हिन्दी भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है कि यह कम शब्दों में अधिक अर्थ व्यक्त करने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता, प्रशासनिक भाषा तथा दैनिक व्यवहार में अनेक ऐसे शब्द मिलते हैं जो वास्तव में दो या दो से अधिक शब्दों के संयोग से बने होते हैं। इन शब्दों का प्रयोग न केवल भाषा को संक्षिप्त बनाता है, बल्कि उसे अधिक प्रभावशाली, स्पष्ट और अभिव्यक्तिपूर्ण भी बनाता है।
यदि प्रत्येक बात को विस्तार से लिखा जाए, तो भाषा अनावश्यक रूप से लंबी और बोझिल हो जाती है। उदाहरण के लिए “राजा का पुत्र” कहने के स्थान पर केवल “राजपुत्र”, “शक्ति के अनुसार” के स्थान पर “यथाशक्ति”, तथा “माता और पिता” के स्थान पर “माता-पिता” कहना अधिक सहज और प्रभावी माना जाता है। यह संक्षिप्तीकरण किसी संयोगवश नहीं होता, बल्कि हिन्दी व्याकरण के एक सुव्यवस्थित नियम के अनुसार होता है, जिसे समास कहा जाता है।
यही कारण है कि समास को केवल व्याकरण का एक अध्याय नहीं माना जाता, बल्कि भाषा को सरल, प्रभावशाली और अर्थपूर्ण बनाने वाली एक महत्वपूर्ण शब्द-रचना प्रक्रिया (Word Formation Process) माना जाता है। हिन्दी के अधिकांश साहित्यिक ग्रंथों, समाचार-पत्रों, प्रशासनिक दस्तावेज़ों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में सामासिक शब्दों का व्यापक प्रयोग देखने को मिलता है। इसलिए समास का सही ज्ञान केवल परीक्षा की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि शुद्ध एवं प्रभावी हिन्दी लेखन के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

समास किसे कहते हैं?
जब दो या दो से अधिक परस्पर संबंधित शब्द मिलकर एक नया, संक्षिप्त तथा सार्थक शब्द बनाते हैं, तब उस प्रक्रिया को समास कहा जाता है। समास द्वारा निर्मित नया शब्द अपने मूल शब्दों की अपेक्षा छोटा होता है, लेकिन उसका अर्थ पूर्णतः सुरक्षित रहता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो समास भाषा में अर्थ की हानि किए बिना शब्दों का संक्षिप्तीकरण करने की प्रक्रिया है।
व्याकरण की दृष्टि से समास केवल शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी संरचनात्मक प्रक्रिया है जिसमें दो या अधिक पदों के बीच प्रयुक्त विभक्तियाँ या संबंधसूचक शब्द लुप्त हो जाते हैं और उनके स्थान पर एक नया सामासिक शब्द निर्मित हो जाता है।
उदाहरण के लिए—
- राजा का पुत्र → राजपुत्र
- विद्या के लिए आलय → विद्यालय
- माता और पिता → माता-पिता
- शक्ति के अनुसार → यथाशक्ति
यदि इन उदाहरणों को ध्यान से देखा जाए, तो स्पष्ट होगा कि मूल वाक्यांशों में प्रयुक्त “का”, “के लिए”, “और”, “के अनुसार” जैसे शब्द समास बनने पर दिखाई नहीं देते, लेकिन उनका अर्थ पूर्ण रूप से बना रहता है। यही समास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
समास का शाब्दिक अर्थ
“समास” शब्द संस्कृत धातु से बना है, जिसका सामान्य अर्थ संक्षेप, संक्षिप्तीकरण, एकत्र करना अथवा छोटा रूप प्रदान करना माना जाता है। व्याकरण में भी इसका अर्थ यही है कि अनेक शब्दों को मिलाकर एक ऐसा नया शब्द बनाया जाए जो अर्थ की दृष्टि से पूर्ण हो और भाषा को अधिक प्रभावशाली बनाए।
समास का उद्देश्य केवल शब्दों की संख्या कम करना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य भाषा को अधिक व्यवस्थित, सुस्पष्ट और प्रभावी बनाना है। यदि समास का प्रयोग न किया जाए, तो अनेक सामान्य वाक्यांश अनावश्यक रूप से लंबे हो जाएंगे।
नीचे दी गई सारणी इस अंतर को स्पष्ट करती है—
| बिना समास | समास के बाद |
|---|---|
| राजा का पुत्र | राजपुत्र |
| विद्या के लिए आलय | विद्यालय |
| शक्ति के अनुसार | यथाशक्ति |
| माता और पिता | माता-पिता |
| चार राहों का समूह | चौराहा |
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि समास बनने के बाद शब्द आकार में छोटे हो गए हैं, किन्तु उनके अर्थ में कोई कमी नहीं आई। यही कारण है कि हिन्दी भाषा में समास का प्रयोग अत्यंत व्यापक है।
समास को समझना क्यों आवश्यक है?
समास का अध्ययन केवल इसलिए नहीं किया जाता कि यह हिन्दी व्याकरण का एक अध्याय है। वास्तव में समास का ज्ञान भाषा की संरचना को समझने की आधारशिला है। यदि किसी विद्यार्थी को सामासिक शब्दों का सही ज्ञान नहीं है, तो वह न तो उनका सही विग्रह कर पाएगा और न ही उनका सही अर्थ समझ सकेगा।
हिन्दी साहित्य में प्रयुक्त अधिकांश प्रमुख शब्द किसी न किसी प्रकार के समास से बने होते हैं। उदाहरण के लिए राजपुत्र, राष्ट्रपति, जलमग्न, नीलकमल, दशानन, चतुर्भुज, गंगाजल, प्रतिदिन, पंचवटी आदि शब्द सामान्य रूप से पढ़ने में आते हैं। इनका सही अर्थ तभी समझा जा सकता है जब उनके निर्माण की प्रक्रिया स्पष्ट हो।
इसी प्रकार प्रतियोगी परीक्षाओं में समास से जुड़े प्रश्न केवल परिभाषा तक सीमित नहीं रहते। अनेक बार किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह, समास का प्रकार, तत्पुरुष का उपभेद, दो समासों के बीच का अंतर अथवा संदर्भ के अनुसार बदलने वाले समासों की पहचान भी पूछी जाती है। इसलिए समास की मूल अवधारणा जितनी स्पष्ट होगी, आगे के सभी प्रकारों को समझना उतना ही सरल होगा।
समास की रचना
समास की मूल अवधारणा को समझने के बाद अगला महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि आखिर दो या दो से अधिक स्वतंत्र शब्द मिलकर एक नया सामासिक शब्द कैसे बनाते हैं। केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं है कि समास शब्दों का संक्षिप्तीकरण है, बल्कि यह समझना भी आवश्यक है कि यह संक्षिप्तीकरण किस नियम के अनुसार होता है।
समास की रचना एक निश्चित व्याकरणिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में दो या दो से अधिक परस्पर संबंधित शब्दों को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि उनके बीच प्रयुक्त विभक्ति, परसर्ग अथवा संबंधसूचक शब्दों का लोप हो जाता है, जबकि उनका मूल अर्थ सुरक्षित रहता है। परिणामस्वरूप एक नया, छोटा और अधिक प्रभावशाली शब्द बनता है, जिसे समस्त पद या सामासिक शब्द कहा जाता है।
उदाहरण के लिए यदि हम “राजा का पुत्र” वाक्यांश को देखें, तो यहाँ “राजा” और “पुत्र” दो स्वतंत्र शब्द हैं, जिनके बीच “का” संबंधसूचक शब्द प्रयुक्त हुआ है। समास बनने पर यही “का” लुप्त हो जाता है और नया शब्द राजपुत्र बन जाता है।
इसी प्रकार “विद्या के लिए आलय” का संक्षिप्त रूप विद्यालय, “हाथ से लिखित” का संक्षिप्त रूप हस्तलिखित, तथा “माता और पिता” का संक्षिप्त रूप माता-पिता बन जाता है।
इस प्रक्रिया को निम्न सारणी के माध्यम से और अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है—
| मूल शब्द समूह | लुप्त होने वाला शब्द | समस्त पद |
|---|---|---|
| राजा का पुत्र | का | राजपुत्र |
| विद्या के लिए आलय | के लिए | विद्यालय |
| हाथ से लिखित | से | हस्तलिखित |
| माता और पिता | और | माता-पिता |
| शक्ति के अनुसार | के अनुसार | यथाशक्ति |
ऊपर दिए गए प्रत्येक उदाहरण में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि समास बनने के बाद बीच का संबंधसूचक शब्द हट गया है, लेकिन अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। यही समास-रचना का मूल सिद्धांत है।
समास की रचना किन-किन तत्वों से मिलकर होती है?
समास की प्रक्रिया को सही प्रकार से समझने के लिए उसके प्रमुख घटकों (Components) का ज्ञान आवश्यक है। प्रत्येक सामासिक शब्द कुछ निश्चित पदों से मिलकर बनता है। यदि इन पदों की भूमिका स्पष्ट हो जाए, तो आगे समास के सभी प्रकारों को समझना अत्यंत सरल हो जाता है।
समास की रचना मुख्य रूप से निम्नलिखित घटकों पर आधारित होती है—
| घटक | अर्थ |
|---|---|
| पूर्वपद | समास का पहला शब्द |
| उत्तरपद | समास का दूसरा शब्द |
| समस्त पद | दोनों पदों से मिलकर बना नया शब्द |
| सामासिक शब्द | समस्त पद का दूसरा नाम |
| समास-विग्रह | समस्त पद को पुनः अलग-अलग शब्दों में विभाजित करना |
इन पाँचों शब्दों का प्रयोग पूरे समास अध्याय में बार-बार होता है। इसलिए आगे बढ़ने से पहले इनका अर्थ अच्छी तरह समझ लेना आवश्यक है।
समास बनने की प्रक्रिया को चरणबद्ध ढंग से समझें
कई विद्यार्थियों को यह भ्रम रहता है कि समास केवल दो शब्दों को जोड़ देने से बन जाता है। वास्तव में ऐसा नहीं है। समास बनने की एक निश्चित क्रमबद्ध प्रक्रिया होती है।
नीचे इस पूरी प्रक्रिया को क्रमवार प्रस्तुत किया गया है—
| चरण | क्या होता है? |
|---|---|
| पहला | दो या दो से अधिक संबंधित शब्द लिए जाते हैं। |
| दूसरा | उनके बीच का संबंध निर्धारित किया जाता है। |
| तीसरा | संबंधसूचक विभक्ति या परसर्ग का लोप होता है। |
| चौथा | शब्दों को जोड़कर नया सामासिक शब्द बनाया जाता है। |
| पाँचवाँ | नया शब्द पहले की अपेक्षा छोटा, स्पष्ट और अर्थपूर्ण बन जाता है। |
यदि इस प्रक्रिया को “राजा का पुत्र” के उदाहरण से समझें, तो क्रम इस प्रकार होगा—
राजा + का + पुत्र
↓
“का” का लोप
↓
राजपुत्र
यही प्रक्रिया समास-निर्माण का मूल आधार है।
क्या समास में हमेशा विभक्ति का लोप होता है?
अधिकांश सामासिक शब्दों में दो पदों के बीच प्रयुक्त विभक्ति या परसर्ग का लोप हो जाता है। यही कारण है कि समास को संक्षिप्तीकरण की प्रक्रिया कहा जाता है।
उदाहरण के लिए—
- राजा का पुत्र → राजपुत्र
- जल में मग्न → जलमग्न
- हाथ से लिखित → हस्तलिखित
- विद्या के लिए आलय → विद्यालय
इन सभी उदाहरणों में विभक्ति या परसर्ग हट गया है।
हालाँकि, हिन्दी और विशेषकर संस्कृत व्याकरण में कुछ ऐसे सामासिक शब्द भी मिलते हैं जहाँ विभक्ति का पूर्ण लोप नहीं होता या शब्द की संरचना सामान्य नियमों से थोड़ी भिन्न होती है। ऐसे उदाहरण अपेक्षाकृत कम हैं और उच्च स्तर के व्याकरण में विस्तार से पढ़ाए जाते हैं। सामान्य अध्ययन तथा अधिकांश परीक्षाओं के लिए यह समझना पर्याप्त है कि समास बनने की प्रक्रिया में सामान्यतः विभक्ति या संबंधसूचक शब्द लुप्त हो जाते हैं।
समास-रचना को एक उदाहरण से विस्तार से समझें
मान लीजिए हमारे पास वाक्यांश है—
“रसोई के लिए घर”
सबसे पहले इसमें दो मुख्य शब्दों की पहचान की जाती है—
- रसोई
- घर
इन दोनों के बीच “के लिए” संबंधसूचक पद प्रयुक्त हुआ है। समास बनने पर “के लिए” हट जाता है और नया शब्द रसोईघर बनता है।
इसी प्रकार—
“घोड़ों की दौड़”
↓
“की” का लोप
↓
घुड़दौड़
और
“भय से भीत”
↓
“से” का लोप
↓
भयभीत
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि समास केवल शब्दों को जोड़ने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि संबंधसूचक पदों के लोप के बाद अर्थपूर्ण नए शब्द का निर्माण है।
समास-रचना को समझना आगे क्यों आवश्यक है?
समास के छह प्रकारों का अध्ययन करने से पहले यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि सामासिक शब्द बनते कैसे हैं। यदि यह आधार स्पष्ट नहीं होगा, तो आगे चलकर पूर्वपद, उत्तरपद, समस्त पद, समास-विग्रह, तत्पुरुष के उपभेद तथा विभिन्न समासों की पहचान करते समय भ्रम उत्पन्न हो सकता है।
इसी कारण हिन्दी व्याकरण में समास के प्रकारों का अध्ययन करने से पहले उसकी रचना और संरचना को समझाया जाता है। एक बार यह आधार स्पष्ट हो जाने पर आगे आने वाले सभी समास—चाहे वे अव्ययीभाव हों, तत्पुरुष हों या बहुव्रीहि—अधिक सरल और तार्किक प्रतीत होने लगते हैं।
अब जबकि समास बनने की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट हो चुकी है, अगला चरण उन मूल शब्दों को समझना है जिनसे प्रत्येक सामासिक शब्द का निर्माण होता है। इसलिए अगले भाग में हम पूर्वपद, उत्तरपद, समस्त पद तथा सामासिक शब्द की अवधारणाओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे, क्योंकि यही पूरे समास अध्याय की आधारशिला हैं।
समास की रचना को समझने के बाद अब उन मूल घटकों (Basic Components) को समझना आवश्यक है, जिनके आधार पर प्रत्येक सामासिक शब्द का निर्माण होता है। वास्तव में समास की पूरी प्रक्रिया इन्हीं घटकों के इर्द-गिर्द घूमती है। यदि पूर्वपद, उत्तरपद, समस्त पद और सामासिक शब्द का अर्थ स्पष्ट हो जाए, तो आगे समास के सभी प्रकारों की पहचान करना बहुत आसान हो जाता है।
कई बार विद्यार्थी समास के प्रकार तो याद कर लेते हैं, लेकिन इन आधारभूत शब्दों का अंतर स्पष्ट नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप समास-विग्रह करते समय या किसी सामासिक शब्द का विश्लेषण करते समय भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसलिए आगे बढ़ने से पहले इन सभी शब्दों को विस्तार से समझना आवश्यक है।
पूर्वपद क्या होता है?
