सम्बन्ध तत्पुरुष समास कहलाता है।

इसे सरल भाषा में इस प्रकार समझा जा सकता है—

जहाँ पहला पद दूसरे पद के साथ किसी प्रकार का संबंध, स्वामित्व, अधिकार, स्थान, अंग या पहचान व्यक्त करता हो और समास बनने पर “का”, “की” या “के” का लोप हो जाए, वहाँ सम्बन्ध तत्पुरुष समास होता है।

सम्बन्ध कारक क्या होता है?

सम्बन्ध तत्पुरुष को समझने के लिए सबसे पहले सम्बन्ध कारक की अवधारणा स्पष्ट होनी चाहिए। व्याकरण में जब एक संज्ञा का दूसरी संज्ञा के साथ अधिकार, स्वामित्व, संबंध, अंग, स्थान या पहचान का बोध कराया जाता है, तब सम्बन्ध कारक का प्रयोग होता है।

उदाहरण—

  • राजा का पुत्र
  • घर का स्वामी
  • देव का आलय
  • गाँव का प्रधान
  • हिम का आलय

इन सभी उदाहरणों में पहला पद दूसरे पद से किसी-न-किसी प्रकार से जुड़ा हुआ है। यही सम्बन्ध कारक का मूल आधार है।

सम्बन्ध तत्पुरुष समास का मूल सिद्धांत

सम्बन्ध तत्पुरुष समास में पहला पद दूसरे पद के साथ किसी प्रकार का संबंध स्थापित करता है। यह संबंध अनेक प्रकार का हो सकता है—

  • स्वामित्व का संबंध
  • पारिवारिक संबंध
  • स्थान का संबंध
  • अंग का संबंध
  • अधिकार का संबंध
  • पहचान का संबंध

उदाहरण—

राजपुत्र

राजा का पुत्र

यहाँ पुत्र का राजा से पारिवारिक संबंध है।

इसी प्रकार—

गृहस्वामी

गृह का स्वामी

यहाँ स्वामी का संबंध गृह से है।

दोनों ही उदाहरणों में पहला पद केवल संबंध व्यक्त कर रहा है।

सम्बन्ध तत्पुरुष समास की पहचान

यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करते समय दोनों पदों के बीच “का”, “की” या “के” सहज रूप से लगाया जा सके और अर्थ पूर्णतः स्वाभाविक बने, तो वह सामान्यतः सम्बन्ध तत्पुरुष समास होगा।

नीचे दिए गए उदाहरणों को ध्यानपूर्वक देखें—

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसंबंध
राजपुत्रराजा का पुत्रपारिवारिक संबंध
गृहस्वामीगृह का स्वामीस्वामित्व
ग्रामप्रधानग्राम का प्रधानप्रशासनिक संबंध
देवालयदेव का आलयस्थान संबंध
हिमालयहिम का आलयस्थान संबंध
जलपात्रजल का पात्रउपयोग संबंध
देशवासीदेश का वासीनिवास संबंध
पुस्तकप्रेमीपुस्तकों का प्रेमीरुचि संबंध

इन सभी उदाहरणों में पहला पद किसी-न-किसी प्रकार से दूसरे पद का संबंध स्पष्ट करता है।

सम्बन्ध तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ

सम्बन्ध तत्पुरुष समास की पहचान करते समय निम्न विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए—

विशेषताविवरण
यह तत्पुरुष समास का एक उपभेद है।उत्तरपद प्रधान रहता है।
“का”, “की”, “के” का लोप होता है।समास-विग्रह में स्पष्ट दिखाई देता है।
पहला पद संबंध या स्वामित्व व्यक्त करता है।दूसरा पद उसी से संबंधित होता है।
दूसरा पद मुख्य अर्थ देता है।पहला पद केवल उसका संबंध स्पष्ट करता है।
संबंध अनेक प्रकार का हो सकता है।व्यक्ति, स्थान, वस्तु, अधिकार, अंग आदि।

इन विशेषताओं को समझ लेने के बाद सम्बन्ध तत्पुरुष की पहचान करना अत्यंत सरल हो जाता है।

सम्बन्ध तत्पुरुष समास की संरचना

सम्बन्ध तत्पुरुष समास का निर्माण दो पदों के मेल से होता है, जिनके बीच “का”, “की” या “के” का लोप होता है।

मूल वाक्यांशलुप्त विभक्तिसमस्त पद
राजा का पुत्रकाराजपुत्र
गृह का स्वामीकागृहस्वामी
देव का आलयकादेवालय
हिम का आलयकाहिमालय
ग्राम का प्रधानकाग्रामप्रधान
देश का वासीकादेशवासी
जल का पात्रकाजलपात्र
पुस्तकों का प्रेमीकापुस्तकप्रेमी

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि समस्त पद बनने पर केवल सम्बन्ध कारक की विभक्ति हटती है, जबकि दोनों पदों के बीच का संबंध बना रहता है।

उत्तरपद की प्रधानता सम्बन्ध तत्पुरुष में कैसे दिखाई देती है?

अन्य सभी तत्पुरुष समासों की तरह सम्बन्ध तत्पुरुष में भी उत्तरपद ही मुख्य अर्थ प्रदान करता है।

उदाहरण—

गृहस्वामी

गृह का स्वामी

यहाँ मुख्य शब्द “स्वामी” है। “गृह” केवल यह बता रहा है कि स्वामी किसका है।

इसी प्रकार—

राजपुत्र

राजा का पुत्र

यहाँ मुख्य अर्थ “पुत्र” से बन रहा है। “राजा” केवल उसका संबंध स्पष्ट कर रहा है।

इसी कारण सम्बन्ध तत्पुरुष में भी उत्तरपद को प्रधान माना जाता है।

सम्बन्ध तत्पुरुष समास को समझने का मूल सूत्र

यदि इस पूरे समास को एक सरल नियम में याद रखना हो, तो निम्न सूत्र सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होता है—

जहाँ समास-विग्रह करने पर “का”, “की” या “के” स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो और पहला पद दूसरे पद का संबंध, अधिकार या स्वामित्व व्यक्त करे, वहाँ सम्बन्ध तत्पुरुष समास होता है।

सम्बन्ध तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण (विस्तृत विश्लेषण)

सम्बन्ध तत्पुरुष समास की परिभाषा, संरचना तथा पहचान को समझ लेने के बाद अब उसके उदाहरणों का विस्तार से अध्ययन करना आवश्यक है। व्याकरण में केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं होता कि समास-विग्रह में “का”, “की” या “के” आता है, बल्कि यह भी समझना आवश्यक है कि दोनों पदों के बीच किस प्रकार का संबंध स्थापित हो रहा है।

सम्बन्ध तत्पुरुष समास का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें केवल स्वामित्व का ही संबंध नहीं होता, बल्कि पारिवारिक संबंध, स्थान संबंध, अधिकार संबंध, निवास संबंध, वस्तु संबंध, अंग संबंध तथा पहचान संबंध भी सम्मिलित होते हैं। यही कारण है कि हिन्दी भाषा में प्रयुक्त सामासिक शब्दों का एक बड़ा भाग इसी श्रेणी में आता है।

आइए अब विभिन्न प्रकार के उदाहरणों के माध्यम से इसे विस्तार से समझते हैं।

(क) पारिवारिक संबंध बताने वाले उदाहरण

इस प्रकार के शब्दों में पहला पद किसी व्यक्ति का परिचय देता है और दूसरा पद उसके पारिवारिक संबंध को व्यक्त करता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसंबंध
राजपुत्रराजा का पुत्रपिता-पुत्र संबंध
राजकुमारीराजा की पुत्रीपिता-पुत्री संबंध
देवपुत्रदेव का पुत्रपारिवारिक संबंध
भरतपुत्रभरत का पुत्रवंश संबंध
दशरथनन्दनदशरथ का नन्दनपिता-पुत्र संबंध
इन उदाहरणों को समझें

इन सभी शब्दों में पहला पद दूसरे पद का परिचय देता है।

उदाहरण—

  • राजा का पुत्र → राजपुत्र
  • राजा की पुत्री → राजकुमारी
  • दशरथ का नन्दन → दशरथनन्दन

यहाँ किसी उद्देश्य या साधन का बोध नहीं हो रहा, बल्कि केवल संबंध व्यक्त हो रहा है।

(ख) स्वामित्व या अधिकार बताने वाले उदाहरण

इस प्रकार के शब्दों में पहला पद यह बताता है कि किसी वस्तु या स्थान पर किसका अधिकार या स्वामित्व है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसंबंध
गृहस्वामीगृह का स्वामीस्वामित्व
धनपतिधन का पति (स्वामी)स्वामित्व
ग्रामप्रधानग्राम का प्रधानप्रशासनिक संबंध
सेनापतिसेना का पति (प्रधान)अधिकार
कुलपतिकुल का पति (प्रधान)प्रशासनिक संबंध
इन उदाहरणों का विश्लेषण