समास बनने वाले शब्द का पहला भाग पूर्वपद कहलाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो समास की रचना में सबसे पहले आने वाला पद पूर्वपद होता है।
यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक समास में पूर्वपद ही प्रधान हो। कुछ समासों में पूर्वपद का महत्व अधिक होता है, जबकि कुछ में उसका महत्व गौण हो जाता है। इसलिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि पहला शब्द पूर्वपद है, बल्कि यह भी समझना आवश्यक है कि अलग-अलग समासों में उसकी भूमिका बदल सकती है।
उदाहरण देखें—
| सामासिक शब्द | पूर्वपद |
|---|---|
| राजपुत्र | राज |
| विद्यालय | विद्या |
| यथाशक्ति | यथा |
| माता-पिता | माता |
| पंचवटी | पंच |
इन उदाहरणों में प्रत्येक शब्द का पहला भाग पूर्वपद है। आगे जब हम समास के प्रकार पढ़ेंगे, तब यह भी समझेंगे कि किन समासों में पूर्वपद प्रधान होता है और किनमें नहीं।
उत्तरपद क्या होता है?
समास में आने वाला दूसरा पद उत्तरपद कहलाता है। यह समास का अंतिम भाग होता है और अनेक समासों में यही मुख्य अर्थ का वाहक भी होता है।
विशेष रूप से तत्पुरुष, कर्मधारय और द्विगु समासों में उत्तरपद का महत्व अधिक होता है। यही कारण है कि इन समासों की पहचान करते समय उत्तरपद की भूमिका को विशेष रूप से देखा जाता है।
उदाहरण—
| सामासिक शब्द | उत्तरपद |
|---|---|
| राजपुत्र | पुत्र |
| विद्यालय | आलय |
| जलमग्न | मग्न |
| नीलकमल | कमल |
| पंचवटी | वटी |
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि प्रत्येक सामासिक शब्द का अंतिम भाग उत्तरपद कहलाता है।
पूर्वपद और उत्तरपद को एक साथ समझें
अब तक आपने पूर्वपद और उत्तरपद को अलग-अलग समझा। अब दोनों को एक साथ देखने पर इनकी भूमिका और स्पष्ट हो जाती है।
| सामासिक शब्द | पूर्वपद | उत्तरपद |
|---|---|---|
| राजपुत्र | राज | पुत्र |
| विद्यालय | विद्या | आलय |
| रसोईघर | रसोई | घर |
| यथाशक्ति | यथा | शक्ति |
| माता-पिता | माता | पिता |
| नीलकमल | नील | कमल |
यदि इस सारणी का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए, तो यह समझना आसान हो जाता है कि किसी भी सामासिक शब्द में पहला भाग पूर्वपद और दूसरा भाग उत्तरपद कहलाता है। यही दोनों मिलकर आगे समस्त पद का निर्माण करते हैं।
समस्त पद क्या होता है?
जब पूर्वपद और उत्तरपद आपस में मिलकर एक नया शब्द बनाते हैं, तो उस नए शब्द को समस्त पद कहा जाता है। अर्थात् समास बनने के बाद जो अंतिम शब्द प्राप्त होता है, वही समस्त पद होता है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझते हैं।
राज + पुत्र
↓
राजपुत्र
यहाँ—
- राज = पूर्वपद
- पुत्र = उत्तरपद
- राजपुत्र = समस्त पद
इसी प्रकार—
विद्या + आलय
↓
विद्यालय
यहाँ—
- विद्या = पूर्वपद
- आलय = उत्तरपद
- विद्यालय = समस्त पद
इसी नियम का पालन प्रत्येक सामासिक शब्द में होता है।
सामासिक शब्द क्या होता है?
समास के नियमों द्वारा निर्मित प्रत्येक नया शब्द सामासिक शब्द कहलाता है। व्याकरण की दृष्टि से सामासिक शब्द और समस्त पद दोनों लगभग समान अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।
अर्थात्—
- राजपुत्र एक सामासिक शब्द है।
- विद्यालय एक सामासिक शब्द है।
- माता-पिता एक सामासिक शब्द है।
- पंचवटी एक सामासिक शब्द है।
- नीलकमल एक सामासिक शब्द है।
व्याकरण की पुस्तकों में कहीं “समस्त पद” शब्द मिलता है, तो कहीं “सामासिक शब्द”। व्यवहार में दोनों का आशय एक ही होता है।
चारों शब्दों का संबंध एक साथ समझें
अब तक पढ़े गए सभी शब्दों को यदि एक साथ देखा जाए, तो पूरी प्रक्रिया अत्यंत सरल दिखाई देती है।
| पूर्वपद | उत्तरपद | समस्त पद / सामासिक शब्द |
|---|---|---|
| राज | पुत्र | राजपुत्र |
| विद्या | आलय | विद्यालय |
| रसोई | घर | रसोईघर |
| माता | पिता | माता-पिता |
| नील | कमल | नीलकमल |
| पंच | वटी | पंचवटी |
यह सारणी पूरे समास अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत सारणियों में से एक है। यदि विद्यार्थी इसे अच्छी तरह समझ ले, तो आगे समास-विग्रह तथा समास की पहचान करना बहुत सरल हो जाता है।
क्या प्रत्येक समास में पूर्वपद और उत्तरपद का महत्व समान होता है?
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है।
यद्यपि प्रत्येक सामासिक शब्द में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों होते हैं, लेकिन सभी समासों में दोनों की प्रधानता समान नहीं होती।
किसी समास में पहला पद प्रधान होता है, किसी में दूसरा पद, किसी में दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि कुछ समासों में दोनों पद मिलकर किसी तीसरे अर्थ की ओर संकेत करते हैं।
इसी आधार पर समासों का वर्गीकरण किया गया है।
नीचे दी गई सारणी इस तथ्य को संक्षेप में स्पष्ट करती है—
| समास | प्रधान पद |
|---|---|
| अव्ययीभाव | पूर्वपद |
| तत्पुरुष | उत्तरपद |
| कर्मधारय | उत्तरपद |
| द्विगु | उत्तरपद |
| द्वंद्व | दोनों पद |
| बहुव्रीहि | कोई भी नहीं (तीसरा अर्थ प्रधान) |
अभी इस सारणी को केवल एक परिचय के रूप में समझना पर्याप्त है। आगे जब प्रत्येक समास का विस्तार से अध्ययन करेंगे, तब इन सभी बिंदुओं को उदाहरण सहित समझेंगे।
इन अवधारणाओं को समझना क्यों आवश्यक है?
समास के अधिकांश प्रश्न—चाहे वे समास-विग्रह से संबंधित हों, समास की पहचान से जुड़े हों या विभिन्न समासों के बीच अंतर पर आधारित हों—इन्हीं मूल अवधारणाओं पर आधारित होते हैं।
यदि विद्यार्थी यह पहचानना सीख जाए कि किसी सामासिक शब्द में पूर्वपद कौन-सा है, उत्तरपद कौन-सा है और समस्त पद किसे कहते हैं, तो आगे समास के प्रकारों को समझने में उसे किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती।
इसी कारण हिन्दी व्याकरण में समास के प्रकारों का अध्ययन प्रारम्भ करने से पहले इन आधारभूत शब्दों की स्पष्ट समझ विकसित करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
अब जबकि समास की संरचना पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है, अगला चरण उस प्रक्रिया को समझना है जिसके माध्यम से किसी सामासिक शब्द को पुनः उसके मूल शब्दों में विभाजित किया जाता है। इसी प्रक्रिया को समास-विग्रह कहा जाता है, और आगे समास के प्रत्येक प्रकार की पहचान में इसकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
समास-विग्रह क्या है?
अब तक आपने यह समझ लिया कि समास कैसे बनता है, पूर्वपद और उत्तरपद क्या होते हैं तथा दोनों के मेल से समस्त पद या सामासिक शब्द का निर्माण कैसे होता है। लेकिन समास का अध्ययन यहीं समाप्त नहीं होता। जितना महत्वपूर्ण सामासिक शब्द बनाना है, उतना ही महत्वपूर्ण उसे पुनः उसके मूल रूप में समझना भी है।
यही कार्य समास-विग्रह के माध्यम से किया जाता है।
वास्तव में समास और समास-विग्रह एक-दूसरे की पूरक प्रक्रियाएँ हैं। जहाँ समास कई शब्दों को मिलाकर एक नया शब्द बनाता है, वहीं समास-विग्रह उसी सामासिक शब्द को पुनः उसके मूल शब्दों में विभाजित करके उनके बीच छिपे हुए संबंध को स्पष्ट करता है। इसलिए यदि समास को “संक्षेप” कहा जाए, तो समास-विग्रह को उसका “विस्तार” कहा जा सकता है।
समास-विग्रह की परिभाषा
किसी सामासिक शब्द को उसके मूल शब्दों में विभाजित करके उनके बीच छिपे हुए संबंध, विभक्ति या परसर्ग को स्पष्ट करने की प्रक्रिया को समास-विग्रह कहते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो—
समस्त पद को उसके मूल रूप में वापस लिखना ही समास-विग्रह है।
उदाहरण के लिए—
- राजपुत्र → राजा का पुत्र
- विद्यालय → विद्या के लिए आलय
- जलमग्न → जल में मग्न
- यथाशक्ति → शक्ति के अनुसार
- माता-पिता → माता और पिता
इन सभी उदाहरणों में सामासिक शब्द को उसके मूल वाक्यांश में परिवर्तित किया गया है। यही समास-विग्रह कहलाता है।
समास और समास-विग्रह का संबंध
समास और समास-विग्रह को अलग-अलग नहीं समझा जा सकता। दोनों एक ही प्रक्रिया के दो विपरीत पक्ष हैं। समास में शब्द छोटे होते हैं, जबकि समास-विग्रह में वही शब्द पुनः विस्तृत रूप में लिखे जाते हैं। इसे निम्न सारणी से आसानी से समझा जा सकता है—
| समास (संक्षिप्त रूप) | समास-विग्रह (विस्तृत रूप) |
|---|---|
| राजपुत्र | राजा का पुत्र |
| विद्यालय | विद्या के लिए आलय |
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित |
| जलमग्न | जल में मग्न |
| माता-पिता | माता और पिता |
| पंचवटी | पाँच वटों का समूह |
यदि ध्यान से देखा जाए, तो प्रत्येक समास-विग्रह में वह शब्द या विभक्ति पुनः दिखाई देती है जो समास बनाते समय लुप्त हो गई थी।
समास-विग्रह क्यों आवश्यक है?
कई विद्यार्थी सीधे समास का प्रकार याद करने का प्रयास करते हैं, जबकि सही तरीका इसके बिल्कुल विपरीत है।
समास की पहचान करने का सबसे विश्वसनीय तरीका पहले समास-विग्रह करना है। जब विग्रह सही होगा, तभी यह स्पष्ट होगा कि शब्दों के बीच कौन-सा संबंध है और उसी आधार पर समास का प्रकार निर्धारित किया जाएगा।
उदाहरण के लिए यदि “राजपुत्र” का विग्रह “राजा का पुत्र” है, तो “का” के आधार पर यह सम्बन्ध तत्पुरुष सिद्ध होता है। यदि “माता-पिता” का विग्रह “माता और पिता” है, तो “और” के आधार पर यह द्वंद्व समास होगा। इसी प्रकार “यथाशक्ति” का विग्रह “शक्ति के अनुसार” होने के कारण यह अव्ययीभाव समास माना जाएगा।
अर्थात्—
सही समास की पहचान का पहला चरण हमेशा सही समास-विग्रह होता है।
समास-विग्रह करने की चरणबद्ध विधि
किसी भी सामासिक शब्द का विग्रह करते समय एक निश्चित क्रम अपनाना चाहिए। यदि यह क्रम स्पष्ट हो जाए, तो कठिन से कठिन सामासिक शब्द का भी सही विश्लेषण किया जा सकता है।
नीचे समास-विग्रह की पूरी प्रक्रिया क्रमवार दी गई है—
| चरण | क्या करना है? |
|---|---|
| पहला | सामासिक शब्द को ध्यान से पढ़ें। |
| दूसरा | पूर्वपद और उत्तरपद की पहचान करें। |
| तीसरा | दोनों पदों के बीच छिपे संबंध का अनुमान लगाएँ। |
| चौथा | उचित विभक्ति या परसर्ग जोड़ें। |
| पाँचवाँ | पूर्ण एवं अर्थपूर्ण विग्रह लिखें। |
यह क्रम अभ्यास के साथ अत्यंत सरल हो जाता है और आगे समास के सभी प्रकारों की पहचान में सहायता करता है।
समास-विग्रह के उदाहरण
अब कुछ प्रमुख सामासिक शब्दों का विग्रह क्रमवार देखते हैं—
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह |
|---|---|
| राजपुत्र | राजा का पुत्र |
| विद्यालय | विद्या के लिए आलय |
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित |
| पथभ्रष्ट | पथ से भ्रष्ट |
| जलमग्न | जल में मग्न |
| प्रतिदिन | प्रत्येक दिन |
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार |
| माता-पिता | माता और पिता |
| पंचवटी | पाँच वटों का समूह |
| नीलकमल | नीला है जो कमल |
| दशानन | दस हैं आनन जिसके (रावण) |
इन उदाहरणों को देखने से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक समास-विग्रह में कोई-न-कोई संबंधसूचक शब्द अवश्य जुड़ता है। यही संबंध आगे समास की पहचान का आधार बनता है।
समास-विग्रह करते समय किन बातों का ध्यान रखें?
समास-विग्रह केवल शब्दों को अलग-अलग लिख देना नहीं है। यदि संबंधसूचक शब्द गलत लिख दिया जाए, तो समास का प्रकार भी बदल सकता है। इसलिए कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।
| ध्यान रखने योग्य बात | कारण |
|---|---|
| विग्रह हमेशा अर्थपूर्ण होना चाहिए। | केवल शब्द अलग करना पर्याप्त नहीं है। |
| उचित विभक्ति का प्रयोग करें। | यही समास का प्रकार निर्धारित करती है। |
| शब्द का वास्तविक अर्थ समझें। | संदर्भ बदलने पर समास भी बदल सकता है। |
| केवल रटकर उत्तर न दें। | पहले विग्रह, फिर समास पहचानें। |
क्या एक ही शब्द का एक से अधिक समास-विग्रह हो सकता है?
यह समास का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है और यहीं से उच्च स्तर के प्रश्न पूछे जाते हैं। कुछ सामासिक शब्द ऐसे होते हैं जिनका समास-विग्रह संदर्भ के अनुसार बदल सकता है। परिणामस्वरूप उनका समास भी बदल जाता है। उदाहरण के लिए—
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | समास |
|---|---|---|
| नीलकंठ | नीला है जो कंठ | कर्मधारय |
| नीलकंठ | नीला कंठ है जिसका (शिव) | बहुव्रीहि |
| पीताम्बर | पीला है जो अम्बर (वस्त्र) | कर्मधारय |
| पीताम्बर | पीले वस्त्र धारण करने वाले श्रीकृष्ण | बहुव्रीहि |
| त्रिनेत्र | तीन नेत्रों का समूह | द्विगु |
| त्रिनेत्र | तीन नेत्र हैं जिसके (शिव) | बहुव्रीहि |
इसी कारण समास-विग्रह करते समय केवल शब्द नहीं, बल्कि अर्थ और संदर्भ दोनों को समझना आवश्यक होता है।
समास-विग्रह का अभ्यास क्यों आवश्यक है?
समास अध्याय का अधिकांश भाग समास-विग्रह पर आधारित है। यदि विद्यार्थी किसी भी सामासिक शब्द का सही विग्रह करना सीख जाए, तो उसके लिए समास की पहचान, तत्पुरुष के उपभेद, कर्मधारय और बहुव्रीहि का अंतर तथा वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का समाधान करना बहुत सरल हो जाता है।
दूसरे शब्दों में कहा जाए तो—
समास-विग्रह समास अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत कौशल (Core Skill) है।
यही कारण है कि अधिकांश व्याकरणाचार्य समास का अध्ययन हमेशा समास-विग्रह के अभ्यास के साथ करने की सलाह देते हैं।
अब जबकि समास की रचना, उसके घटक और समास-विग्रह की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट हो चुकी है, अगला स्वाभाविक चरण समासों के वर्गीकरण को समझना है। आगे हम विस्तार से जानेंगे कि समास के कितने प्रकार होते हैं, उनका आधार क्या है और प्रत्येक प्रकार की अपनी विशिष्ट पहचान क्या होती है। यही आधार आगे पूरे समास अध्याय को व्यवस्थित रूप से समझने में हमारी सहायता करेगा।
समास के कितने प्रकार होते हैं?
अब तक हमने समास की मूल अवधारणा, उसकी रचना, समस्त पद, पूर्वपद, उत्तरपद तथा समास-विग्रह को विस्तार से समझ लिया है। अब प्रश्न यह उठता है कि सभी सामासिक शब्द एक ही प्रकार से क्यों नहीं बनते? यदि प्रत्येक समास केवल शब्दों को जोड़ने की प्रक्रिया होती, तो सभी शब्दों का निर्माण एक ही नियम के अनुसार होता। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है।
कुछ सामासिक शब्दों में पहला पद अधिक महत्वपूर्ण होता है, कुछ में दूसरा पद प्रधान होता है, कुछ में दोनों पद समान महत्व रखते हैं और कुछ में दोनों पद मिलकर किसी तीसरे अर्थ की ओर संकेत करते हैं। इन्हीं विशेषताओं के आधार पर व्याकरणाचार्यों ने समास का वर्गीकरण किया है।
यही वर्गीकरण हमें यह समझने में सहायता करता है कि किसी सामासिक शब्द का निर्माण किस सिद्धांत पर हुआ है और उसका सही समास-विग्रह तथा समास का प्रकार क्या होगा।
समास के मुख्य प्रकार
हिन्दी व्याकरण में समास के छः प्रमुख प्रकार माने जाते हैं। प्रत्येक प्रकार की अपनी अलग पहचान, संरचना और नियम हैं। किसी भी सामासिक शब्द का सही वर्गीकरण तभी संभव है जब इन सभी प्रकारों की विशेषताओं को क्रमबद्ध रूप से समझा जाए।
समास के छह मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं—
| क्रम | समास का प्रकार | प्रधान पद |
|---|---|---|
| 1 | अव्ययीभाव समास | पूर्वपद |
| 2 | तत्पुरुष समास | उत्तरपद |
| 3 | कर्मधारय समास | उत्तरपद |
| 4 | द्विगु समास | उत्तरपद |
| 5 | द्वंद्व समास | दोनों पद |
| 6 | बहुव्रीहि समास | कोई भी पद प्रधान नहीं, अन्य अर्थ प्रधान |
यह सारणी केवल नाम याद करने के लिए नहीं है, बल्कि पूरे समास अध्याय का आधार है। आगे जब प्रत्येक समास का विस्तार से अध्ययन करेंगे, तो यही प्रधानता (प्रधान पद) उनकी सबसे बड़ी पहचान बनेगी।
समासों का वर्गीकरण किस आधार पर किया गया है?
यह प्रश्न अक्सर विद्यार्थियों के मन में आता है कि समासों को छह अलग-अलग वर्गों में विभाजित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। इसका उत्तर समास की संरचना में ही छिपा हुआ है।
समास का प्रकार केवल शब्दों के मेल से निर्धारित नहीं होता, बल्कि निम्नलिखित बातों के आधार पर तय होता है—
- कौन-सा पद प्रधान है?
- दोनों पदों के बीच किस प्रकार का संबंध है?
- विग्रह करने पर कौन-सा संबंधसूचक शब्द प्राप्त होता है?
- क्या समस्त पद किसी समूह का बोध कराता है?
- क्या दोनों पद समान महत्व रखते हैं?
- क्या पूरा शब्द किसी तीसरे अर्थ की ओर संकेत करता है?
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर यह निर्धारित करते हैं कि कोई सामासिक शब्द किस समास के अंतर्गत आएगा।
प्रत्येक समास की मूल पहचान
अब प्रत्येक समास की मूल विशेषता को एक साथ समझते हैं। इससे आगे के विस्तृत अध्ययन को समझना अधिक सरल हो जाएगा।
| समास | मुख्य पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| अव्ययीभाव | पहला पद अव्यय एवं प्रधान होता है | यथाशक्ति, प्रतिदिन |
| तत्पुरुष | दूसरा पद प्रधान, विभक्ति का लोप | राजपुत्र, विद्यालय |
| कर्मधारय | विशेषण–विशेष्य या उपमान–उपमेय संबंध | नीलकमल, चंद्रमुख |
| द्विगु | पहला पद संख्यावाचक, समूह का बोध | त्रिलोक, पंचवटी |
| द्वंद्व | दोनों पद समान रूप से प्रधान | माता-पिता, सुख-दुःख |
| बहुव्रीहि | दोनों पद मिलकर किसी अन्य अर्थ का बोध कराते हैं | दशानन, नीलकंठ |
यदि इस सारणी को ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि प्रत्येक समास की पहचान अलग सिद्धांत पर आधारित है। यही कारण है कि केवल उदाहरण याद कर लेना पर्याप्त नहीं होता; उसकी संरचना को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
क्या केवल परिभाषा याद करना पर्याप्त है?
अधिकांश विद्यार्थी समास के नाम और उनकी परिभाषाएँ याद कर लेते हैं, लेकिन वास्तविक कठिनाई तब आती है जब किसी सामासिक शब्द का प्रकार पहचानना होता है।
उदाहरण के लिए—
- माता-पिता और राजपुत्र दोनों ही दो शब्दों से बने हैं, फिर भी दोनों का समास अलग है।
- नीलकमल और नीलकंठ दोनों में “नील” शब्द समान है, लेकिन संदर्भ बदलने पर दोनों का समास बदल सकता है।
- त्रिलोक और त्रिनेत्र दोनों में संख्या है, फिर भी दोनों का समास हर बार समान नहीं होगा।
इससे स्पष्ट होता है कि समास की पहचान केवल शब्द देखकर नहीं, बल्कि उसके विग्रह, अर्थ और संरचना को समझकर की जाती है।
क्या सभी समासों को याद करना कठिन है?
पहली दृष्टि में समास के छह प्रकार अलग-अलग प्रतीत होते हैं, लेकिन जब उनकी मूल पहचान समझ ली जाती है, तो उन्हें याद रखना कठिन नहीं रहता।
उदाहरण के लिए—
- यदि पहला पद अव्यय है, तो अव्ययीभाव की संभावना होगी।
- यदि दूसरा पद प्रधान है और विभक्ति का लोप हुआ है, तो तत्पुरुष की ओर ध्यान जाएगा।
- यदि विशेषण और विशेष्य का संबंध है, तो कर्मधारय होगा।
- यदि संख्या के साथ समूह का अर्थ है, तो द्विगु होगा।
- यदि “और” या “या” का भाव है, तो द्वंद्व होगा।
- यदि पूरा शब्द किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु का बोध करा रहा है, तो बहुव्रीहि होगा।
यद्यपि यह केवल प्रारम्भिक संकेत हैं, लेकिन आगे प्रत्येक समास का विस्तार से अध्ययन करने पर इनकी पहचान और अधिक स्पष्ट होती जाएगी।
अव्ययीभाव समास
समास के छह प्रकारों में अव्ययीभाव समास को सबसे पहले रखा जाता है। इसका कारण केवल परंपरा नहीं है, बल्कि इसकी संरचना अन्य सभी समासों से भिन्न है। जहाँ अधिकांश समासों में संज्ञा, विशेषण या संख्या प्रधान भूमिका निभाते हैं, वहीं अव्ययीभाव समास में अव्यय सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है। इसलिए इसे समझने का तरीका भी अन्य समासों से अलग है।
यदि समास के सभी प्रकारों की तुलना की जाए, तो यह एकमात्र ऐसा समास है जिसमें पूर्वपद (पहला पद) प्रधान होता है। यही इसकी सबसे बड़ी पहचान है। आगे चलकर आप देखेंगे कि अन्य समासों की पहचान में कभी उत्तरपद, कभी दोनों पद या कभी कोई तीसरा अर्थ प्रधान होता है, लेकिन अव्ययीभाव समास में पूरा अर्थ पहले पद के इर्द-गिर्द निर्मित होता है।
इसी कारण समास की पहचान करते समय सबसे पहले यह देखा जाता है कि कहीं पहला पद अव्यय तो नहीं है। यदि ऐसा है, तो अव्ययीभाव समास होने की संभावना सबसे अधिक होती है।
अव्ययीभाव समास की परिभाषा
जिस समास में पहला पद अव्यय हो तथा वही पूरे समास का मुख्य अर्थ निर्धारित करे, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो—
यदि किसी सामासिक शब्द का पहला पद अव्यय हो और समस्त पद का अर्थ उसी के आधार पर निर्धारित हो, तो वह अव्ययीभाव समास कहलाता है।
यहाँ “अव्यय” का अर्थ ऐसे शब्द से है जिसका रूप लिंग, वचन, पुरुष या कारक के अनुसार नहीं बदलता।
उदाहरण—
- यथाशक्ति
- प्रतिदिन
- आजीवन
- यथासंभव
- आमरण
इन सभी शब्दों में पहला पद अव्यय है और वही पूरे शब्द का अर्थ निर्धारित कर रहा है।
अव्यय क्या होता है?
अव्ययीभाव समास को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि अव्यय किसे कहते हैं। यदि अव्यय की अवधारणा स्पष्ट नहीं होगी, तो अव्ययीभाव समास की पहचान करना भी कठिन हो जाएगा।
हिन्दी व्याकरण में अव्यय ऐसे शब्दों को कहा जाता है जिनके रूप में किसी भी परिस्थिति में परिवर्तन नहीं होता। अर्थात् लिंग, वचन, पुरुष अथवा कारक बदलने पर भी उनका स्वरूप वही रहता है।
उदाहरण के लिए—
- यथा
- प्रति
- आ
- अनु
- बे
- निर्
- बिना
ये सभी ऐसे शब्द हैं जिनका रूप नहीं बदलता। यही कारण है कि जब ये किसी अन्य शब्द के साथ मिलकर सामासिक शब्द बनाते हैं, तो अव्ययीभाव समास का निर्माण होता है।
अव्ययीभाव समास की मुख्य पहचान
किसी भी सामासिक शब्द को देखते ही यह पहचान लेना कि वह अव्ययीभाव समास है या नहीं, अभ्यास के साथ सरल हो जाता है। इसके लिए कुछ प्रमुख विशेषताओं को समझना आवश्यक है।
नीचे दी गई सारणी इसकी पहचान को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करती है—
| पहचान | विवरण |
|---|---|
| पहला पद अव्यय होता है। | जैसे—यथा, प्रति, आ, बे, निर् आदि। |
| पहला पद प्रधान होता है। | पूरा अर्थ उसी के आधार पर बनता है। |
| विग्रह में “के अनुसार”, “प्रत्येक”, “तक”, “भर”, “बिना” आदि शब्द आते हैं। | यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण पहचान है। |
| समस्त पद प्रायः क्रियाविशेषणीय अर्थ देता है। | जैसे—प्रतिदिन, आजीवन, यथाक्रम। |
यदि किसी शब्द में ये विशेषताएँ एक साथ दिखाई दें, तो उसके अव्ययीभाव समास होने की संभावना अत्यधिक होती है।
अव्ययीभाव समास की पहचान विग्रह से कैसे करें?