यहाँ दूसरा पद किसी पद, अधिकार या स्वामित्व का बोध कराता है।

उदाहरण—

  • गृह का स्वामी
  • सेना का प्रधान
  • ग्राम का प्रधान

इन सभी में “का” का संबंध पूर्णतः स्पष्ट दिखाई देता है।

(ग) स्थान या निवास संबंध बताने वाले उदाहरण

कुछ सम्बन्ध तत्पुरुष समास ऐसे होते हैं जिनमें पहला पद किसी स्थान का बोध कराता है और दूसरा पद उस स्थान से संबंधित व्यक्ति या वस्तु का।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसंबंध
देशवासीदेश का वासीनिवास
नगरवासीनगर का वासीनिवास
ग्रामवासीग्राम का वासीनिवास
वनवासीवन का वासीनिवास
पर्वतवासीपर्वत का वासीनिवास
इन उदाहरणों को समझें

इन सभी शब्दों में पहला पद निवास स्थान का परिचय देता है।

उदाहरण—

  • देश का वासी
  • नगर का वासी
  • वन का वासी

यहाँ निवास का संबंध व्यक्त किया गया है।

(घ) वस्तु अथवा स्थान का संबंध बताने वाले उदाहरण

इस प्रकार के शब्दों में पहला पद किसी वस्तु या स्थान का परिचय देता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहसंबंध
जलपात्रजल का पात्रवस्तु संबंध
देवालयदेव का आलयस्थान संबंध
हिमालयहिम का आलयस्थान संबंध
पुस्तकप्रेमीपुस्तकों का प्रेमीरुचि संबंध
धर्मपालधर्म का पालकसंबंध
इन उदाहरणों का विश्लेषण

यदि इन शब्दों को ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि पहला पद दूसरे पद का केवल संबंध स्पष्ट कर रहा है।

उदाहरण—

  • जल का पात्र
  • देव का आलय
  • हिम का आलय

इनमें कहीं भी “के लिए” अथवा “से” का संबंध नहीं है।

परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण उदाहरण

कुछ सम्बन्ध तत्पुरुष समास ऐसे हैं जो विभिन्न परीक्षाओं में नियमित रूप से पूछे जाते हैं। इनका समास-विग्रह और समास का प्रकार अच्छी तरह याद होना चाहिए।

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
राजपुत्रराजा का पुत्र
गृहस्वामीगृह का स्वामी
देवालयदेव का आलय
हिमालयहिम का आलय
ग्रामप्रधानग्राम का प्रधान
देशवासीदेश का वासी
नगरवासीनगर का वासी
जलपात्रजल का पात्र
पुस्तकप्रेमीपुस्तकों का प्रेमी
सेनापतिसेना का प्रधान

इन शब्दों का नियमित अभ्यास सम्बन्ध तत्पुरुष समास की पहचान को अत्यंत सुदृढ़ बनाता है।

इन उदाहरणों का तुलनात्मक विश्लेषण

अब तक दिए गए सभी उदाहरणों का यदि एक साथ अध्ययन किया जाए, तो सम्बन्ध तत्पुरुष की मूल संरचना स्पष्ट दिखाई देती है।

सामासिक शब्ददूसरा पद क्या है?पहला पद क्या बता रहा है?“का / की / के” लग रहा है?समास
राजपुत्रपुत्रसंबंधसम्बन्ध तत्पुरुष
गृहस्वामीस्वामीस्वामित्वसम्बन्ध तत्पुरुष
देशवासीवासीनिवास संबंधसम्बन्ध तत्पुरुष
देवालयआलयस्थान संबंधसम्बन्ध तत्पुरुष
जलपात्रपात्रवस्तु संबंधसम्बन्ध तत्पुरुष
पुस्तकप्रेमीप्रेमीरुचि संबंधसम्बन्ध तत्पुरुष

यदि इस सारणी को ध्यानपूर्वक समझ लिया जाए, तो सम्बन्ध तत्पुरुष की पहचान अत्यंत सरल हो जाती है।

सम्बन्ध तत्पुरुष की पहचान करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

सम्बन्ध तत्पुरुष की पहचान करते समय सबसे पहले समास-विग्रह करना चाहिए। यदि दोनों पदों के बीच “का”, “की” या “के” लगाने पर अर्थ पूर्णतः स्वाभाविक बनता है और पहला पद दूसरे पद के साथ किसी प्रकार का संबंध, स्वामित्व, अधिकार, स्थान या पहचान व्यक्त करता है, तो वह सम्बन्ध तत्पुरुष समास होगा।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कुछ शब्दों में “के लिए” और “का” दोनों लगाने का भ्रम हो सकता है। ऐसी स्थिति में हमेशा यह देखिए कि पहला पद उद्देश्य बता रहा है या संबंध। यदि उद्देश्य है तो सम्प्रदान तत्पुरुष होगा, और यदि संबंध है तो सम्बन्ध तत्पुरुष। यही सूक्ष्म अंतर इन दोनों समासों की सही पहचान का सबसे विश्वसनीय आधार है।

अधिकरण तत्पुरुष समास

अब तक हम तत्पुरुष समास के चार प्रमुख भेदों—कर्म, करण, सम्प्रदान और सम्बन्ध तत्पुरुष—का विस्तार से अध्ययन कर चुके हैं। प्रत्येक भेद की पहचान उसके समास-विग्रह में प्रयुक्त कारक के आधार पर की जाती है। अब हम तत्पुरुष समास के पाँचवें महत्वपूर्ण भेद अधिकरण तत्पुरुष समास को समझेंगे।

अधिकरण तत्पुरुष समास का संबंध मुख्यतः स्थान, आधार या स्थिति से होता है। जब कोई व्यक्ति, वस्तु या अवस्था किसी स्थान में, किसी वस्तु पर अथवा किसी आधार पर स्थित होती है, तब अधिकरण कारक का प्रयोग होता है। समास बनने पर इसी कारक की विभक्ति का लोप हो जाता है।

दैनिक जीवन और साहित्य में जलमग्न, वनवास, शरणागत, गृहप्रवेश, आसनस्थ, रणभूमिस्थ, सिंहासनारूढ़ जैसे अनेक शब्द इसी समास के उदाहरण हैं। इन शब्दों का अर्थ तभी स्पष्ट होता है जब इनके भीतर छिपे “में” या “पर” के संबंध को समझा जाए।


अधिकरण तत्पुरुष समास की परिभाषा

जिस तत्पुरुष समास में दोनों पदों के बीच अधिकरण कारक की विभक्ति “में” अथवा “पर” का लोप हो जाता है, उसे अधिकरण तत्पुरुष समास कहते हैं।

अर्थात् यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “में” या “पर” प्राप्त हो, तो वह अधिकरण तत्पुरुष समास कहलाता है।

इसे सरल शब्दों में इस प्रकार भी समझा जा सकता है—

जहाँ कोई व्यक्ति, वस्तु या अवस्था किसी स्थान, आधार या स्थिति में अथवा उस पर स्थित हो और समास बनने पर “में” या “पर” का लोप हो जाए, वहाँ अधिकरण तत्पुरुष समास होता है।


अधिकरण कारक क्या होता है?

अधिकरण तत्पुरुष समास को सही ढंग से समझने के लिए पहले अधिकरण कारक की अवधारणा स्पष्ट होना आवश्यक है।

व्याकरण में जिस स्थान, आधार या स्थिति में कोई कार्य घटित होता है अथवा जहाँ कोई व्यक्ति या वस्तु स्थित होती है, वहाँ अधिकरण कारक होता है।

उदाहरण—

  • पक्षी पेड़ पर बैठा है।
  • नाव जल में तैर रही है।
  • विद्यार्थी कक्षा में बैठा है।
  • सैनिक रणभूमि में डटा हुआ है।
  • साधु आसन पर बैठा है।

इन सभी वाक्यों में “में” और “पर” स्थान या आधार का बोध करा रहे हैं। यही अधिकरण कारक का मूल आधार है।


अधिकरण तत्पुरुष समास का मूल सिद्धांत

अधिकरण तत्पुरुष समास में पहला पद सामान्यतः किसी स्थान, आधार या स्थिति का बोध कराता है, जबकि दूसरा पद यह बताता है कि उस स्थान में या उस पर क्या स्थिति उत्पन्न हुई है।

उदाहरण—

जलमग्न

जल में मग्न

यहाँ “जल” वह स्थान है जिसमें कोई वस्तु डूबी हुई है।

इसी प्रकार—

शरणागत

शरण में आगत

यहाँ व्यक्ति शरण में आया है।

दोनों ही उदाहरणों में “में” का संबंध स्पष्ट दिखाई देता है।


अधिकरण तत्पुरुष समास की पहचान

यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “में” या “पर” सहज रूप से लगाया जा सके और अर्थ पूर्णतः स्वाभाविक लगे, तो वह अधिकरण तत्पुरुष समास होगा।

नीचे दिए गए उदाहरणों को ध्यानपूर्वक देखें—

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअधिकरण (स्थान / आधार)
जलमग्नजल में मग्नजल
शरणागतशरण में आगतशरण
आसनस्थआसन पर स्थितआसन
गृहप्रवेशगृह में प्रवेशगृह
सिंहासनारूढ़सिंहासन पर आरूढ़सिंहासन
रणभूमिस्थरणभूमि में स्थितरणभूमि