केवल शब्द देखकर समास की पहचान करना हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए सबसे पहले उसका समास-विग्रह किया जाता है।
यदि विग्रह में निम्न प्रकार के संबंध प्राप्त हों—
- के अनुसार
- प्रत्येक
- तक
- भर
- बिना
- ही-ही
- पर्यन्त
तो सामान्यतः वह अव्ययीभाव समास होता है। उदाहरण—
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह |
|---|---|
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार |
| यथासंभव | संभव के अनुसार |
| प्रतिदिन | प्रत्येक दिन |
| प्रतिवर्ष | प्रत्येक वर्ष |
| आजीवन | जीवन भर |
| आमरण | मरण तक |
| भरपेट | पेट भरकर |
| बेशक | शक के बिना |
यदि इन विग्रहों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि प्रत्येक शब्द में पहला पद ही अर्थ का आधार बन रहा है।
अव्ययीभाव समास को उदाहरणों से समझें
अब कुछ प्रमुख उदाहरणों का विश्लेषण करते हैं—
| सामासिक शब्द | विग्रह | पहला पद | समास |
|---|---|---|---|
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार | यथा | अव्ययीभाव |
| यथासंभव | संभव के अनुसार | यथा | अव्ययीभाव |
| प्रतिदिन | प्रत्येक दिन | प्रति | अव्ययीभाव |
| प्रतिवर्ष | प्रत्येक वर्ष | प्रति | अव्ययीभाव |
| आजन्म | जन्म से लेकर | आ | अव्ययीभाव |
| आजीवन | जीवन भर | आ | अव्ययीभाव |
| आमरण | मरण तक | आ | अव्ययीभाव |
| भरपेट | पेट भरकर | भर | अव्ययीभाव |
| बेशक | शक के बिना | बे | अव्ययीभाव |
| निडर | डर के बिना | नि | अव्ययीभाव |
इन उदाहरणों में स्पष्ट दिखाई देता है कि प्रत्येक शब्द का पहला भाग पूरे अर्थ को नियंत्रित कर रहा है। यही अव्ययीभाव समास की मूल विशेषता है।
क्या प्रत्येक अव्यय से अव्ययीभाव समास बनता है?
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
उत्तर है—नहीं।
केवल पहला पद अव्यय होने से ही अव्ययीभाव समास नहीं बन जाता। यह भी आवश्यक है कि वही अव्यय पूरे शब्द के अर्थ को नियंत्रित करे।
उदाहरण के लिए—
यथाशक्ति
यहाँ “यथा” केवल जुड़ा हुआ शब्द नहीं है, बल्कि पूरा अर्थ “शक्ति के अनुसार” उसी से बन रहा है।
इसी प्रकार—
प्रतिदिन
का अर्थ “प्रत्येक दिन” है, जहाँ “प्रति” पूरे अर्थ का आधार है।
अर्थात् केवल अव्यय का होना पर्याप्त नहीं है; उसका प्रधान होना भी आवश्यक है।
अव्ययीभाव समास की मूल अवधारणा
यदि अब तक पढ़ी गई सभी बातों को एक वाक्य में समझना हो, तो कहा जा सकता है—
अव्ययीभाव समास की पहचान हमेशा पहले पद से होती है, क्योंकि वही अव्यय पूरे समस्त पद के अर्थ को नियंत्रित करता है।
यही कारण है कि समास की पहचान करते समय अधिकांश व्याकरणाचार्य सबसे पहले यह देखने की सलाह देते हैं कि कहीं पहला पद अव्यय तो नहीं है।
अव्ययीभाव समास के निर्माण के आधार
अब तक आपने यह समझ लिया कि अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय होता है और वही पूरे समस्त पद का अर्थ निर्धारित करता है। लेकिन केवल इतनी जानकारी पर्याप्त नहीं है। व्यवहार में अव्ययीभाव समास अनेक रूपों में मिलता है। कहीं इसका निर्माण उपसर्गों के माध्यम से होता है, कहीं किसी शब्द की पुनरावृत्ति से और कहीं दो समान शब्दों के विशेष प्रयोग से।
इसी कारण केवल परिभाषा याद कर लेने से अव्ययीभाव समास की सही पहचान संभव नहीं होती। इसके निर्माण के आधारों को समझना आवश्यक है। जब विद्यार्थी यह समझ लेता है कि अव्ययीभाव समास किन-किन रूपों में बनता है, तब वह कठिन से कठिन उदाहरण की भी सही पहचान कर सकता है।
व्याकरण की दृष्टि से अव्ययीभाव समास का निर्माण मुख्यतः निम्नलिखित आधारों पर होता है—
| क्रम | निर्माण का आधार | संक्षिप्त परिचय |
|---|---|---|
| 1 | उपसर्ग या अव्यय के योग से | पहला पद अव्यय होता है, जैसे—यथा, प्रति, आ, बे, निर् आदि। |
| 2 | एक ही शब्द की पुनरावृत्ति से | एक ही शब्द दो बार आता है, जैसे—घर-घर, नगर-नगर। |
| 3 | समान शब्दों के विशेष योग से | दोनों शब्दों के बीच मात्रा या व्यंजन का प्रयोग होता है, जैसे—हाथोंहाथ, दिनोदिन। |
अब इन तीनों आधारों को क्रमवार विस्तार से समझते हैं।
1. उपसर्ग अथवा अव्यय के योग से बनने वाले अव्ययीभाव समास
अव्ययीभाव समास का सबसे सामान्य और सर्वाधिक प्रचलित रूप यही है। इसमें पहला पद किसी अव्यय या उपसर्ग के रूप में प्रयुक्त होता है और दूसरा पद उसके साथ मिलकर नया सामासिक शब्द बनाता है।
इस प्रकार के शब्दों में पहला पद कभी भी अपना रूप नहीं बदलता और वही पूरे शब्द का अर्थ निर्धारित करता है। नीचे दी गई सारणी इसके प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत करती है—
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | प्रयुक्त अव्यय |
|---|---|---|
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार | यथा |
| यथासंभव | संभव के अनुसार | यथा |
| यथाक्रम | क्रम के अनुसार | यथा |
| यथाविधि | विधि के अनुसार | यथा |
| प्रतिदिन | प्रत्येक दिन | प्रति |
| प्रतिवर्ष | प्रत्येक वर्ष | प्रति |
| प्रतिक्षण | प्रत्येक क्षण | प्रति |
| आजन्म | जन्म से लेकर | आ |
| आजीवन | जीवन भर | आ |
| आमरण | मरण तक | आ |
| बेघर | घर के बिना | बे |
| बेशक | शक के बिना | बे |
| निर्दोष | दोष रहित | निर् |
| निस्संदेह | संदेह के बिना | निस् |
यदि इन उदाहरणों का विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि प्रत्येक शब्द में पहला पद ही अर्थ की दिशा निर्धारित कर रहा है। उदाहरण के लिए “यथा” जहाँ भी आता है, वहाँ उसका अर्थ “के अनुसार” होता है। इसी प्रकार “प्रति” का अर्थ “प्रत्येक”, “आ” का अर्थ “तक” या “भर” तथा “बे” या “निर्” का अर्थ “बिना” या “रहित” होता है।
यही कारण है कि ऐसे शब्दों की पहचान अपेक्षाकृत सरल होती है।
2. एक ही शब्द की पुनरावृत्ति से बनने वाले अव्ययीभाव समास
अव्ययीभाव समास का दूसरा महत्वपूर्ण रूप वह है जिसमें एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होती है। यहाँ दोनों शब्द समान होते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य किसी स्थान, समय या क्रम की निरंतरता को व्यक्त करना होता है।
इन शब्दों में किसी प्रकार की विभक्ति का प्रयोग नहीं होता, फिर भी पूरा शब्द अव्ययी अर्थ देता है।
उदाहरण देखें—
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह |
|---|---|
| घर-घर | प्रत्येक घर |
| नगर-नगर | प्रत्येक नगर |
| गाँव-गाँव | प्रत्येक गाँव |
| गली-गली | प्रत्येक गली |
| रोज़-रोज़ | प्रतिदिन |
| पल-पल | प्रत्येक पल |
| क्षण-क्षण | प्रत्येक क्षण |
इन उदाहरणों में किसी विशेष व्यक्ति या वस्तु का उल्लेख नहीं है, बल्कि व्यापकता और निरंतरता का भाव व्यक्त किया गया है। “घर-घर” का अर्थ किसी एक घर से नहीं, बल्कि प्रत्येक घर से है। इसी प्रकार “नगर-नगर” का अर्थ हर नगर तथा “पल-पल” का अर्थ प्रत्येक पल होता है।
इस प्रकार की पुनरावृत्ति हिन्दी भाषा को अधिक प्रभावशाली और अभिव्यक्तिपूर्ण बनाती है।
3. समान शब्दों के विशेष योग से बनने वाले अव्ययीभाव समास
अव्ययीभाव समास का तीसरा रूप थोड़ा भिन्न होता है। इसमें दो समान शब्दों के बीच मात्रा, अनुस्वार या अन्य ध्वन्यात्मक परिवर्तन दिखाई देता है। देखने में यह सामान्य पुनरावृत्ति जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में यह एक विशिष्ट संरचना होती है।
इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग हिन्दी में अत्यंत स्वाभाविक रूप से किया जाता है।
इसके प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं—
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह |
|---|---|
| हाथोंहाथ | हाथ ही हाथ में |
| दिनोदिन | दिन-प्रतिदिन |
| रातोंरात | रात ही रात में |
| बातोंबात | बात ही बात में |
| देखते-देखते | देखते ही देखते |
| चलते-चलते | चलते ही चलते |
यदि इन शब्दों को ध्यान से देखा जाए, तो इनमें गति, क्रम, तात्कालिकता या निरंतरता का भाव दिखाई देता है। उदाहरण के लिए “हाथोंहाथ” का अर्थ है तुरंत, बिना विलंब के। “रातोंरात” का अर्थ है बहुत कम समय में, जबकि “दिनोदिन” का अर्थ है लगातार प्रत्येक दिन।
ऐसे शब्द साहित्य, पत्रकारिता तथा सामान्य बोलचाल की भाषा में अत्यधिक प्रयुक्त होते हैं।
अव्ययीभाव समास के निर्माण का समग्र विश्लेषण
अब तक पढ़े गए तीनों आधारों को यदि एक साथ देखा जाए, तो अव्ययीभाव समास की पूरी संरचना स्पष्ट हो जाती है।
| निर्माण का आधार | पहचान | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|---|
| अव्यय या उपसर्ग का प्रयोग | पहला पद अव्यय होता है | यथाशक्ति, प्रतिदिन, आजीवन |
| शब्द की पुनरावृत्ति | एक ही शब्द दो बार आता है | घर-घर, नगर-नगर, पल-पल |
| विशेष पुनरावृत्ति | बीच में मात्रा या ध्वनि परिवर्तन | हाथोंहाथ, दिनोदिन, रातोंरात |
इस सारणी से स्पष्ट है कि अव्ययीभाव समास केवल एक प्रकार की संरचना तक सीमित नहीं है। इसके निर्माण के कई रूप हैं, लेकिन इन सभी में एक समान विशेषता यह है कि पूरा शब्द अव्ययी अर्थ प्रदान करता है और उसका पहला भाग अर्थ की दिशा निर्धारित करता है।
तत्पुरुष समास के भेद
अब तक आपने यह समझ लिया कि तत्पुरुष समास में उत्तरपद प्रधान होता है तथा दोनों पदों के बीच प्रयुक्त विभक्ति या कारक-चिह्न का लोप हो जाता है। लेकिन यहीं पर तत्पुरुष समास का अध्ययन समाप्त नहीं होता। वास्तव में इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत कई प्रकार के संबंध पाए जाते हैं। यही कारण है कि हिन्दी व्याकरण में तत्पुरुष समास को सबसे विस्तृत समास माना जाता है।
यदि केवल “राजपुत्र” और “जलमग्न” को देखा जाए, तो दोनों तत्पुरुष समास हैं, लेकिन दोनों के विग्रह में प्रयुक्त विभक्ति अलग-अलग है। “राजपुत्र” में ‘का’ का लोप हुआ है, जबकि “जलमग्न” में ‘में’ का। इसी प्रकार “हस्तलिखित” में ‘से’, “विद्यालय” में ‘के लिए’ तथा “सिद्धिप्राप्त” में ‘को’ का लोप हुआ है।
यही अंतर यह स्पष्ट करता है कि तत्पुरुष समास के सभी शब्द एक ही प्रकार के नहीं होते। इनका वर्गीकरण उन कारकों के आधार पर किया जाता है, जिनकी विभक्ति समास बनने पर लुप्त हो जाती है।
तत्पुरुष समास के कितने भेद होते हैं?
संस्कृत व्याकरण में तत्पुरुष समास के आठ भेद माने गए हैं, क्योंकि वहाँ सभी आठ कारकों को आधार बनाया जाता है। किन्तु हिन्दी व्याकरण में कर्ता कारक और संबोधन कारक के आधार पर तत्पुरुष समास नहीं बनते। इसलिए हिन्दी में तत्पुरुष समास के छः प्रमुख भेद स्वीकार किए गए हैं।
ये छह भेद निम्नलिखित हैं—
| क्रम | तत्पुरुष समास का भेद | लुप्त विभक्ति / कारक |
|---|---|---|
| 1 | कर्म तत्पुरुष | को |
| 2 | करण तत्पुरुष | से / के द्वारा |
| 3 | सम्प्रदान तत्पुरुष | के लिए |
| 4 | अपादान तत्पुरुष | से (अलग होने का भाव) |
| 5 | सम्बन्ध तत्पुरुष | का, की, के |
| 6 | अधिकरण तत्पुरुष | में, पर |
यह सारणी पूरे तत्पुरुष समास अध्याय की आधारशिला है। यदि इन छह कारकों को सही प्रकार से समझ लिया जाए, तो अधिकांश सामासिक शब्दों का वर्गीकरण सहज हो जाता है।
इन छह भेदों का आधार क्या है?
कई विद्यार्थियों के मन में यह प्रश्न आता है कि एक ही तत्पुरुष समास को छह भागों में बाँटने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
इसका उत्तर समास-विग्रह में छिपा हुआ है।
जब किसी सामासिक शब्द का विग्रह किया जाता है, तब दोनों पदों के बीच कोई-न-कोई संबंध अवश्य प्राप्त होता है। यही संबंध किसी कारक के रूप में व्यक्त होता है। जिस कारक की विभक्ति समास बनने पर लुप्त हुई होती है, उसी के आधार पर तत्पुरुष समास का उपभेद निर्धारित किया जाता है।
उदाहरण के लिए—
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | कारक | भेद |
|---|---|---|---|
| सिद्धिप्राप्त | सिद्धि को प्राप्त | कर्म | कर्म तत्पुरुष |
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित | करण | करण तत्पुरुष |
| विद्यालय | विद्या के लिए आलय | सम्प्रदान | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| पथभ्रष्ट | पथ से भ्रष्ट | अपादान | अपादान तत्पुरुष |
| राजपुत्र | राजा का पुत्र | सम्बन्ध | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| जलमग्न | जल में मग्न | अधिकरण | अधिकरण तत्पुरुष |
यदि इस सारणी को ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक भेद की पहचान केवल विग्रह में प्रयुक्त कारक से होती है।
सभी भेदों को एक साथ समझें
अभी प्रत्येक उपभेद का विस्तार से अध्ययन नहीं किया जा रहा है। फिलहाल उद्देश्य केवल यह समझना है कि छहों भेद एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं।
| भेद | मुख्य प्रश्न | उदाहरण |
|---|---|---|
| कर्म | किसको? | स्वर्गप्राप्त, सिद्धिप्राप्त |
| करण | किससे? / किसके द्वारा? | हस्तलिखित, रेखांकित |
| सम्प्रदान | किसके लिए? | विद्यालय, रसोईघर |
| अपादान | किससे अलग? | पथभ्रष्ट, ऋणमुक्त |
| सम्बन्ध | किसका? | राजपुत्र, गृहस्वामी |
| अधिकरण | कहाँ? किसमें? किस पर? | जलमग्न, शरणागत |
इस सारणी से यह स्पष्ट होता है कि सभी भेदों का आधार अलग-अलग कारक हैं, जबकि समास का मूल सिद्धांत समान रहता है।
क्या “से” आने पर हमेशा एक ही भेद होगा?
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है।
तत्पुरुष समास में “से” दो अलग-अलग भेदों में आता है—
- करण तत्पुरुष
- अपादान तत्पुरुष
यही कारण है कि विद्यार्थी अक्सर इन दोनों में भ्रमित हो जाते हैं।
किन्तु दोनों में प्रयुक्त “से” का अर्थ समान नहीं होता।
| भेद | “से” का अर्थ |
|---|---|
| करण तत्पुरुष | किसी साधन, माध्यम या कर्ता के द्वारा |
| अपादान तत्पुरुष | किसी वस्तु या स्थान से अलग होना, दूर होना या मुक्त होना |
उदाहरण—
हस्तलिखित
हाथ से लिखित
यहाँ हाथ लिखने का साधन है, इसलिए यह करण तत्पुरुष है।
दूसरी ओर—
पथभ्रष्ट
पथ से भ्रष्ट
यहाँ पथ से अलग होने का भाव है, इसलिए यह अपादान तत्पुरुष है। यद्यपि दोनों में “से” आया है, फिर भी अर्थ बदल जाने के कारण समास का भेद भी बदल जाता है।
कौन-सा भेद सबसे अधिक पूछा जाता है?
यदि विभिन्न प्रश्नपत्रों के उदाहरणों का अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सम्बन्ध, करण और अपादान तत्पुरुष से सर्वाधिक प्रश्न पूछे जाते हैं। इसका कारण यह है कि इन तीनों में प्रयुक्त विभक्तियों को लेकर विद्यार्थियों में भ्रम की संभावना अधिक रहती है।
इसी प्रकार विद्यालय, रसोईघर, सत्याग्रह जैसे शब्दों के माध्यम से सम्प्रदान तत्पुरुष तथा जलमग्न, आत्मविश्वास, शरणागत जैसे शब्दों के माध्यम से अधिकरण तत्पुरुष की भी नियमित जाँच की जाती है।
इसलिए प्रत्येक उपभेद को केवल परिभाषा के आधार पर नहीं, बल्कि पर्याप्त उदाहरणों और तुलनात्मक विश्लेषण के साथ समझना आवश्यक है।
कर्म तत्पुरुष समास
तत्पुरुष समास के छह भेदों का परिचय प्राप्त करने के बाद अब हम इसके प्रथम और अत्यंत महत्वपूर्ण भेद कर्म तत्पुरुष समास का विस्तृत अध्ययन प्रारम्भ करते हैं। यह वह समास है जिसकी पहचान विद्यार्थी प्रारम्भ में तो सरल समझते हैं, किन्तु अभ्यास के समय इसे करण तत्पुरुष अथवा सम्बन्ध तत्पुरुष के साथ मिला बैठते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वे केवल शब्द देखकर उत्तर देने का प्रयास करते हैं, जबकि समास की सही पहचान हमेशा समास-विग्रह और कारक के आधार पर की जाती है।
कर्म तत्पुरुष समास को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि कर्म कारक किसे कहते हैं और समास बनने पर उसमें कौन-सी विभक्ति लुप्त होती है। जब यह आधार स्पष्ट हो जाता है, तब इस प्रकार के सभी सामासिक शब्द स्वतः समझ में आने लगते हैं।
कर्म तत्पुरुष समास की परिभाषा
जिस तत्पुरुष समास में दोनों पदों के बीच कर्म कारक की विभक्ति “को” का लोप हो जाता है, उसे कर्म तत्पुरुष समास कहते हैं।
अर्थात् यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “को” शब्द प्राप्त हो, तो वह कर्म तत्पुरुष समास कहलाता है।
इसे सरल शब्दों में इस प्रकार भी समझा जा सकता है—
जहाँ कोई कार्य, क्रिया या प्राप्ति किसी वस्तु या व्यक्ति “को” लक्षित करती है और समास बनने पर “को” हट जाता है, वहाँ कर्म तत्पुरुष समास होता है।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि “को” समास में दिखाई नहीं देता, लेकिन समास-विग्रह करते समय उसका प्रयोग अवश्य होता है।
कर्म तत्पुरुष समास का मूल सिद्धांत
कर्म तत्पुरुष समास में सामान्यतः कोई क्रिया किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थान या लक्ष्य पर घटित होती है। वही लक्ष्य कर्म कहलाता है।
उदाहरण के लिए—
स्वर्गप्राप्त
↓
स्वर्ग को प्राप्त
यहाँ “प्राप्त” होने की क्रिया “स्वर्ग” को लक्ष्य बनाकर की गई है। इसलिए “स्वर्ग” कर्म है और “को” कर्म कारक की विभक्ति है।
इसी प्रकार—
सिद्धिप्राप्त
↓
सिद्धि को प्राप्त
यहाँ भी प्राप्ति का लक्ष्य “सिद्धि” है।
इसी सिद्धांत के कारण यह कर्म तत्पुरुष समास कहलाता है।
कर्म तत्पुरुष समास की पहचान
किसी भी सामासिक शब्द को देखते ही उसे कर्म तत्पुरुष घोषित नहीं करना चाहिए। पहले उसका समास-विग्रह करना आवश्यक है।
यदि समास-विग्रह करने पर निम्न स्थिति प्राप्त हो—
संज्ञा + “को” + क्रिया
तो सामान्यतः वह कर्म तत्पुरुष समास होता है।
उदाहरण—
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | निष्कर्ष |
|---|---|---|
| स्वर्गप्राप्त | स्वर्ग को प्राप्त | कर्म तत्पुरुष |
| सिद्धिप्राप्त | सिद्धि को प्राप्त | कर्म तत्पुरुष |
| गगनचुम्बी | गगन को चूमने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| बसचालक | बस को चलाने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| माखनचोर | माखन को चुराने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| जनप्रिय | जनता को प्रिय | कर्म तत्पुरुष |
इन सभी उदाहरणों में “को” का लोप हुआ है। यही इनकी सबसे बड़ी पहचान है।
कर्म तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ
किसी भी व्याकरणिक विषय को गहराई से समझने के लिए उसकी विशेषताओं को जानना आवश्यक होता है। यही विशेषताएँ आगे चलकर पहचान का आधार बनती हैं।
नीचे कर्म तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ दी गई हैं—
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| यह तत्पुरुष समास का एक उपभेद है। | उत्तरपद प्रधान रहता है। |
| कर्म कारक की विभक्ति “को” का लोप होता है। | समास-विग्रह में “को” प्राप्त होता है। |
| दूसरा पद प्रायः क्रिया या क्रियावाचक अर्थ देता है। | जैसे—प्राप्त, चालक, चोर, प्रिय। |
| पहला पद क्रिया का लक्ष्य (कर्म) होता है। | जैसे—स्वर्ग, बस, माखन। |
| समास-विग्रह करने पर अर्थ तुरंत स्पष्ट हो जाता है। | “को” जोड़ते ही संबंध समझ में आ जाता है। |
यदि इन विशेषताओं को ध्यान में रखा जाए, तो कर्म तत्पुरुष समास की पहचान करना अत्यंत सरल हो जाता है।
कर्म तत्पुरुष समास की संरचना
कर्म तत्पुरुष समास का निर्माण एक निश्चित व्याकरणिक ढाँचे के अनुसार होता है। इसमें पहला पद सामान्यतः कर्म का कार्य करता है और दूसरा पद किसी क्रिया या क्रिया से संबंधित अर्थ देता है।
इस संरचना को निम्न सारणी से समझा जा सकता है—
| मूल वाक्यांश | लुप्त विभक्ति | समस्त पद |
|---|---|---|
| स्वर्ग को प्राप्त | को | स्वर्गप्राप्त |
| सिद्धि को प्राप्त | को | सिद्धिप्राप्त |
| बस को चलाने वाला | को | बसचालक |
| गगन को चूमने वाला | को | गगनचुम्बी |
| माखन को चुराने वाला | को | माखनचोर |
| जनता को प्रिय | को | जनप्रिय |
इन सभी उदाहरणों में समास बनने से पहले “को” उपस्थित था, लेकिन समस्त पद बनने पर उसका लोप हो गया।
इन उदाहरणों का विश्लेषण
केवल समास-विग्रह देख लेने से विषय पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता। प्रत्येक उदाहरण के पीछे छिपे व्याकरणिक संबंध को समझना भी आवश्यक है।
| सामासिक शब्द | क्रिया किस पर हो रही है? | कर्म | समास |
|---|---|---|---|
| स्वर्गप्राप्त | प्राप्त होना | स्वर्ग | कर्म तत्पुरुष |
| सिद्धिप्राप्त | प्राप्त होना | सिद्धि | कर्म तत्पुरुष |
| बसचालक | चलाना | बस | कर्म तत्पुरुष |
| माखनचोर | चुराना | माखन | कर्म तत्पुरुष |
| गगनचुम्बी | चूमना | गगन | कर्म तत्पुरुष |
| जनप्रिय | प्रिय होना | जनता | कर्म तत्पुरुष |
यदि इस दृष्टि से देखा जाए, तो प्रत्येक उदाहरण में पहला पद किसी-न-किसी क्रिया का लक्ष्य (Object) है। यही कारण है कि इन्हें कर्म तत्पुरुष कहा जाता है।
कर्म तत्पुरुष समास को याद रखने का सरल नियम
कई बार विद्यार्थी परीक्षा के समय यह भूल जाते हैं कि “को” कहाँ लगाया जाए। ऐसी स्थिति में निम्न नियम अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है—
यदि समास-विग्रह करते समय पहला पद किसी क्रिया का लक्ष्य बनता हो और उसके साथ “को” सहज रूप से लगाया जा सके, तो वह सामान्यतः कर्म तत्पुरुष समास होगा।
उदाहरण—
- माखन को चुराने वाला ✔
- बस को चलाने वाला ✔
- स्वर्ग को प्राप्त ✔
- सिद्धि को प्राप्त ✔
यह नियम अधिकांश प्रश्नों में सही पहचान करने में सहायता करता है।
कर्म तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण (विस्तृत विश्लेषण)
अब तक आपने कर्म तत्पुरुष समास की परिभाषा, उसकी संरचना तथा पहचान का अध्ययन किया। अब आवश्यकता है कि इसके अधिकाधिक उदाहरणों का विश्लेषण किया जाए। व्याकरण में केवल परिभाषा याद कर लेना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि प्रश्नपत्रों में अधिकांश प्रश्न नए शब्दों के रूप में पूछे जाते हैं। यदि विद्यार्थी केवल दो-चार उदाहरण याद करके आगे बढ़ जाता है, तो अपरिचित सामासिक शब्दों का समास निर्धारित करना कठिन हो जाता है।
इसी कारण इस भाग में कर्म तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरणों को विस्तार से समझाया गया है। प्रत्येक उदाहरण में समास-विग्रह, कर्म कारक तथा उसके पीछे छिपे व्याकरणिक संबंध का विश्लेषण किया गया है, जिससे केवल उत्तर याद न रहे, बल्कि उसके बनने का कारण भी स्पष्ट हो जाए।
(क) प्राप्ति का बोध कराने वाले कर्म तत्पुरुष
इस प्रकार के शब्दों में दूसरा पद सामान्यतः “प्राप्त”, “गत”, “लाभ” आदि होता है। पहला पद उस वस्तु या स्थान का बोध कराता है जिसे प्राप्त किया जा रहा है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | कर्म (को) | अर्थ |
|---|---|---|---|
| स्वर्गप्राप्त | स्वर्ग को प्राप्त | स्वर्ग | जिसने स्वर्ग प्राप्त किया |
| सिद्धिप्राप्त | सिद्धि को प्राप्त | सिद्धि | जिसने सिद्धि प्राप्त की |
| यशप्राप्त | यश को प्राप्त | यश | जिसने यश पाया |
| सम्मानप्राप्त | सम्मान को प्राप्त | सम्मान | जिसे सम्मान मिला |
| पुरस्कारप्राप्त | पुरस्कार को प्राप्त | पुरस्कार | जिसे पुरस्कार मिला |
इन उदाहरणों को समझें
इन सभी शब्दों में प्राप्ति की क्रिया किसी वस्तु या उपलब्धि की ओर निर्देशित है। यदि “को” जोड़कर विग्रह किया जाए, तो अर्थ सहज रूप से स्पष्ट हो जाता है—
- स्वर्ग को प्राप्त
- यश को प्राप्त
- सम्मान को प्राप्त
अतः इन सभी में कर्म कारक की विभक्ति “को” लुप्त हुई है।
(ख) किसी वस्तु पर क्रिया करने वाले शब्द
इस समूह में दूसरा पद किसी कार्य (क्रिया) को व्यक्त करता है और पहला पद उस वस्तु का बोध कराता है जिस पर वह कार्य किया जा रहा है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | कर्म | अर्थ |
|---|---|---|---|
| माखनचोर | माखन को चुराने वाला | माखन | माखन चुराने वाला |
| बसचालक | बस को चलाने वाला | बस | बस चलाने वाला |
| गगनचुम्बी | गगन को चूमने वाला | गगन | बहुत ऊँचा |
| शत्रुघ्न | शत्रु को मारने वाला | शत्रु | शत्रुओं का विनाश करने वाला |
| ग्रामविजयी | ग्राम को जीतने वाला | ग्राम | गाँव पर विजय प्राप्त करने वाला |
इन उदाहरणों का विश्लेषण
इन सभी उदाहरणों में पहला पद क्रिया का लक्ष्य है।