इन सभी उदाहरणों में पहला पद किसी स्थान या आधार का बोध कराता है।


अधिकरण तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ

अधिकरण तत्पुरुष समास को सही प्रकार से पहचानने के लिए उसकी प्रमुख विशेषताओं को समझना आवश्यक है।

विशेषताविवरण
यह तत्पुरुष समास का एक उपभेद है।उत्तरपद प्रधान रहता है।
“में” या “पर” का लोप होता है।समास-विग्रह में स्पष्ट दिखाई देता है।
पहला पद स्थान, आधार या स्थिति का बोध कराता है।उसी में या उसी पर कार्य घटित होता है।
दूसरा पद अवस्था, क्रिया या स्थिति का बोध कराता है।जैसे—मग्न, आगत, स्थित, प्रवेश, आरूढ़।
समस्त पद किसी स्थान या आधार से जुड़ी स्थिति व्यक्त करता है।यही इसकी मुख्य पहचान है।

इन विशेषताओं को ध्यान में रखकर अधिकरण तत्पुरुष समास की पहचान आसानी से की जा सकती है।


अधिकरण तत्पुरुष समास की संरचना

अन्य तत्पुरुष समासों की तरह अधिकरण तत्पुरुष समास का निर्माण भी दो पदों के मेल से होता है। अंतर केवल इतना है कि यहाँ दोनों पदों के बीच “में” अथवा “पर” का लोप होता है।

मूल वाक्यांशलुप्त विभक्तिसमस्त पद
जल में मग्नमेंजलमग्न
शरण में आगतमेंशरणागत
गृह में प्रवेशमेंगृहप्रवेश
आसन पर स्थितपरआसनस्थ
सिंहासन पर आरूढ़परसिंहासनारूढ़
रणभूमि में स्थितमेंरणभूमिस्थ

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि समस्त पद बनने पर केवल अधिकरण कारक की विभक्ति हटती है, जबकि दोनों पदों के बीच स्थान या आधार का संबंध बना रहता है।


उत्तरपद की प्रधानता अधिकरण तत्पुरुष में कैसे दिखाई देती है?

अधिकरण तत्पुरुष में भी उत्तरपद ही मुख्य अर्थ प्रदान करता है।

उदाहरण—

जलमग्न

जल में मग्न

यहाँ मुख्य अर्थ “मग्न” शब्द से बन रहा है। “जल” केवल यह बता रहा है कि मग्न होने की स्थिति कहाँ उत्पन्न हुई है।

इसी प्रकार—

आसनस्थ

आसन पर स्थित

यहाँ मुख्य अर्थ “स्थित” (स्थ) है, जबकि “आसन” केवल स्थान का बोध कराता है।

इस प्रकार अन्य तत्पुरुष समासों की तरह अधिकरण तत्पुरुष में भी उत्तरपद ही प्रधान रहता है।


अधिकरण तत्पुरुष समास को समझने का मूल सूत्र

यदि इस पूरे समास को एक सरल नियम में याद रखना हो, तो निम्न सूत्र सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होता है—

जहाँ समास-विग्रह करते समय “में” या “पर” स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो और पहला पद किसी स्थान, आधार या स्थिति का बोध कराए, वहाँ अधिकरण तत्पुरुष समास होता है।

अधिकरण तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण (विस्तृत विश्लेषण)

अधिकरण तत्पुरुष समास की परिभाषा, संरचना तथा पहचान को समझ लेने के बाद अब उसके उदाहरणों का विस्तार से अध्ययन करना आवश्यक है। किसी भी समास की वास्तविक समझ तब विकसित होती है जब उसके शब्दों का केवल समास-विग्रह ही नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे स्थान, आधार या स्थिति के संबंध को भी समझा जाए।

अधिकरण तत्पुरुष समास में पहला पद सामान्यतः किसी स्थान, आधार, आश्रय, स्थिति या स्थान विशेष का बोध कराता है, जबकि दूसरा पद यह बताता है कि उस स्थान में या उस पर क्या स्थिति उत्पन्न हुई है। यही कारण है कि इस प्रकार के शब्द साहित्य, धार्मिक ग्रंथों, समाचार-पत्रों तथा सामान्य बोलचाल की भाषा में भी बड़ी संख्या में मिलते हैं।

आइए अब विभिन्न प्रकार के उदाहरणों के माध्यम से अधिकरण तत्पुरुष समास को विस्तार से समझते हैं।


(क) “में” का बोध कराने वाले उदाहरण

इस प्रकार के शब्दों में पहला पद किसी ऐसे स्थान या आधार का बोध कराता है जिसके भीतर कोई व्यक्ति, वस्तु या अवस्था विद्यमान होती है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअधिकरण (स्थान)
जलमग्नजल में मग्नजल
शरणागतशरण में आगतशरण
गृहप्रवेशगृह में प्रवेशगृह
रणभूमिस्थरणभूमि में स्थितरणभूमि
वनवासवन में वासवन
कारागारबंदकारागार में बंदकारागार

इन उदाहरणों को समझें

इन सभी शब्दों में पहला पद किसी स्थान का बोध करा रहा है।

उदाहरण—

  • जल में मग्न
  • वन में वास
  • गृह में प्रवेश

इन तीनों उदाहरणों में “में” का प्रयोग स्थान को स्पष्ट कर रहा है। इसलिए ये अधिकरण तत्पुरुष समास हैं।


(ख) “पर” का बोध कराने वाले उदाहरण

कुछ अधिकरण तत्पुरुष समास ऐसे होते हैं जिनमें “में” के स्थान पर “पर” का प्रयोग अधिक उपयुक्त होता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअधिकरण (आधार)
आसनस्थआसन पर स्थितआसन
सिंहासनारूढ़सिंहासन पर आरूढ़सिंहासन
मंचस्थमंच पर स्थितमंच
रथारूढ़रथ पर आरूढ़रथ
पर्वतारूढ़पर्वत पर आरूढ़पर्वत

इन उदाहरणों का विश्लेषण

यहाँ पहला पद किसी आधार या स्थान का बोध करा रहा है जिस पर कोई व्यक्ति या वस्तु स्थित है।

उदाहरण—

  • आसन पर स्थित
  • मंच पर स्थित
  • सिंहासन पर आरूढ़

इन सभी उदाहरणों में “पर” का संबंध स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।


(ग) निवास या ठहराव का बोध कराने वाले उदाहरण

कुछ सामासिक शब्द किसी स्थान में रहने, ठहरने या निवास करने का अर्थ व्यक्त करते हैं।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअर्थ
वनवासवन में वासवन में रहना
गृहवासगृह में वासघर में रहना
नगरवासनगर में वासनगर में निवास
विदेशवासविदेश में वासविदेश में रहना
आश्रमवासआश्रम में वासआश्रम में निवास

इन उदाहरणों को समझें

इन सभी शब्दों में दूसरा पद “वास” है और पहला पद यह बताता है कि निवास कहाँ हो रहा है।

उदाहरण—

  • वन में वास
  • नगर में वास
  • आश्रम में वास

अर्थात् यहाँ पहला पद स्थान का बोध करा रहा है।


(घ) प्रवेश, स्थिति अथवा अवस्था व्यक्त करने वाले उदाहरण

इस प्रकार के शब्दों में कोई व्यक्ति या वस्तु किसी विशेष स्थान में पहुँचने या वहाँ स्थित होने की अवस्था व्यक्त करती है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअर्थ
गृहप्रवेशगृह में प्रवेशघर में प्रवेश
शरणागतशरण में आगतशरण में आया हुआ
जलमग्नजल में मग्नजल में डूबा हुआ
रणभूमिस्थरणभूमि में स्थितरणभूमि में स्थित
आसनस्थआसन पर स्थितआसन पर बैठा हुआ

इन सभी शब्दों में पहला पद स्थान अथवा आधार को स्पष्ट करता है और दूसरा पद उस स्थान से जुड़ी स्थिति का बोध कराता है।


परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण उदाहरण

कुछ अधिकरण तत्पुरुष समास ऐसे हैं जो विभिन्न परीक्षाओं में नियमित रूप से पूछे जाते हैं। इनका समास-विग्रह अच्छी तरह याद होना चाहिए।

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
जलमग्नजल में मग्न
शरणागतशरण में आगत
वनवासवन में वास
गृहप्रवेशगृह में प्रवेश
आसनस्थआसन पर स्थित
मंचस्थमंच पर स्थित
सिंहासनारूढ़सिंहासन पर आरूढ़
रथारूढ़रथ पर आरूढ़
रणभूमिस्थरणभूमि में स्थित
विदेशवासविदेश में वास

इन शब्दों का नियमित अभ्यास करने से अधिकरण तत्पुरुष समास की पहचान अत्यंत सरल हो जाती है।


इन उदाहरणों का तुलनात्मक विश्लेषण

अब तक दिए गए सभी उदाहरणों का यदि एक साथ अध्ययन किया जाए, तो अधिकरण तत्पुरुष की मूल संरचना स्पष्ट दिखाई देती है।