- क्या चलाया जा रहा है? → बस
- क्या चुराया जा रहा है? → माखन
- किसे चूमा जा रहा है? → गगन
अर्थात् क्रिया सीधे पहले पद पर घटित हो रही है। इसलिए यह कर्म तत्पुरुष समास है।
(ग) “प्रिय” वाले कर्म तत्पुरुष
“प्रिय” वाले शब्द परीक्षा में विशेष रूप से पूछे जाते हैं। इनकी पहचान करते समय यह देखना चाहिए कि कौन किसे प्रिय है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | कर्म | अर्थ |
|---|---|---|---|
| जनप्रिय | जनता को प्रिय | जनता | जो जनता को प्रिय हो |
| सर्वप्रिय | सभी को प्रिय | सभी | जो सबको प्रिय हो |
| प्राणप्रिय | प्राणों को प्रिय | प्राण | अत्यंत प्रिय |
| लोकप्रिय | लोक को प्रिय | लोक | जो समाज में प्रिय हो |
इन उदाहरणों का विश्लेषण
यहाँ “प्रिय” विशेषण अवश्य है, लेकिन उसका संबंध कर्म कारक से बन रहा है।
उदाहरण—
जनप्रिय
↓
जनता को प्रिय
यहाँ “प्रिय” होने का संबंध जनता से है और “जनता” कर्म का कार्य कर रही है। इसलिए यह कर्म तत्पुरुष समास है।
(घ) धार्मिक एवं साहित्यिक प्रयोगों में मिलने वाले उदाहरण
संस्कृत तथा हिन्दी साहित्य में अनेक कर्म तत्पुरुष समास ऐसे मिलते हैं जो आज भी प्रचलित हैं।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | समास |
|---|---|---|
| वेदज्ञ | वेद को जानने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| शास्त्रज्ञ | शास्त्र को जानने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| आत्मज्ञ | आत्मा को जानने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| तत्त्वज्ञ | तत्त्व को जानने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| धर्मपाल | धर्म को पालन करने वाला | कर्म तत्पुरुष |
इन शब्दों में “जानना” अथवा “पालन करना” जैसी क्रियाएँ पहले पद को लक्ष्य बनाती हैं। इसलिए इनका संबंध भी कर्म कारक से है।
परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण उदाहरण
कुछ शब्द ऐसे हैं जो विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं। इनका अभ्यास अवश्य करना चाहिए।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह |
|---|---|
| बसचालक | बस को चलाने वाला |
| गगनचुम्बी | गगन को चूमने वाला |
| माखनचोर | माखन को चुराने वाला |
| स्वर्गप्राप्त | स्वर्ग को प्राप्त |
| सिद्धिप्राप्त | सिद्धि को प्राप्त |
| यशप्राप्त | यश को प्राप्त |
| जनप्रिय | जनता को प्रिय |
| प्राणप्रिय | प्राणों को प्रिय |
| वेदज्ञ | वेद को जानने वाला |
| शास्त्रज्ञ | शास्त्र को जानने वाला |
इन उदाहरणों का बार-बार अभ्यास करने से कर्म तत्पुरुष समास की पहचान सहज हो जाती है।
इन उदाहरणों का तुलनात्मक विश्लेषण
अब तक दिए गए सभी उदाहरणों का यदि एक साथ अध्ययन किया जाए, तो एक समान व्याकरणिक नियम दिखाई देता है।
| सामासिक शब्द | कौन-सी क्रिया है? | पहला पद क्या है? | “को” लग रहा है? | समास |
|---|---|---|---|---|
| बसचालक | चलाना | बस | ✔ | कर्म तत्पुरुष |
| माखनचोर | चुराना | माखन | ✔ | कर्म तत्पुरुष |
| गगनचुम्बी | चूमना | गगन | ✔ | कर्म तत्पुरुष |
| स्वर्गप्राप्त | प्राप्त करना | स्वर्ग | ✔ | कर्म तत्पुरुष |
| जनप्रिय | प्रिय होना | जनता | ✔ | कर्म तत्पुरुष |
| वेदज्ञ | जानना | वेद | ✔ | कर्म तत्पुरुष |
यदि किसी सामासिक शब्द में पहला पद किसी क्रिया का लक्ष्य बन रहा हो और उसके साथ सहज रूप से “को” लगाया जा सके, तो वह सामान्यतः कर्म तत्पुरुष समास होगा।
अभ्यास करते समय किन बातों का ध्यान रखें?
कर्म तत्पुरुष समास की पहचान करते समय केवल शब्द देखकर उत्तर देना उचित नहीं है। पहले उसका समास-विग्रह करें, फिर देखें कि क्या दोनों पदों के बीच “को” लगाया जा सकता है। यदि “को” लगाने पर अर्थ स्वाभाविक और पूर्ण बनता है, तो वह कर्म तत्पुरुष होने की प्रबल संभावना है।
साथ ही यह भी ध्यान रखें कि कुछ शब्द देखने में समान प्रतीत होते हैं, लेकिन उनमें “को” के स्थान पर “से”, “का”, “के लिए” या “में” मिलता है। ऐसे शब्द कर्म तत्पुरुष नहीं, बल्कि तत्पुरुष के अन्य उपभेदों में आते हैं।
इसी कारण अगले भाग में हम कर्म तत्पुरुष समास और करण, सम्बन्ध तथा सम्प्रदान तत्पुरुष के बीच का अंतर विस्तार से समझेंगे। यही तुलनात्मक अध्ययन उन सभी सामान्य भ्रमों को दूर करेगा जिनके कारण विद्यार्थी अक्सर सही उत्तर जानते हुए भी गलत विकल्प चुन लेते हैं।
कर्म तत्पुरुष समास और अन्य तत्पुरुष भेदों में अंतर
अब तक आपने कर्म तत्पुरुष समास की परिभाषा, संरचना, पहचान तथा अनेक उदाहरणों का विस्तार से अध्ययन किया। अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—यदि किसी सामासिक शब्द में दो पदों के बीच कोई विभक्ति लुप्त हुई है, तो यह कैसे निश्चित किया जाए कि वह कर्म तत्पुरुष है, करण तत्पुरुष नहीं? या फिर सम्बन्ध तत्पुरुष अथवा सम्प्रदान तत्पुरुष क्यों नहीं?
यही वह स्थान है जहाँ अधिकांश विद्यार्थी भ्रमित हो जाते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि उन्हें परिभाषाएँ याद नहीं होतीं, बल्कि वे कारक के अर्थ (Sense of Case) को समझे बिना केवल शब्द देखकर उत्तर देने का प्रयास करते हैं।
वास्तव में तत्पुरुष समास के सभी उपभेदों में केवल एक बात बदलती है—दोनों पदों के बीच का संबंध। यदि यह संबंध सही पहचान लिया जाए, तो समास का प्रकार भी स्वतः स्पष्ट हो जाता है।
इसी उद्देश्य से इस भाग में कर्म तत्पुरुष की तुलना अन्य प्रमुख तत्पुरुष भेदों से की जा रही है।
कर्म तत्पुरुष और करण तत्पुरुष में अंतर
यह सबसे सामान्य भ्रम है, क्योंकि दोनों में क्रिया का संबंध दिखाई देता है। अंतर केवल इतना है कि कर्म तत्पुरुष में क्रिया किस पर हो रही है, जबकि करण तत्पुरुष में क्रिया किसके द्वारा या किस साधन से सम्पन्न हो रही है।
नीचे दी गई सारणी इस अंतर को स्पष्ट करती है—
| आधार | कर्म तत्पुरुष | करण तत्पुरुष |
|---|---|---|
| लुप्त विभक्ति | को | से / के द्वारा |
| पहला पद | क्रिया का लक्ष्य (कर्म) | क्रिया का साधन या माध्यम |
| मुख्य प्रश्न | किसको? | किससे? / किसके द्वारा? |
| उदाहरण | बसचालक | हस्तलिखित |
| विग्रह | बस को चलाने वाला | हाथ से लिखित |
उदाहरण द्वारा तुलना
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | समास |
|---|---|---|
| बसचालक | बस को चलाने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| माखनचोर | माखन को चुराने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित | करण तत्पुरुष |
| रेखांकित | रेखा द्वारा अंकित | करण तत्पुरुष |
यदि पहला पद क्रिया का लक्ष्य है तो कर्म तत्पुरुष होगा, और यदि वही पद साधन है तो करण तत्पुरुष होगा।
कर्म तत्पुरुष और सम्प्रदान तत्पुरुष में अंतर
इन दोनों में भी कई बार भ्रम होता है, क्योंकि दोनों में कोई उद्देश्य या संबंध दिखाई देता है। लेकिन इनके अर्थ बिल्कुल अलग होते हैं। कर्म तत्पुरुष में क्रिया किसी वस्तु को लक्षित करती है, जबकि सम्प्रदान तत्पुरुष में कोई वस्तु या स्थान किसी उद्देश्य या किसी के लिए होता है।
| आधार | कर्म तत्पुरुष | सम्प्रदान तत्पुरुष |
|---|---|---|
| लुप्त विभक्ति | को | के लिए |
| संबंध | क्रिया का लक्ष्य | उद्देश्य या प्रयोजन |
| मुख्य प्रश्न | किसको? | किसके लिए? |
| उदाहरण | स्वर्गप्राप्त | विद्यालय |
उदाहरण द्वारा तुलना
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | समास |
|---|---|---|
| सिद्धिप्राप्त | सिद्धि को प्राप्त | कर्म तत्पुरुष |
| जनप्रिय | जनता को प्रिय | कर्म तत्पुरुष |
| विद्यालय | विद्या के लिए आलय | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| रसोईघर | रसोई के लिए घर | सम्प्रदान तत्पुरुष |
यदि विग्रह में “के लिए” स्वाभाविक रूप से आता है, तो वह सम्प्रदान तत्पुरुष होगा।
कर्म तत्पुरुष और सम्बन्ध तत्पुरुष में अंतर
यह अंतर समझना भी अत्यंत आवश्यक है। सम्बन्ध तत्पुरुष में दो पदों के बीच स्वामित्व अथवा संबंध व्यक्त होता है, जबकि कर्म तत्पुरुष में क्रिया का लक्ष्य व्यक्त होता है।
| आधार | कर्म तत्पुरुष | सम्बन्ध तत्पुरुष |
|---|---|---|
| लुप्त विभक्ति | को | का / की / के |
| संबंध | क्रिया का कर्म | स्वामित्व या संबंध |
| मुख्य प्रश्न | किसको? | किसका? |
| उदाहरण | माखनचोर | राजपुत्र |
उदाहरण द्वारा तुलना
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | समास |
|---|---|---|
| माखनचोर | माखन को चुराने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| बसचालक | बस को चलाने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| राजपुत्र | राजा का पुत्र | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| गृहस्वामी | गृह का स्वामी | सम्बन्ध तत्पुरुष |
यहाँ स्पष्ट दिखाई देता है कि सम्बन्ध तत्पुरुष में कोई क्रिया नहीं, बल्कि केवल संबंध व्यक्त हो रहा है।
एक साथ तुलना
अब तक पढ़े गए तीनों अंतरों को एक ही सारणी में देखने से विषय और अधिक स्पष्ट हो जाता है।
| समास | लुप्त विभक्ति | पहला पद क्या बताता है? | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| कर्म तत्पुरुष | को | क्रिया का लक्ष्य | माखनचोर |
| करण तत्पुरुष | से / द्वारा | साधन | हस्तलिखित |
| सम्प्रदान तत्पुरुष | के लिए | उद्देश्य | विद्यालय |
| सम्बन्ध तत्पुरुष | का / की / के | संबंध | राजपुत्र |
यदि विद्यार्थी इस सारणी को समझ ले, तो तत्पुरुष समास के अधिकांश प्रश्न बिना किसी कठिनाई के हल किए जा सकते हैं।
पहचान करते समय होने वाली सामान्य गलतियाँ
अभ्यास के दौरान कुछ विशेष प्रकार की त्रुटियाँ बार-बार देखने को मिलती हैं। इन्हें पहले से समझ लेना आवश्यक है।
| सामान्य गलती | सही विश्लेषण |
|---|---|
| “हस्तलिखित” को कर्म तत्पुरुष मान लेना | हाथ से लिखित → करण तत्पुरुष |
| “विद्यालय” को कर्म तत्पुरुष समझ लेना | विद्या के लिए आलय → सम्प्रदान तत्पुरुष |
| “राजपुत्र” को कर्म तत्पुरुष मान लेना | राजा का पुत्र → सम्बन्ध तत्पुरुष |
| केवल दूसरा पद देखकर उत्तर देना | पहले समास-विग्रह करें, फिर कारक पहचानें। |
| “को” और “के लिए” में अंतर न करना | पहले संबंध समझें, फिर समास निर्धारित करें। |
इन त्रुटियों से बचने का सबसे सरल उपाय है—हर शब्द का समास-विग्रह अवश्य करें।
कर्म तत्पुरुष पहचानने की अंतिम जाँच
यदि किसी सामासिक शब्द के बारे में अभी भी संदेह हो, तो निम्न प्रश्न क्रम से पूछें—
| स्वयं से पूछें | यदि उत्तर “हाँ” है |
|---|---|
| क्या समास-विग्रह में “को” आता है? | आगे बढ़िए |
| क्या पहला पद किसी क्रिया का लक्ष्य है? | आगे बढ़िए |
| क्या दूसरा पद क्रिया या क्रियावाचक अर्थ दे रहा है? | आगे बढ़िए |
| क्या “का”, “से”, “के लिए”, “में” लगाने पर अर्थ बदल जाता है? | तब यह कर्म तत्पुरुष होगा |
यह जाँच-पद्धति विशेष रूप से वस्तुनिष्ठ प्रश्नों और समास पहचानने वाले अभ्यास में अत्यंत प्रभावी सिद्ध होती है।
करण तत्पुरुष समास
कर्म तत्पुरुष समास के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि तत्पुरुष समास के प्रत्येक उपभेद की पहचान उसके समास-विग्रह में प्रयुक्त कारक के आधार पर की जाती है। अब हम तत्पुरुष समास के दूसरे महत्वपूर्ण भेद करण तत्पुरुष समास का अध्ययन करेंगे।
यह समास विद्यार्थियों के लिए इसलिए विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि इसमें प्रयुक्त “से” शब्द के कारण इसका भ्रम अक्सर अपादान तत्पुरुष से हो जाता है। कई बार दोनों में “से” दिखाई देता है, लेकिन दोनों का अर्थ और व्याकरणिक संबंध पूरी तरह अलग होता है। इसलिए करण तत्पुरुष को समझते समय केवल विभक्ति नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे अर्थ (Semantic Relation) को भी समझना आवश्यक है।
हिन्दी साहित्य, प्रशासनिक भाषा, समाचार-पत्रों तथा दैनिक प्रयोग में हस्तलिखित, रेखांकित, स्वरचित, तुलसीकृत, मदांध, शोकग्रस्त, कष्टसाध्य जैसे अनेक शब्द मिलते हैं। ये सभी करण तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण हैं। यदि इनकी संरचना समझ ली जाए, तो इस प्रकार के अधिकांश सामासिक शब्दों की पहचान सहज हो जाती है।
करण तत्पुरुष समास की परिभाषा
जिस तत्पुरुष समास में दोनों पदों के बीच करण कारक की विभक्ति “से” अथवा “के द्वारा” का लोप हो जाता है, उसे करण तत्पुरुष समास कहते हैं।
अर्थात् यदि समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “से” या “के द्वारा” प्राप्त हो और पहला पद किसी कार्य को सम्पन्न करने वाले साधन, माध्यम या कर्ता का बोध कराए, तो वह करण तत्पुरुष समास कहलाता है।
इसे सरल भाषा में इस प्रकार समझा जा सकता है—
जहाँ कोई कार्य किसी साधन, माध्यम या कर्ता के द्वारा सम्पन्न हो और समास बनने पर “से” अथवा “के द्वारा” का लोप हो जाए, वहाँ करण तत्पुरुष समास होता है।
करण कारक क्या होता है?