सामासिक शब्ददूसरा पद क्या बता रहा है?पहला पद क्या बता रहा है?“में / पर” लग रहा है?समास
जलमग्नअवस्थास्थानअधिकरण तत्पुरुष
शरणागतआगमनस्थानअधिकरण तत्पुरुष
वनवासनिवासस्थानअधिकरण तत्पुरुष
आसनस्थस्थितिआधारअधिकरण तत्पुरुष
सिंहासनारूढ़स्थितिआधारअधिकरण तत्पुरुष
गृहप्रवेशप्रवेशस्थानअधिकरण तत्पुरुष

यदि इस सारणी का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि अधिकरण तत्पुरुष में पहला पद सदैव किसी स्थान, आधार या स्थिति का बोध कराता है।


अधिकरण तत्पुरुष की पहचान करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

अधिकरण तत्पुरुष समास की पहचान करते समय सबसे पहले समास-विग्रह करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि दोनों पदों के बीच “में” अथवा “पर” लगाने पर अर्थ स्वाभाविक बन रहा है या नहीं। यदि पहला पद किसी स्थान, आधार या स्थिति को व्यक्त कर रहा हो तथा दूसरा पद उसी स्थान से संबंधित अवस्था, प्रवेश, निवास या स्थिति का बोध करा रहा हो, तो वह अधिकरण तत्पुरुष समास होगा।

ध्यान रहे कि कुछ शब्दों में “में” और “से” दोनों लगाने का भ्रम हो सकता है। ऐसी स्थिति में यह समझना आवश्यक है कि पहला पद स्थान बता रहा है या साधन। यदि वह स्थान या आधार का बोध कराता है, तो वह अधिकरण तत्पुरुष होगा; यदि वह कार्य के साधन या माध्यम का बोध कराता है, तो वह करण तत्पुरुष कहलाएगा। यही सूक्ष्म अंतर दोनों समासों की सही पहचान का सबसे विश्वसनीय आधार है।

 

अधिकरण तत्पुरुष समास और करण तत्पुरुष समास में अंतर

अधिकरण तत्पुरुष समास का अध्ययन करने के बाद अब उसका करण तत्पुरुष समास से अंतर समझना आवश्यक है। इन दोनों समासों में भ्रम अपेक्षाकृत कम होता है, फिर भी परीक्षा में ऐसे शब्द दिए जाते हैं जिनमें विद्यार्थी केवल “में”, “पर” अथवा “से” देखकर उत्तर लिख देते हैं। यही कारण है कि कई बार सही अवधारणा होने के बावजूद उत्तर गलत हो जाता है।

वास्तव में इन दोनों समासों का अंतर केवल विभक्ति का नहीं, बल्कि अर्थ (Semantic Relation) का है। करण तत्पुरुष में पहला पद किसी कार्य के साधन, माध्यम, कारण या कर्ता का बोध कराता है, जबकि अधिकरण तत्पुरुष में पहला पद उस स्थान, आधार या स्थिति का बोध कराता है जहाँ कोई कार्य घटित होता है या कोई वस्तु स्थित होती है।

यदि इस मूल अंतर को समझ लिया जाए, तो दोनों समासों की पहचान अत्यंत सरल हो जाती है।


सबसे पहले “से” और “में / पर” का अंतर समझिए

करण तत्पुरुष में समास-विग्रह करने पर सामान्यतः “से” अथवा “के द्वारा” प्राप्त होता है।

उदाहरण—

हस्तलिखित

हाथ से लिखित

यहाँ हाथ लिखने का साधन है।

इसके विपरीत अधिकरण तत्पुरुष में समास-विग्रह करने पर “में” अथवा “पर” प्राप्त होता है।

उदाहरण—

जलमग्न

जल में मग्न

यहाँ जल कोई साधन नहीं है, बल्कि वह स्थान है जहाँ मग्न होने की स्थिति उत्पन्न हुई है।

यही दोनों समासों का सबसे मूलभूत अंतर है।


करण और अधिकरण का मूल सिद्धांत

नीचे दी गई सारणी दोनों समासों के बीच का अंतर स्पष्ट करती है—

आधारकरण तत्पुरुषअधिकरण तत्पुरुष
लुप्त विभक्तिसे / के द्वारामें / पर
पहला पद क्या बताता है?साधन, माध्यम, कारणस्थान, आधार, स्थिति
मुख्य प्रश्नकिससे? / किसके द्वारा?कहाँ? / किसमें? / किस पर?
संबंध का प्रकारकार्य सम्पन्न करने वाला माध्यमकार्य या स्थिति का स्थान
उदाहरणहस्तलिखितजलमग्न

यदि इस सारणी को ध्यानपूर्वक समझ लिया जाए, तो दोनों समासों के बीच का अंतर सहज रूप से स्पष्ट हो जाता है।


उदाहरणों द्वारा अंतर समझें

अब दोनों समासों के प्रमुख उदाहरणों को साथ-साथ देखकर अंतर समझते हैं।

करण तत्पुरुषसमास-विग्रहअधिकरण तत्पुरुषसमास-विग्रह
हस्तलिखितहाथ से लिखितजलमग्नजल में मग्न
रेखांकितरेखा द्वारा अंकितशरणागतशरण में आगत
स्वरचितस्वयं द्वारा रचितगृहप्रवेशगृह में प्रवेश
शोकग्रस्तशोक से ग्रस्तवनवासवन में वास
हस्तनिर्मितहाथ से निर्मितआसनस्थआसन पर स्थित

यदि इन उदाहरणों का विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि करण में पहला पद कार्य सम्पन्न करने वाला माध्यम है, जबकि अधिकरण में वही पद स्थान या आधार का बोध कराता है।


“हस्तलिखित” और “जलमग्न” का विश्लेषण

इन दोनों शब्दों को विस्तार से समझने से करण और अधिकरण का अंतर पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है।

हस्तलिखित

समास-विग्रह—

हाथ से लिखित

यहाँ हाथ लिखने का साधन है।

अतः—

  • हाथ = साधन
  • “से” = करण कारक
  • समास = करण तत्पुरुष

जलमग्न

समास-विग्रह—

जल में मग्न

यहाँ जल वह स्थान है जहाँ कोई वस्तु डूबी हुई है।

अतः—

  • जल = स्थान
  • “में” = अधिकरण कारक
  • समास = अधिकरण तत्पुरुष

दोनों शब्दों में पहला पद अलग-अलग प्रकार का संबंध स्थापित कर रहा है, इसलिए दोनों समास भी अलग हैं।


पहचान का सबसे सरल नियम

किसी भी सामासिक शब्द को देखकर निम्न प्रश्न पूछिए—

  • क्या पहला पद किसी कार्य का साधन है?
  • या पहला पद किसी स्थान या आधार का बोध करा रहा है?

यदि उत्तर “साधन” है, तो वह करण तत्पुरुष होगा।

यदि उत्तर “स्थान या आधार” है, तो वह अधिकरण तत्पुरुष होगा।

उदाहरण—

  • हाथ से लिखित ✔ → करण तत्पुरुष
  • मशीन से निर्मित ✔ → करण तत्पुरुष

लेकिन—

  • जल में मग्न ✔ → अधिकरण तत्पुरुष
  • आसन पर स्थित ✔ → अधिकरण तत्पुरुष

सामान्य गलतियाँ

अभ्यास के दौरान विद्यार्थी प्रायः निम्न त्रुटियाँ करते हैं—

सामान्य गलतीसही विश्लेषण
जलमग्न को करण तत्पुरुष मान लेनाजल में मग्न → अधिकरण तत्पुरुष
आसनस्थ में “से” जोड़ देनासही विग्रह: आसन पर स्थित
शोकग्रस्त को अधिकरण समझ लेनाशोक से ग्रस्त → करण तत्पुरुष
हस्तलिखित को अधिकरण लिख देनाहाथ से लिखित → करण तत्पुरुष
केवल शब्द देखकर उत्तर देनापहले समास-विग्रह करें, फिर कारक पहचानें।

एक साथ तुलना

नीचे दी गई सारणी दोनों समासों का त्वरित पुनरावलोकन कराती है—

समासलुप्त विभक्तिपहला पद क्या बताता है?उदाहरण
करण तत्पुरुषसे / द्वारासाधन, माध्यमहस्तलिखित
अधिकरण तत्पुरुषमें / परस्थान, आधारजलमग्न
करण तत्पुरुषसे / द्वाराकारणशोकग्रस्त
अधिकरण तत्पुरुषमें / परनिवास या स्थितिवनवास
करण तत्पुरुषसे / द्वाराउपकरणमशीननिर्मित
अधिकरण तत्पुरुषमें / परआधारआसनस्थ

पहचान की अंतिम जाँच

यदि किसी सामासिक शब्द के बारे में संदेह हो, तो निम्न क्रम अपनाइए—

स्वयं से पूछेंयदि उत्तर “हाँ” हैसमास
क्या पहला पद कार्य का साधन या माध्यम है?करण तत्पुरुष
क्या “से” या “द्वारा” लगाने पर अर्थ स्पष्ट होता है?करण तत्पुरुष
क्या पहला पद स्थान या आधार का बोध कराता है?अधिकरण तत्पुरुष
क्या “में” या “पर” लगाने पर अर्थ स्वाभाविक बनता है?अधिकरण तत्पुरुष

इस प्रकार यदि पहले समास-विग्रह किया जाए और फिर कारक के अर्थ को समझा जाए, तो करण तथा अधिकरण तत्पुरुष के बीच कभी भ्रम नहीं होगा। यही पद्धति समास-विश्लेषण, वस्तुनिष्ठ प्रश्नों तथा वर्णनात्मक उत्तरों में सबसे अधिक उपयोगी और विश्वसनीय मानी जाती है।

अपादान तत्पुरुष समास

अब तक हम तत्पुरुष समास के अंतर्गत कर्म, करण, सम्प्रदान, सम्बन्ध तथा अधिकरण तत्पुरुष का विस्तार से अध्ययन कर चुके हैं। अब हम इसके अंतिम प्रमुख भेद अपादान तत्पुरुष समास को समझेंगे।

अपादान तत्पुरुष समास का संबंध वियोग, पृथक्करण, दूरी, मुक्ति अथवा अलगाव से होता है। जब कोई व्यक्ति, वस्तु या स्थिति किसी अन्य वस्तु, स्थान, बंधन या अवस्था से अलग होती है, तब अपादान कारक का प्रयोग किया जाता है। समास बनने पर इसी कारक की विभक्ति “से” का लोप हो जाता है।

यही कारण है कि पथभ्रष्ट, ऋणमुक्त, भयमुक्त, देशनिकाला, रणविमुख, गृहत्यागी जैसे शब्द अपादान तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण माने जाते हैं। इन शब्दों में “से” अवश्य आता है, लेकिन उसका अर्थ साधन नहीं बल्कि अलग होना या मुक्त होना होता है। यही विशेषता इसे करण तत्पुरुष से अलग करती है।


अपादान तत्पुरुष समास की परिभाषा

जिस तत्पुरुष समास में दोनों पदों के बीच अपादान कारक की विभक्ति “से” का लोप हो जाता है, उसे अपादान तत्पुरुष समास कहते हैं।

अर्थात् यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “से” प्राप्त हो और उसका अर्थ अलग होना, दूर होना, मुक्त होना, हटना अथवा वियोग व्यक्त करे, तो वह अपादान तत्पुरुष समास कहलाता है।

इसे सरल भाषा में इस प्रकार भी समझा जा सकता है—

जहाँ कोई व्यक्ति, वस्तु या अवस्था किसी अन्य वस्तु, स्थान या बंधन से अलग हो, मुक्त हो अथवा दूर हो जाए और समास बनने पर “से” का लोप हो जाए, वहाँ अपादान तत्पुरुष समास होता है।


अपादान कारक क्या होता है?

अपादान तत्पुरुष समास को समझने के लिए पहले अपादान कारक की अवधारणा स्पष्ट होनी चाहिए।

व्याकरण में जहाँ किसी वस्तु, स्थान, व्यक्ति या अवस्था से अलग होने, दूर होने, मुक्त होने, त्याग करने या वियोग का भाव व्यक्त होता है, वहाँ अपादान कारक होता है।

उदाहरण—

  • वह भय से मुक्त हो गया।
  • यात्री मार्ग से भटक गया।
  • पक्षी पिंजरे से बाहर निकल गया।
  • विद्यार्थी दोषों से दूर रहा।
  • व्यक्ति ऋण से मुक्त हो गया।

इन सभी वाक्यों में “से” का अर्थ साधन नहीं है, बल्कि अलगाव या मुक्ति का है। यही अपादान कारक का आधार है।


अपादान तत्पुरुष समास का मूल सिद्धांत

अपादान तत्पुरुष समास में पहला पद सामान्यतः उस वस्तु, स्थान या अवस्था का बोध कराता है जिससे अलगाव हुआ है। दूसरा पद उस अलगाव, मुक्ति या दूरी की स्थिति को व्यक्त करता है।

उदाहरण—

ऋणमुक्त

ऋण से मुक्त

यहाँ व्यक्ति ऋण का उपयोग नहीं कर रहा है, बल्कि उससे मुक्त हो गया है।

इसी प्रकार—

पथभ्रष्ट

पथ से भ्रष्ट

यहाँ व्यक्ति पथ को साधन के रूप में नहीं अपना रहा, बल्कि सही मार्ग से भटक गया है।

इसी प्रकार का संबंध अपादान तत्पुरुष समास की पहचान है।


अपादान तत्पुरुष समास की पहचान

यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “से” लगाया जा सके और “से” का अर्थ अलग होना, मुक्त होना, दूर होना, वियोग या त्याग व्यक्त करे, तो वह अपादान तत्पुरुष समास होगा।

नीचे दिए गए उदाहरणों को ध्यानपूर्वक देखें—

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअपादान (जिससे अलगाव हुआ)
पथभ्रष्टपथ से भ्रष्टपथ
ऋणमुक्तऋण से मुक्तऋण
भयमुक्तभय से मुक्तभय
देशनिकालादेश से निकालादेश
रणविमुखरण से विमुखरण
गृहत्यागीगृह से त्याग करने वालागृह

इन सभी उदाहरणों में पहला पद उस वस्तु या स्थान का बोध करा रहा है जिससे अलगाव या दूरी उत्पन्न हुई है।


अपादान तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ

अपादान तत्पुरुष समास को सही प्रकार से समझने के लिए उसकी प्रमुख विशेषताओं को जानना आवश्यक है।

विशेषताविवरण
यह तत्पुरुष समास का एक उपभेद है।उत्तरपद प्रधान रहता है।
“से” का लोप होता है।समास-विग्रह में स्पष्ट दिखाई देता है।
पहला पद अलगाव, दूरी या मुक्ति का आधार होता है।उसी से वियोग व्यक्त होता है।
दूसरा पद मुक्ति, त्याग, दूरी या वियोग की स्थिति बताता है।जैसे—मुक्त, भ्रष्ट, विमुख, त्यागी।
समस्त पद में अलगाव या पृथक्करण का भाव निहित रहता है।यही इसकी सबसे बड़ी पहचान है।

इन विशेषताओं को ध्यान में रखकर अपादान तत्पुरुष समास की पहचान सहजता से की जा सकती है।


अपादान तत्पुरुष समास की संरचना

अन्य तत्पुरुष समासों की तरह अपादान तत्पुरुष का निर्माण भी दो पदों के मेल से होता है। अंतर केवल इतना है कि यहाँ दोनों पदों के बीच “से” का लोप होता है, लेकिन उसका अर्थ वियोग या अलगाव का होता है।

मूल वाक्यांशलुप्त विभक्तिसमस्त पद
पथ से भ्रष्टसेपथभ्रष्ट
ऋण से मुक्तसेऋणमुक्त
भय से मुक्तसेभयमुक्त
देश से निकालासेदेशनिकाला
रण से विमुखसेरणविमुख
गृह से त्याग करने वालासेगृहत्यागी

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि समस्त पद बनने पर केवल “से” का लोप हुआ है, जबकि अलगाव का संबंध यथावत बना हुआ है।


उत्तरपद की प्रधानता अपादान तत्पुरुष में कैसे दिखाई देती है?

अपादान तत्पुरुष में भी अन्य सभी तत्पुरुष समासों की तरह उत्तरपद ही मुख्य अर्थ प्रदान करता है।

उदाहरण—

ऋणमुक्त

ऋण से मुक्त

यहाँ मुख्य अर्थ “मुक्त” शब्द से बन रहा है। “ऋण” केवल यह बता रहा है कि मुक्ति किससे मिली है।

इसी प्रकार—

पथभ्रष्ट

पथ से भ्रष्ट

यहाँ मुख्य अर्थ “भ्रष्ट” है, जबकि “पथ” केवल यह स्पष्ट कर रहा है कि व्यक्ति किससे भटक गया है।

इस प्रकार अपादान तत्पुरुष में भी उत्तरपद ही प्रधान रहता है।


अपादान तत्पुरुष समास को समझने का मूल सूत्र

यदि पूरे विषय को एक सरल नियम में याद रखना हो, तो निम्न सूत्र सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होता है—

जहाँ समास-विग्रह करने पर “से” प्राप्त हो और उसका अर्थ साधन नहीं, बल्कि अलगाव, मुक्ति, दूरी या वियोग का बोध कराए, वहाँ अपादान तत्पुरुष समास होता है।

 

अपादान तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण (विस्तृत विश्लेषण)

अपादान तत्पुरुष समास की परिभाषा, संरचना तथा पहचान को समझ लेने के बाद अब उसके उदाहरणों का विस्तार से अध्ययन करना आवश्यक है। व्याकरण में केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं होता कि समास-विग्रह में “से” आता है, बल्कि यह भी समझना आवश्यक है कि वह “से” किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