करण तत्पुरुष समास को समझने से पहले करण कारक की अवधारणा स्पष्ट होना आवश्यक है।
व्याकरण में जिस साधन, माध्यम या उपकरण की सहायता से कोई कार्य सम्पन्न होता है, उसे करण कारक कहा जाता है।
उदाहरण के लिए—
- विद्यार्थी कलम से लिखता है।
- बढ़ई आरी से लकड़ी काटता है।
- चित्रकार ब्रश से चित्र बनाता है।
- लेखक कंप्यूटर से लेख तैयार करता है।
इन सभी वाक्यों में कार्य तो अलग-अलग हैं, लेकिन कार्य को सम्पन्न करने वाला माध्यम या साधन एक विशेष भूमिका निभा रहा है। यही करण कारक का मूल सिद्धांत है।
इसी सिद्धांत पर करण तत्पुरुष समास का निर्माण होता है।
करण तत्पुरुष समास का मूल सिद्धांत
करण तत्पुरुष समास में पहला पद यह बताता है कि कोई कार्य किसके द्वारा या किस साधन से किया गया है। दूसरा पद उस कार्य या उसकी अवस्था को व्यक्त करता है।
उदाहरण—
हस्तलिखित
↓
हाथ से लिखित
यहाँ “लिखित” कार्य है और “हाथ” वह साधन है जिससे लिखने का कार्य सम्पन्न हुआ।
इसी प्रकार—
रेखांकित
↓
रेखा द्वारा अंकित
यहाँ “रेखा” अंकन का माध्यम है।
इसी कारण दोनों शब्द करण तत्पुरुष समास कहलाते हैं।
करण तत्पुरुष समास की पहचान
करण तत्पुरुष समास की पहचान करने के लिए किसी भी सामासिक शब्द का पहले समास-विग्रह करना चाहिए। यदि विग्रह करते समय दोनों पदों के बीच “से” अथवा “के द्वारा” सहज रूप से लगाया जा सके और अर्थ स्वाभाविक लगे, तो वह करण तत्पुरुष समास होगा।
नीचे दिए गए उदाहरणों को ध्यानपूर्वक देखें—
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | करण (साधन) |
|---|---|---|
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित | हाथ |
| रेखांकित | रेखा द्वारा अंकित | रेखा |
| स्वरचित | स्वयं द्वारा रचित | स्वयं |
| तुलसीकृत | तुलसी द्वारा कृत | तुलसी |
| मदांध | मद से अंध | मद |
| शोकग्रस्त | शोक से ग्रस्त | शोक |
| कष्टसाध्य | कष्ट से साध्य | कष्ट |
इन सभी उदाहरणों में पहला पद कार्य का साधन, कारण या माध्यम है।
करण तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ
करण तत्पुरुष समास को सही ढंग से समझने के लिए उसकी प्रमुख विशेषताओं को जानना आवश्यक है। यही विशेषताएँ आगे चलकर पहचान का आधार बनती हैं।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| यह तत्पुरुष समास का उपभेद है। | उत्तरपद प्रधान रहता है। |
| “से” या “के द्वारा” का लोप होता है। | समास-विग्रह में स्पष्ट दिखाई देता है। |
| पहला पद साधन, माध्यम या कर्ता होता है। | उसी से कार्य सम्पन्न होता है। |
| दूसरा पद कार्य, अवस्था या परिणाम का बोध कराता है। | जैसे—लिखित, अंकित, ग्रस्त, अंध। |
| अर्थ में साधन या माध्यम की भूमिका स्पष्ट रहती है। | यही इसकी पहचान है। |
यदि इन विशेषताओं को ध्यान में रखा जाए, तो करण तत्पुरुष समास की पहचान सहज हो जाती है।
करण तत्पुरुष समास की संरचना
इस समास का निर्माण भी अन्य तत्पुरुष समासों की भाँति दो पदों के मेल से होता है। अंतर केवल इतना है कि यहाँ दोनों पदों के बीच करण कारक की विभक्ति लुप्त होती है।
इसे निम्न सारणी द्वारा समझा जा सकता है—
| मूल वाक्यांश | लुप्त विभक्ति | समस्त पद |
|---|---|---|
| हाथ से लिखित | से | हस्तलिखित |
| रेखा द्वारा अंकित | द्वारा | रेखांकित |
| स्वयं द्वारा रचित | द्वारा | स्वरचित |
| तुलसी द्वारा कृत | द्वारा | तुलसीकृत |
| मद से अंध | से | मदांध |
| शोक से ग्रस्त | से | शोकग्रस्त |
| कष्ट से साध्य | से | कष्टसाध्य |
यदि इन सभी उदाहरणों को एक साथ देखा जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि समस्त पद बनने पर केवल विभक्ति का लोप हुआ है, अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं आया।
उत्तरपद की प्रधानता यहाँ भी क्यों रहती है?
जैसा कि सभी तत्पुरुष समासों में होता है, करण तत्पुरुष में भी उत्तरपद (दूसरा पद) ही प्रधान होता है।
उदाहरण—
हस्तलिखित
↓
हाथ से लिखित
यहाँ मुख्य अर्थ “लिखित” शब्द से बन रहा है। “हाथ” केवल यह बता रहा है कि लिखने का कार्य किस साधन से सम्पन्न हुआ।
इसी प्रकार—
शोकग्रस्त
↓
शोक से ग्रस्त
मुख्य अर्थ “ग्रस्त” है, जबकि “शोक” केवल उसकी अवस्था का कारण बता रहा है।
इस प्रकार उत्तरपद ही पूरे शब्द का मुख्य अर्थ देता है।
करण तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण (विस्तृत विश्लेषण)
किसी भी समास को वास्तविक रूप से समझने का सर्वोत्तम माध्यम उसके उदाहरण होते हैं। परिभाषा हमें केवल नियम बताती है, जबकि उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि वह नियम व्यवहार में किस प्रकार लागू होता है। यही कारण है कि प्रतियोगी परीक्षाओं, विद्यालयी प्रश्नपत्रों तथा उच्च शिक्षा में समास की पहचान करते समय केवल परिभाषा नहीं, बल्कि उदाहरणों का विश्लेषण अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
करण तत्पुरुष समास के साथ भी यही बात लागू होती है। यदि विद्यार्थी केवल “हस्तलिखित” और “रेखांकित” जैसे दो उदाहरण याद कर ले, तो नए शब्दों की पहचान करना कठिन हो सकता है। लेकिन यदि वह यह समझ ले कि किसी कार्य के सम्पन्न होने में साधन, माध्यम, कारण अथवा कर्ता की क्या भूमिका है, तो वह पहले कभी न देखे गए शब्द का भी सही समास निर्धारित कर सकता है।
इसी उद्देश्य से नीचे करण तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरणों को अलग-अलग श्रेणियों में व्यवस्थित किया गया है।
(क) “से” (साधन) का बोध कराने वाले उदाहरण
इस प्रकार के शब्दों में पहला पद उस साधन का बोध कराता है जिसकी सहायता से कोई कार्य सम्पन्न होता है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | साधन (करण) | अर्थ |
|---|---|---|---|
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित | हाथ | हाथ से लिखा गया |
| मदांध | मद से अंध | मद | घमण्ड के कारण अंधा |
| शोकग्रस्त | शोक से ग्रस्त | शोक | शोक से पीड़ित |
| कष्टसाध्य | कष्ट से साध्य | कष्ट | कठिन परिश्रम से पूरा होने वाला |
| श्रमसाध्य | श्रम से साध्य | श्रम | अधिक श्रम से सम्पन्न होने वाला |
| परिश्रमसिद्ध | परिश्रम से सिद्ध | परिश्रम | परिश्रम द्वारा प्राप्त |
इन उदाहरणों को समझें
यदि इन सभी शब्दों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए, तो एक समान व्याकरणिक संबंध दिखाई देता है। प्रत्येक शब्द में पहला पद यह बता रहा है कि कार्य किस साधन या कारण से सम्पन्न हुआ।
उदाहरण के लिए—
- हाथ से लिखा गया → हस्तलिखित
- शोक से ग्रस्त → शोकग्रस्त
- कष्ट से साध्य → कष्टसाध्य
यहाँ “से” केवल विभक्ति नहीं है, बल्कि कार्य के साधन या कारण का बोध करा रहा है।
(ख) “के द्वारा” बनने वाले करण तत्पुरुष
कुछ शब्दों में “से” के स्थान पर “के द्वारा” अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। ऐसे शब्दों में पहला पद कार्य करने वाले व्यक्ति या माध्यम का बोध कराता है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | कर्ता / माध्यम |
|---|---|---|
| स्वरचित | स्वयं द्वारा रचित | स्वयं |
| तुलसीकृत | तुलसी द्वारा कृत | तुलसी |
| वाल्मीकिरचित | वाल्मीकि द्वारा रचित | वाल्मीकि |
| वेदविहित | वेद द्वारा विहित | वेद |
| शासननिर्दिष्ट | शासन द्वारा निर्दिष्ट | शासन |
इन उदाहरणों का विश्लेषण
इन सभी शब्दों में कोई कार्य किसी व्यक्ति, ग्रंथ या संस्था द्वारा सम्पन्न हुआ है।
उदाहरण—
स्वरचित
↓
स्वयं द्वारा रचित
यहाँ रचना करने वाला स्वयं व्यक्ति है।
इसी प्रकार—
तुलसीकृत
↓
तुलसी द्वारा कृत
यहाँ “तुलसी” कार्य करने वाले कर्ता के रूप में प्रयुक्त हुए हैं। इसलिए ऐसे शब्द करण तत्पुरुष समास के अंतर्गत आते हैं।
(ग) “अंकित”, “लिखित”, “निर्मित” प्रकार के शब्द
सरकारी परीक्षाओं में इस प्रकार के शब्द अत्यधिक पूछे जाते हैं क्योंकि इनका निर्माण एक ही व्याकरणिक नियम से होता है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | समास |
|---|---|---|
| रेखांकित | रेखा द्वारा अंकित | करण तत्पुरुष |
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित | करण तत्पुरुष |
| मुद्रित | मुद्रण से लिखित / छपा हुआ | करण तत्पुरुष |
| मशीननिर्मित | मशीन से निर्मित | करण तत्पुरुष |
| हस्तनिर्मित | हाथ से निर्मित | करण तत्पुरुष |
इन सभी शब्दों में दूसरा पद कार्य का परिणाम बताता है, जबकि पहला पद उस कार्य के साधन या माध्यम का।
(घ) मानसिक एवं भावात्मक अवस्था व्यक्त करने वाले उदाहरण
करण तत्पुरुष केवल भौतिक साधनों तक सीमित नहीं है। कई बार पहला पद किसी मानसिक, भावनात्मक अथवा आंतरिक कारण का भी बोध कराता है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | कारण |
|---|---|---|
| शोकग्रस्त | शोक से ग्रस्त | शोक |
| मदांध | मद से अंध | मद |
| भयाकुल | भय से आकुल | भय |
| क्रोधाग्नि | क्रोध से उत्पन्न अग्नि | क्रोध |
| प्रेमविह्वल | प्रेम से विह्वल | प्रेम |
इन उदाहरणों में “से” किसी उपकरण का नहीं, बल्कि भाव या मानसिक स्थिति का कारण बता रहा है। फिर भी व्याकरण की दृष्टि से यह करण कारक ही माना जाता है।
परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण उदाहरण
कुछ सामासिक शब्द ऐसे हैं जो वर्षों से विभिन्न परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते रहे हैं। इनका समास-विग्रह और समास का प्रकार अच्छी तरह याद होना चाहिए।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह |
|---|---|
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित |
| रेखांकित | रेखा द्वारा अंकित |
| स्वरचित | स्वयं द्वारा रचित |
| तुलसीकृत | तुलसी द्वारा कृत |
| मदांध | मद से अंध |
| शोकग्रस्त | शोक से ग्रस्त |
| कष्टसाध्य | कष्ट से साध्य |
| श्रमसाध्य | श्रम से साध्य |
| हस्तनिर्मित | हाथ से निर्मित |
| मशीननिर्मित | मशीन से निर्मित |
इन शब्दों का नियमित अभ्यास करने से करण तत्पुरुष समास से संबंधित अधिकांश प्रश्न सहजता से हल किए जा सकते हैं।
इन उदाहरणों का तुलनात्मक विश्लेषण
अब तक दिए गए सभी उदाहरणों का यदि एक साथ विश्लेषण किया जाए, तो एक निश्चित व्याकरणिक पैटर्न स्पष्ट दिखाई देता है।
| सामासिक शब्द | कार्य क्या है? | पहला पद क्या बता रहा है? | “से / द्वारा” लग रहा है? | समास |
|---|---|---|---|---|
| हस्तलिखित | लिखना | साधन | ✔ | करण तत्पुरुष |
| रेखांकित | अंकित करना | माध्यम | ✔ | करण तत्पुरुष |
| स्वरचित | रचना करना | कर्ता | ✔ | करण तत्पुरुष |
| शोकग्रस्त | ग्रस्त होना | कारण | ✔ | करण तत्पुरुष |
| कष्टसाध्य | साध्य होना | साधन / कारण | ✔ | करण तत्पुरुष |
| मशीननिर्मित | निर्माण करना | साधन | ✔ | करण तत्पुरुष |
इस सारणी से स्पष्ट होता है कि करण तत्पुरुष में पहला पद हमेशा किसी-न-किसी रूप में कार्य के साधन, माध्यम, कारण अथवा कर्ता का बोध कराता है।