यदि “से” का अर्थ साधन है, तो वह करण तत्पुरुष होगा; लेकिन यदि वही “से” अलग होने, दूर होने, मुक्त होने, त्याग करने अथवा वियोग का बोध कराता है, तो वह अपादान तत्पुरुष कहलाता है।

इसी कारण अपादान तत्पुरुष के उदाहरणों को केवल याद करना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक उदाहरण के पीछे छिपे अर्थ और संबंध को समझना अधिक आवश्यक है। आइए अब इन्हें विभिन्न श्रेणियों में विस्तार से समझते हैं।


(क) “मुक्त” का बोध कराने वाले उदाहरण

इस प्रकार के शब्दों में दूसरा पद सामान्यतः “मुक्त” होता है। पहला पद उस वस्तु या अवस्था का बोध कराता है जिससे मुक्ति प्राप्त हुई है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहकिससे मुक्ति?
ऋणमुक्तऋण से मुक्तऋण
भयमुक्तभय से मुक्तभय
रोगमुक्तरोग से मुक्तरोग
दोषमुक्तदोष से मुक्तदोष
बंधनमुक्तबंधन से मुक्तबंधन
मोहमुक्तमोह से मुक्तमोह

इन उदाहरणों को समझें

इन सभी शब्दों में “से” का अर्थ किसी साधन से नहीं, बल्कि मुक्ति से है।

उदाहरण—

  • रोग से मुक्त
  • भय से मुक्त
  • बंधन से मुक्त

इनमें व्यक्ति किसी वस्तु का उपयोग नहीं कर रहा, बल्कि उससे छुटकारा पा चुका है। यही अपादान तत्पुरुष की सबसे बड़ी पहचान है।


(ख) भटकने या दूर होने का बोध कराने वाले उदाहरण

कुछ अपादान तत्पुरुष समास ऐसे होते हैं जिनमें किसी सही मार्ग, स्थान या लक्ष्य से दूर होने का भाव व्यक्त होता है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअलगाव किससे?
पथभ्रष्टपथ से भ्रष्टपथ
धर्मभ्रष्टधर्म से भ्रष्टधर्म
लक्ष्यच्युतलक्ष्य से च्युतलक्ष्य
मार्गविचलितमार्ग से विचलितमार्ग
सत्यविमुखसत्य से विमुखसत्य

इन उदाहरणों का विश्लेषण

यदि इन शब्दों को ध्यान से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि व्यक्ति किसी वस्तु का उपयोग नहीं कर रहा है, बल्कि उससे दूर हो गया है।

उदाहरण—

  • पथ से भ्रष्ट
  • लक्ष्य से च्युत
  • सत्य से विमुख

इन सभी में वियोग या विचलन का भाव निहित है।


(ग) त्याग या वियोग का बोध कराने वाले उदाहरण

इस प्रकार के शब्दों में पहला पद उस वस्तु या स्थान का बोध कराता है जिसका त्याग किया गया है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहकिसका त्याग?
गृहत्यागीगृह से त्याग करने वालागृह
देशनिकालादेश से निकालादेश
पदच्युतपद से च्युतपद
राज्यच्युतराज्य से च्युतराज्य
सिंहासनच्युतसिंहासन से च्युतसिंहासन

इन उदाहरणों को समझें

इन शब्दों में पहला पद उस स्थान या पद का बोध कराता है जिससे व्यक्ति अलग हो गया है।

उदाहरण—

  • पद से च्युत
  • राज्य से च्युत
  • सिंहासन से च्युत

इनमें कहीं भी साधन का अर्थ नहीं है।


(घ) विमुखता या दूरी व्यक्त करने वाले उदाहरण

कुछ सामासिक शब्द किसी कार्य, स्थान या विचार से दूरी बनाने का भाव व्यक्त करते हैं।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहअर्थ
रणविमुखरण से विमुखयुद्ध से दूर रहने वाला
कार्यविमुखकार्य से विमुखकार्य में रुचि न रखने वाला
समाजविमुखसमाज से विमुखसमाज से दूर रहने वाला
लोकविमुखलोक से विमुखसमाज से अलग रहने वाला
कर्तव्यविमुखकर्तव्य से विमुखकर्तव्य से दूर रहने वाला

इन सभी उदाहरणों में पहला पद उस वस्तु या कार्य का बोध करा रहा है जिससे दूरी बनाई जा रही है।


परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण उदाहरण

कुछ अपादान तत्पुरुष समास ऐसे हैं जो विभिन्न परीक्षाओं में नियमित रूप से पूछे जाते हैं। इनका समास-विग्रह अच्छी तरह याद होना चाहिए।

सामासिक शब्दसमास-विग्रह
पथभ्रष्टपथ से भ्रष्ट
ऋणमुक्तऋण से मुक्त
भयमुक्तभय से मुक्त
रोगमुक्तरोग से मुक्त
दोषमुक्तदोष से मुक्त
देशनिकालादेश से निकाला
पदच्युतपद से च्युत
राज्यच्युतराज्य से च्युत
रणविमुखरण से विमुख
गृहत्यागीगृह से त्याग करने वाला

इन उदाहरणों का नियमित अभ्यास करने से अपादान तत्पुरुष समास की पहचान अत्यंत सरल हो जाती है।


इन उदाहरणों का तुलनात्मक विश्लेषण

अब तक दिए गए सभी उदाहरणों का यदि एक साथ अध्ययन किया जाए, तो अपादान तत्पुरुष की मूल संरचना स्पष्ट दिखाई देती है।

सामासिक शब्ददूसरा पद क्या बता रहा है?पहला पद क्या बता रहा है?“से” का अर्थसमास
ऋणमुक्तमुक्तिजिससे मुक्ति मिलीवियोगअपादान तत्पुरुष
भयमुक्तमुक्तिजिससे मुक्ति मिलीवियोगअपादान तत्पुरुष
पथभ्रष्टभटकनाजिससे भटकाअलगावअपादान तत्पुरुष
पदच्युतहटनाजिससे हटाया गयापृथक्करणअपादान तत्पुरुष
रणविमुखदूरीजिससे दूरी बनाईवियोगअपादान तत्पुरुष
गृहत्यागीत्यागजिसका त्याग कियाअलगावअपादान तत्पुरुष

यदि इस सारणी का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि अपादान तत्पुरुष में पहला पद सदैव उस वस्तु, स्थान या अवस्था का बोध कराता है जिससे अलगाव, मुक्ति या दूरी उत्पन्न हुई है।


अपादान तत्पुरुष की पहचान करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

अपादान तत्पुरुष समास की पहचान करते समय सबसे पहले समास-विग्रह करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि दोनों पदों के बीच “से” लगाने पर उसका अर्थ क्या बन रहा है। यदि “से” का अर्थ अलग होना, मुक्त होना, त्याग करना, दूर होना या वियोग व्यक्त कर रहा हो, तो वह अपादान तत्पुरुष होगा।

ध्यान रहे कि यही “से” करण तत्पुरुष में भी मिलता है, लेकिन वहाँ उसका अर्थ साधन, माध्यम या कारण होता है। इसलिए केवल विभक्ति देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए, बल्कि यह समझना चाहिए कि पहला पद कार्य को सम्पन्न कर रहा है या उससे अलगाव व्यक्त हो रहा है। यही सूक्ष्म अंतर करण और अपादान तत्पुरुष की सही पहचान का सबसे विश्वसनीय आधार है।

अब तक हमने तत्पुरुष समास के सभी प्रमुख भेदों—कर्म, करण, सम्प्रदान, सम्बन्ध, अधिकरण और अपादान—का विस्तार से अध्ययन किया। प्रत्येक भेद की परिभाषा, पहचान, समास-विग्रह, उदाहरण तथा अन्य भेदों से उसका अंतर भी समझ लिया।

अब आवश्यकता है कि इन सभी भेदों को एक साथ देखा जाए, ताकि उनके बीच का अंतर और अधिक स्पष्ट हो सके। प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जिनमें एक ही प्रश्न में विभिन्न प्रकार के तत्पुरुष समास दिए जाते हैं और सही भेद चुनना होता है। ऐसे प्रश्नों को हल करने के लिए केवल परिभाषाएँ याद होना पर्याप्त नहीं है; सभी भेदों की तुलनात्मक समझ भी आवश्यक होती है।


तत्पुरुष समास के सभी भेद एक साथ

नीचे दी गई सारणी तत्पुरुष समास के सभी प्रमुख भेदों का संक्षिप्त एवं व्यवस्थित पुनरावलोकन प्रस्तुत करती है।

तत्पुरुष का भेदलुप्त विभक्तिमुख्य प्रश्नपहला पद क्या बताता है?उदाहरण
कर्म तत्पुरुषकोकिसको?क्रिया का लक्ष्य (कर्म)स्वर्गप्राप्त
करण तत्पुरुषसे / द्वाराकिससे?साधन, माध्यम, कारणहस्तलिखित
सम्प्रदान तत्पुरुषके लिएकिसके लिए?उद्देश्य या प्रयोजनविद्यालय
सम्बन्ध तत्पुरुषका / की / केकिसका?संबंध या स्वामित्वराजपुत्र
अधिकरण तत्पुरुषमें / परकहाँ?स्थान या आधारजलमग्न
अपादान तत्पुरुषसेकिससे अलग?वियोग, दूरी, मुक्तिऋणमुक्त

यदि इस सारणी को ध्यानपूर्वक समझ लिया जाए, तो अधिकांश समासों की पहचान कुछ ही क्षणों में की जा सकती है।


एक ही शब्द देखकर तत्पुरुष समास कैसे पहचानें?

परीक्षा में सामान्यतः केवल सामासिक शब्द दिया जाता है। वहाँ समास-विग्रह नहीं दिया जाता। इसलिए सबसे पहले स्वयं समास-विग्रह करना चाहिए और फिर यह देखना चाहिए कि दोनों पदों के बीच कौन-सा कारक स्वाभाविक रूप से आ रहा है।

नीचे दिया गया क्रम इस कार्य को सरल बनाता है—

यदि समास-विग्रह में…तो समास होगा…
कोकर्म तत्पुरुष
से / द्वारा (साधन)करण तत्पुरुष
के लिएसम्प्रदान तत्पुरुष
का / की / केसम्बन्ध तत्पुरुष
में / परअधिकरण तत्पुरुष
से (अलगाव / मुक्ति)अपादान तत्पुरुष

यही सबसे सरल और सबसे विश्वसनीय पहचान-पद्धति मानी जाती है।


सबसे अधिक भ्रम किन तत्पुरुष समास के किन भेदों में होता है?

तत्पुरुष समास पढ़ते समय कुछ भेद ऐसे हैं जिनमें विद्यार्थी सबसे अधिक भ्रमित होते हैं। इसका कारण यह है कि उनके समास-विग्रह में प्रयुक्त विभक्तियाँ देखने में समान लगती हैं, जबकि उनका अर्थ अलग होता है।

भ्रमित करने वाले भेदभ्रम का कारणसही पहचान
करण × अपादानदोनों में “से” आता हैअर्थ देखें—साधन है या अलगाव
सम्प्रदान × सम्बन्ध“के लिए” और “का” में भ्रमउद्देश्य है या संबंध
कर्म × करणक्रिया दोनों में होती हैक्रिया का लक्ष्य है या साधन
करण × अधिकरण“से” और “में/पर” का भ्रमसाधन है या स्थान
सम्बन्ध × सम्प्रदानदोनों में दो संज्ञाएँ होती हैंसंबंध है या प्रयोजन

यदि इन पाँच अंतरों को अच्छी तरह समझ लिया जाए, तो तत्पुरुष समास से जुड़े अधिकांश प्रश्न बिना किसी कठिनाई के हल किए जा सकते हैं।


सभी भेदों के प्रतिनिधि उदाहरण

अब प्रत्येक भेद का एक प्रमुख उदाहरण एक साथ देखते हैं—

समाससमास-विग्रहभेद
स्वर्गप्राप्तस्वर्ग को प्राप्तकर्म तत्पुरुष
हस्तलिखितहाथ से लिखितकरण तत्पुरुष
विद्यालयविद्या के लिए आलयसम्प्रदान तत्पुरुष
राजपुत्रराजा का पुत्रसम्बन्ध तत्पुरुष
जलमग्नजल में मग्नअधिकरण तत्पुरुष
ऋणमुक्तऋण से मुक्तअपादान तत्पुरुष

यदि इन छह उदाहरणों का अर्थ स्पष्ट हो जाए, तो पूरे तत्पुरुष समास का आधार समझ में आ जाता है।

एक मिनट में पूरा तत्पुरुष समास याद करें

यदि परीक्षा से ठीक पहले पूरे अध्याय का त्वरित पुनरावलोकन करना हो, तो केवल यह सारणी याद रखिए—

समासयाद रखने वाला शब्दमुख्य संकेत
कर्मकोक्रिया का लक्ष्य
करणसेसाधन / माध्यम
सम्प्रदानके लिएउद्देश्य
सम्बन्धकासंबंध / स्वामित्व
अधिकरणमें / परस्थान / आधार
अपादानसेअलगाव / मुक्ति

यह सारणी पूरे अध्याय का सबसे संक्षिप्त और प्रभावी पुनरावलोकन है। अधिकांश विद्यार्थी इसी सारणी की सहायता से परीक्षा से पहले कुछ ही मिनटों में सम्पूर्ण तत्पुरुष समास दोहरा लेते हैं।

तत्पुरुष समास पर आधारित अभ्यास

अब तक आपने तत्पुरुष समास के सभी छह भेदों—कर्म, करण, सम्प्रदान, सम्बन्ध, अधिकरण तथा अपादान—का विस्तार से अध्ययन किया। किसी भी व्याकरणिक विषय में वास्तविक दक्षता केवल सिद्धांत पढ़ने से नहीं आती, बल्कि उसके नियमित अभ्यास से विकसित होती है। यही कारण है कि प्रतियोगी परीक्षाओं तथा विद्यालयी परीक्षाओं में समास से संबंधित प्रश्न विभिन्न रूपों में पूछे जाते हैं।

इस अभ्यास खंड का उद्देश्य केवल उत्तर याद कराना नहीं है, बल्कि समास-विग्रह करने, कारक की पहचान करने तथा सही समास-भेद निर्धारित करने की क्षमता विकसित करना है। इसलिए प्रत्येक प्रश्न को हल करते समय पहले स्वयं समास-विग्रह करने का प्रयास करें और उसके बाद ही उत्तर देखें।


अभ्यास – 1

निम्नलिखित सामासिक शब्दों का समास-विग्रह तथा तत्पुरुष समास का भेद लिखिए।

क्रमसामासिक शब्दसमास-विग्रहसमास का भेद
1स्वर्गप्राप्तस्वर्ग को प्राप्तकर्म तत्पुरुष
2हस्तलिखितहाथ से लिखितकरण तत्पुरुष
3विद्यालयविद्या के लिए आलयसम्प्रदान तत्पुरुष
4राजपुत्रराजा का पुत्रसम्बन्ध तत्पुरुष
5जलमग्नजल में मग्नअधिकरण तत्पुरुष
6ऋणमुक्तऋण से मुक्तअपादान तत्पुरुष
7बसचालकबस को चलाने वालाकर्म तत्पुरुष
8शोकग्रस्तशोक से ग्रस्तकरण तत्पुरुष
9रसोईघररसोई के लिए घरसम्प्रदान तत्पुरुष
10गृहस्वामीगृह का स्वामीसम्बन्ध तत्पुरुष

अभ्यास – 2

सही विकल्प चुनिए।

1. “माखनचोर” किस समास का उदाहरण है?

(A) करण तत्पुरुष
(B) कर्म तत्पुरुष
(C) सम्बन्ध तत्पुरुष
(D) अपादान तत्पुरुष

उत्तर: (B)


2. “हस्तनिर्मित” में कौन-सी विभक्ति लुप्त है?

(A) को

(B) से

(C) के लिए

(D) में

उत्तर: (B)


3. “वनवास” किस समास का उदाहरण है?

(A) सम्बन्ध तत्पुरुष

(B) अधिकरण तत्पुरुष

(C) कर्म तत्पुरुष

(D) सम्प्रदान तत्पुरुष

उत्तर: (B)


4. “गृहत्यागी” किस समास का उदाहरण है?

(A) करण तत्पुरुष

(B) सम्बन्ध तत्पुरुष

(C) अपादान तत्पुरुष

(D) अधिकरण तत्पुरुष

उत्तर: (C)


5. “विद्यालय” में कौन-सी विभक्ति का लोप हुआ है?

(A) का

(B) में

(C) के लिए

(D) से

उत्तर: (C)


अभ्यास – 3

रिक्त स्थान भरिए।

  1. जिस तत्पुरुष समास में “को” का लोप होता है, उसे __________ कहते हैं।
  2. जिस तत्पुरुष समास में “के लिए” का लोप होता है, उसे __________ कहते हैं।
  3. “राजा का पुत्र” का सामासिक रूप __________ है।
  4. “जल में मग्न” का सामासिक रूप __________ है।
  5. “ऋण से मुक्त” का सामासिक रूप __________ है।

उत्तर

  1. कर्म तत्पुरुष
  2. सम्प्रदान तत्पुरुष
  3. राजपुत्र
  4. जलमग्न
  5. ऋणमुक्त

अभ्यास – 4

निम्नलिखित तत्पुरुष समासों का प्रकार पहचानिए।

सामासिक शब्दसमास का प्रकार
जनप्रिय__________
रेखांकित__________
सभाभवन__________
देशवासी__________
आसनस्थ__________
पथभ्रष्ट__________
स्वरचित__________
सत्याग्रह__________
सिंहासनारूढ़__________
भयमुक्त__________

उत्तर

सामासिक शब्दसमास
जनप्रियकर्म तत्पुरुष
रेखांकितकरण तत्पुरुष
सभाभवनसम्प्रदान तत्पुरुष
देशवासीसम्बन्ध तत्पुरुष
आसनस्थअधिकरण तत्पुरुष
पथभ्रष्टअपादान तत्पुरुष
स्वरचितकरण तत्पुरुष
सत्याग्रहसम्प्रदान तत्पुरुष
सिंहासनारूढ़अधिकरण तत्पुरुष
भयमुक्तअपादान तत्पुरुष

अभ्यास – 5

निम्नलिखित का मिलान कीजिए।

स्तम्भ – Aस्तम्भ – B
(A) कर्म तत्पुरुष(1) में / पर
(B) करण तत्पुरुष(2) का / की / के
(C) सम्प्रदान तत्पुरुष(3) को
(D) सम्बन्ध तत्पुरुष(4) के लिए
(E) अधिकरण तत्पुरुष(5) से / द्वारा
(F) अपादान तत्पुरुष(6) से (अलगाव)

उत्तर

समाससही मिलान
कर्म तत्पुरुष(3)
करण तत्पुरुष(5)
सम्प्रदान तत्पुरुष(4)
सम्बन्ध तत्पुरुष(2)
अधिकरण तत्पुरुष(1)
अपादान तत्पुरुष(6)

अभ्यास – 6 (उच्च स्तर)

निम्नलिखित सामासिक शब्दों का समास-विग्रह कीजिए तथा बताइए कि इनमें कौन-सी विभक्ति का लोप हुआ है।

सामासिक शब्दसमास-विग्रहलुप्त विभक्तिसमास
शास्त्रज्ञशास्त्र को जानने वालाकोकर्म तत्पुरुष
मदांधमद से अंधसेकरण तत्पुरुष
व्यायामशालाव्यायाम के लिए शालाके लिएसम्प्रदान तत्पुरुष
ग्रामप्रधानग्राम का प्रधानकासम्बन्ध तत्पुरुष
गृहप्रवेशगृह में प्रवेशमेंअधिकरण तत्पुरुष
पदच्युतपद से च्युतसेअपादान तत्पुरुष

तत्पुरुष समास में होने वाली सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)

तत्पुरुष समास का सिद्धांत पढ़ लेने के बाद भी अनेक विद्यार्थी प्रश्न हल करते समय छोटी-छोटी गलतियाँ कर बैठते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वे शब्द देखकर उत्तर देने का प्रयास करते हैं, जबकि समास की सही पहचान हमेशा समास-विग्रह और कारक-संबंध के आधार पर की जाती है।

यदि नीचे दी गई गलतियों से बचा जाए, तो तत्पुरुष समास से जुड़े अधिकांश प्रश्न बिना किसी कठिनाई के हल किए जा सकते हैं।


1. केवल शब्द देखकर समास का प्रकार तय कर देना

यह सबसे सामान्य और सबसे बड़ी गलती है।

उदाहरण के लिए—

हस्तलिखित देखकर कई विद्यार्थी तुरंत करण तत्पुरुष लिख देते हैं, जबकि कुछ विद्यार्थी केवल “लिखित” देखकर कर्म तत्पुरुष मान लेते हैं।

सही तरीका यह है कि पहले समास-विग्रह किया जाए—

हाथ से लिखित

अब स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ “से” साधन का बोध करा रहा है, इसलिए यह करण तत्पुरुष है।


2. समास-विग्रह किए बिना उत्तर लिख देना

समास-विग्रह पूरे अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यदि विग्रह सही होगा, तो समास का प्रकार भी सही होगा।

उदाहरण—

राजपुत्र

यदि कोई विद्यार्थी सीधे सम्बन्ध तत्पुरुष लिख देता है, तो वह केवल याददाश्त के आधार पर उत्तर दे रहा है।

लेकिन यदि वह पहले विग्रह करेगा—

राजा का पुत्र

तो सम्बन्ध कारक स्वयं स्पष्ट हो जाएगा।


3. “से” देखकर हमेशा करण तत्पुरुष मान लेना

यह प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे अधिक होने वाली गलती है।

“से” दो अलग-अलग समासों में मिलता है—

  • करण तत्पुरुष
  • अपादान तत्पुरुष

लेकिन दोनों का अर्थ अलग होता है।

शब्दसही समासकारण
हस्तलिखितकरण तत्पुरुषहाथ साधन है।
शोकग्रस्तकरण तत्पुरुषशोक कारण है।
ऋणमुक्तअपादान तत्पुरुषऋण से मुक्ति मिली है।
पथभ्रष्टअपादान तत्पुरुषमार्ग से भटक गया है।

इसलिए केवल “से” नहीं, बल्कि उसके अर्थ को समझना आवश्यक है।


4. “का” और “के लिए” में भ्रम कर देना

सम्प्रदान तथा सम्बन्ध तत्पुरुष में यही सबसे बड़ी समस्या होती है।

उदाहरण—

विद्यालय

सही विग्रह—

विद्या के लिए आलय

यदि कोई इसे “विद्या का आलय” लिख देता है, तो समास का प्रकार पूरी तरह बदल जाएगा।

इसी प्रकार—

राजपुत्र

सही विग्रह—

राजा का पुत्र

यहाँ “राजा के लिए पुत्र” कहना अर्थहीन होगा।


5. स्थान और साधन में अंतर न समझ पाना

कुछ विद्यार्थी अधिकरण और करण तत्पुरुष में भी भ्रमित हो जाते हैं।

उदाहरण—

शब्दसही विग्रहसमास
जलमग्नजल में मग्नअधिकरण
आसनस्थआसन पर स्थितअधिकरण
हस्तलिखितहाथ से लिखितकरण
मशीननिर्मितमशीन से निर्मितकरण

यदि पहला पद स्थान बता रहा है, तो अधिकरण होगा। यदि पहला पद साधन बता रहा है, तो करण होगा।

समास हिन्दी व्याकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, और उसके विभिन्न भेदों में तत्पुरुष समास का स्थान सबसे प्रमुख माना जाता है। इसका कारण केवल यह नहीं है कि इसके अंतर्गत अनेक प्रकार के सामासिक शब्द आते हैं, बल्कि यह भी है कि हिन्दी भाषा के दैनिक प्रयोग, साहित्य, पाठ्यपुस्तकों तथा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे अधिक प्रश्न इसी समास से पूछे जाते हैं।

इस पूरे अध्याय में हमने तत्पुरुष समास को केवल परिभाषाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसकी संपूर्ण संरचना, निर्माण प्रक्रिया, पहचान, समास-विग्रह, उत्तरपद की प्रधानता, छहों भेदों, उनके उदाहरणों, तुलनात्मक अंतर, सामान्य गलतियों, अभ्यास प्रश्नों तथा महत्वपूर्ण तथ्यों का क्रमबद्ध अध्ययन किया। प्रत्येक भेद को अलग-अलग समझने के साथ-साथ यह भी देखा कि किसी सामासिक शब्द का सही समास निर्धारित करने के लिए केवल शब्द को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके समास-विग्रह और कारक-संबंध को समझना अनिवार्य है।

यदि पूरे विषय का सार एक वाक्य में कहा जाए, तो वह यह होगा कि—

तत्पुरुष समास की सही पहचान का सबसे विश्वसनीय आधार समास-विग्रह है।

जब भी किसी सामासिक शब्द का प्रकार निर्धारित करना हो, तो सबसे पहले उसका विग्रह कीजिए, फिर दोनों पदों के बीच आने वाली विभक्ति पहचानिए और अंत में उस विभक्ति के अर्थ के आधार पर समास का भेद निश्चित कीजिए। यही पद्धति विद्यालयी परीक्षाओं से लेकर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं तक समान रूप से प्रभावी मानी जाती है।

अध्ययन के दौरान यह भी स्पष्ट हुआ कि प्रत्येक तत्पुरुष समास का अपना विशिष्ट आधार है—

  • कर्म तत्पुरुष क्रिया के लक्ष्य को व्यक्त करता है।
  • करण तत्पुरुष साधन या माध्यम का बोध कराता है।
  • सम्प्रदान तत्पुरुष उद्देश्य या प्रयोजन को स्पष्ट करता है।
  • सम्बन्ध तत्पुरुष स्वामित्व या संबंध को व्यक्त करता है।
  • अधिकरण तत्पुरुष स्थान या आधार का बोध कराता है।
  • अपादान तत्पुरुष अलगाव, दूरी या मुक्ति का संकेत देता है।

इन छहों भेदों का अंतर यदि अच्छी तरह समझ लिया जाए, तो किसी भी सामासिक शब्द का वर्गीकरण करना अत्यंत सरल हो जाता है।

अंत में यह याद रखें कि व्याकरण में सफलता केवल सिद्धांत पढ़ने से नहीं मिलती, बल्कि निरंतर अभ्यास से प्राप्त होती है। इसलिए इस अध्याय में दिए गए उदाहरणों, अभ्यास प्रश्नों और पुनरावलोकन सारणियों का नियमित अभ्यास करते रहें। जितना अधिक समास-विग्रह करेंगे, उतनी ही सहजता से समास की पहचान कर पाएँगे।

 

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