करण तत्पुरुष समास की पहचान करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
करण तत्पुरुष की पहचान करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि विग्रह में “से” आ रहा है। सबसे पहले यह समझना चाहिए कि “से” का अर्थ क्या है।
यदि “से” का अर्थ साधन, माध्यम, उपकरण, कर्ता या कारण है, तो वह करण तत्पुरुष होगा। लेकिन यदि वही “से” अलग होने, दूर होने, मुक्त होने या वियोग का भाव व्यक्त करता है, तो वह करण नहीं, बल्कि अपादान तत्पुरुष होगा।
इसी कारण समास की पहचान करते समय शब्द नहीं, बल्कि उसके अर्थ का विश्लेषण करना अधिक आवश्यक है। यही कारण है कि अगले भाग में हम करण तत्पुरुष और अपादान तत्पुरुष के बीच का विस्तृत अंतर समझेंगे। यह तुलना उन सभी सामान्य भ्रमों को समाप्त कर देगी जो समास पहचानने में सबसे अधिक त्रुटियों का कारण बनते हैं।
करण तत्पुरुष समास और अपादान तत्पुरुष समास में अंतर
तत्पुरुष समास के विभिन्न भेदों का अध्ययन करते समय विद्यार्थियों को जिस विषय में सबसे अधिक भ्रम होता है, वह करण तत्पुरुष और अपादान तत्पुरुष का अंतर है। इसका मुख्य कारण यह है कि दोनों ही समासों के समास-विग्रह में “से” शब्द प्राप्त होता है। यदि केवल विभक्ति को देखकर निर्णय लिया जाए, तो दोनों समान प्रतीत होते हैं।
किन्तु व्याकरण में समास की पहचान केवल विभक्ति के आधार पर नहीं की जाती, बल्कि विभक्ति के अर्थ (Semantic Function) के आधार पर की जाती है। यही कारण है कि जहाँ एक ओर करण तत्पुरुष में “से” का अर्थ साधन, माध्यम, कारण अथवा कर्ता होता है, वहीं दूसरी ओर अपादान तत्पुरुष में “से” का अर्थ अलग होना, दूर होना, मुक्त होना, हटना या वियोग होता है।
यदि इस मूल अंतर को समझ लिया जाए, तो इन दोनों समासों में कभी भ्रम नहीं होगा।
सबसे पहले “से” का अर्थ समझिए
दोनों समासों में “से” शब्द अवश्य आता है, लेकिन उसका कार्य अलग-अलग होता है।
करण तत्पुरुष में “से” यह बताता है कि कोई कार्य किस साधन या माध्यम से सम्पन्न हुआ।
उदाहरण—
हस्तलिखित
↓
हाथ से लिखित
यहाँ हाथ लिखने का साधन है।
दूसरी ओर—
पथभ्रष्ट
↓
पथ से भ्रष्ट
यहाँ व्यक्ति पथ से अलग हो गया है। हाथ की तरह पथ कोई साधन नहीं है, बल्कि अलग होने का आधार है।
यही दोनों समासों का मूल अंतर है।
करण और अपादान का मूल सिद्धांत
नीचे दी गई सारणी इस अंतर को अत्यंत स्पष्ट रूप से समझाती है—
| आधार | करण तत्पुरुष | अपादान तत्पुरुष |
|---|---|---|
| लुप्त विभक्ति | से / के द्वारा | से |
| “से” का अर्थ | साधन, माध्यम, कारण | अलग होना, दूर होना, मुक्त होना |
| पहला पद | कार्य सम्पन्न करने वाला साधन | जिससे अलग हुआ गया |
| संबंध | कार्य का माध्यम | वियोग या पृथक्करण |
| उदाहरण | हस्तलिखित | पथभ्रष्ट |
यदि केवल इस सारणी का अर्थ समझ लिया जाए, तो दोनों समासों की पहचान अत्यंत सरल हो जाती है।
उदाहरणों द्वारा अंतर समझें
अब कुछ ऐसे उदाहरणों को साथ-साथ देखते हैं जिनमें दोनों समास स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देते हैं।
| करण तत्पुरुष | समास-विग्रह | अपादान तत्पुरुष | समास-विग्रह |
|---|---|---|---|
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित | पथभ्रष्ट | पथ से भ्रष्ट |
| रेखांकित | रेखा द्वारा अंकित | ऋणमुक्त | ऋण से मुक्त |
| शोकग्रस्त | शोक से ग्रस्त | भयमुक्त | भय से मुक्त |
| कष्टसाध्य | कष्ट से साध्य | देशनिकाला | देश से निकाला |
| स्वरचित | स्वयं द्वारा रचित | जन्मांध | जन्म से अंध |
यदि इन उदाहरणों का ध्यानपूर्वक विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि करण में पहला पद कार्य को सम्पन्न करा रहा है, जबकि अपादान में वही पद किसी वियोग या मुक्ति का आधार बन रहा है।
“हस्तलिखित” और “पथभ्रष्ट” का विश्लेषण
इन दोनों शब्दों को विद्यार्थी अक्सर साथ में पढ़ते हैं, इसलिए इन्हें विस्तार से समझना आवश्यक है।
1. हस्तलिखित
समास-विग्रह—
हाथ से लिखित
यहाँ हाथ लिखने का साधन है। यदि हाथ न हो, तो लिखने की क्रिया उसी रूप में सम्भव नहीं होगी।
अतः—
- हाथ = साधन
- “से” = करण कारक
- समास = करण तत्पुरुष
2. पथभ्रष्ट
समास-विग्रह—
पथ से भ्रष्ट
यहाँ पथ कोई साधन नहीं है। इसका अर्थ है—सही मार्ग से हट जाना।
अतः—
- पथ = जिससे अलग हुआ
- “से” = अपादान कारक
- समास = अपादान तत्पुरुष
यही सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।
किन शब्दों में करण होगा और किनमें अपादान?
नीचे दी गई सारणी पहचान को और सरल बना देती है—
| यदि अर्थ यह हो… | समास |
|---|---|
| किसी साधन से कार्य हुआ | करण तत्पुरुष |
| किसी माध्यम द्वारा कार्य हुआ | करण तत्पुरुष |
| किसी कारण से अवस्था उत्पन्न हुई | करण तत्पुरुष |
| किसी वस्तु से अलग हुआ | अपादान तत्पुरुष |
| किसी बंधन से मुक्त हुआ | अपादान तत्पुरुष |
| किसी स्थान से दूर हुआ | अपादान तत्पुरुष |
इस प्रकार अर्थ का विश्लेषण ही सही समास तक पहुँचने का सबसे विश्वसनीय माध्यम है।
विद्यार्थी सबसे अधिक कहाँ गलती करते हैं?
अभ्यास के दौरान कुछ सामान्य त्रुटियाँ बार-बार देखने को मिलती हैं। यदि इन पर पहले से ध्यान दिया जाए, तो अधिकांश गलतियाँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
| सामान्य गलती | सही विश्लेषण |
|---|---|
| “से” देखकर सीधे करण तत्पुरुष मान लेना | पहले देखें “से” साधन है या अलग होने का भाव। |
| “पथभ्रष्ट” को करण तत्पुरुष लिख देना | यहाँ पथ साधन नहीं, बल्कि जिससे अलग हुआ है। |
| “शोकग्रस्त” को अपादान समझ लेना | शोक कारण है, इसलिए करण तत्पुरुष। |
| “ऋणमुक्त” को करण समझ लेना | यहाँ ऋण से मुक्ति मिली है, इसलिए अपादान तत्पुरुष। |
| केवल विभक्ति देखकर उत्तर देना | विभक्ति का अर्थ समझना आवश्यक है। |
एक साथ सभी प्रमुख उदाहरण
नीचे करण और अपादान दोनों के महत्वपूर्ण उदाहरण एक साथ दिए जा रहे हैं, जिससे दोनों की तुलना तुरंत की जा सके।
| करण तत्पुरुष | अपादान तत्पुरुष |
|---|---|
| हस्तलिखित | पथभ्रष्ट |
| रेखांकित | ऋणमुक्त |
| स्वरचित | भयमुक्त |
| शोकग्रस्त | देशनिकाला |
| मदांध | जन्मांध |
| कष्टसाध्य | रणविमुख |
| श्रमसाध्य | गृहत्यागी |
इन उदाहरणों को साथ-साथ पढ़ने से दोनों समासों के बीच का अंतर लंबे समय तक स्मरण रहता है।
पहचान की अंतिम जाँच
यदि किसी शब्द को देखकर अभी भी संदेह हो, तो निम्न क्रम अपनाइए—
| स्वयं से पूछें | यदि उत्तर “हाँ” है | समास |
|---|---|---|
| क्या पहला पद कार्य का साधन या माध्यम है? | ✔ | करण तत्पुरुष |
| क्या पहला पद कार्य का कारण है? | ✔ | करण तत्पुरुष |
| क्या पहला पद किसी वियोग या अलगाव का आधार है? | ✔ | अपादान तत्पुरुष |
| क्या “से” हटने, मुक्त होने या दूर होने का भाव दे रहा है? | ✔ | अपादान तत्पुरुष |
यह छोटी-सी जाँच अधिकांश वस्तुनिष्ठ तथा वर्णनात्मक प्रश्नों में सही उत्तर तक पहुँचने में सहायता करती है
सम्बन्ध तत्पुरुष समास के प्रमुख उदाहरण (विस्तृत विश्लेषण)
सम्बन्ध तत्पुरुष समास की परिभाषा, संरचना तथा पहचान को समझ लेने के बाद अब उसके उदाहरणों का विस्तार से अध्ययन करना आवश्यक है। व्याकरण में केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं होता कि समास-विग्रह में “का”, “की” या “के” आता है, बल्कि यह भी समझना आवश्यक है कि दोनों पदों के बीच किस प्रकार का संबंध स्थापित हो रहा है।
सम्बन्ध तत्पुरुष समास का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें केवल स्वामित्व का ही संबंध नहीं होता, बल्कि पारिवारिक संबंध, स्थान संबंध, अधिकार संबंध, निवास संबंध, वस्तु संबंध, अंग संबंध तथा पहचान संबंध भी सम्मिलित होते हैं। यही कारण है कि हिन्दी भाषा में प्रयुक्त सामासिक शब्दों का एक बड़ा भाग इसी श्रेणी में आता है।
आइए अब विभिन्न प्रकार के उदाहरणों के माध्यम से इसे विस्तार से समझते हैं।
(क) पारिवारिक संबंध बताने वाले उदाहरण
इस प्रकार के शब्दों में पहला पद किसी व्यक्ति का परिचय देता है और दूसरा पद उसके पारिवारिक संबंध को व्यक्त करता है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | संबंध |
|---|---|---|
| राजपुत्र | राजा का पुत्र | पिता-पुत्र संबंध |
| राजकुमारी | राजा की पुत्री | पिता-पुत्री संबंध |
| देवपुत्र | देव का पुत्र | पारिवारिक संबंध |
| भरतपुत्र | भरत का पुत्र | वंश संबंध |
| दशरथनन्दन | दशरथ का नन्दन | पिता-पुत्र संबंध |
इन उदाहरणों को समझें
इन सभी शब्दों में पहला पद दूसरे पद का परिचय देता है।
उदाहरण—
- राजा का पुत्र → राजपुत्र
- राजा की पुत्री → राजकुमारी
- दशरथ का नन्दन → दशरथनन्दन
यहाँ किसी उद्देश्य या साधन का बोध नहीं हो रहा, बल्कि केवल संबंध व्यक्त हो रहा है।
(ख) स्वामित्व या अधिकार बताने वाले उदाहरण
इस प्रकार के शब्दों में पहला पद यह बताता है कि किसी वस्तु या स्थान पर किसका अधिकार या स्वामित्व है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | संबंध |
|---|---|---|
| गृहस्वामी | गृह का स्वामी | स्वामित्व |
| धनपति | धन का पति (स्वामी) | स्वामित्व |
| ग्रामप्रधान | ग्राम का प्रधान | प्रशासनिक संबंध |
| सेनापति | सेना का पति (प्रधान) | अधिकार |
| कुलपति | कुल का पति (प्रधान) | प्रशासनिक संबंध |
इन उदाहरणों का विश्लेषण
यहाँ दूसरा पद किसी पद, अधिकार या स्वामित्व का बोध कराता है।
उदाहरण—
- गृह का स्वामी
- सेना का प्रधान
- ग्राम का प्रधान
इन सभी में “का” का संबंध पूर्णतः स्पष्ट दिखाई देता है।
(ग) स्थान या निवास संबंध बताने वाले उदाहरण
कुछ सम्बन्ध तत्पुरुष समास ऐसे होते हैं जिनमें पहला पद किसी स्थान का बोध कराता है और दूसरा पद उस स्थान से संबंधित व्यक्ति या वस्तु का।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | संबंध |
|---|---|---|
| देशवासी | देश का वासी | निवास |
| नगरवासी | नगर का वासी | निवास |
| ग्रामवासी | ग्राम का वासी | निवास |
| वनवासी | वन का वासी | निवास |
| पर्वतवासी | पर्वत का वासी | निवास |
इन उदाहरणों को समझें
इन सभी शब्दों में पहला पद निवास स्थान का परिचय देता है।
उदाहरण—
- देश का वासी
- नगर का वासी
- वन का वासी
यहाँ निवास का संबंध व्यक्त किया गया है।
(घ) वस्तु अथवा स्थान का संबंध बताने वाले उदाहरण
इस प्रकार के शब्दों में पहला पद किसी वस्तु या स्थान का परिचय देता है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | संबंध |
|---|---|---|
| जलपात्र | जल का पात्र | वस्तु संबंध |
| देवालय | देव का आलय | स्थान संबंध |
| हिमालय | हिम का आलय | स्थान संबंध |
| पुस्तकप्रेमी | पुस्तकों का प्रेमी | रुचि संबंध |
| धर्मपाल | धर्म का पालक | संबंध |
इन उदाहरणों का विश्लेषण
यदि इन शब्दों को ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि पहला पद दूसरे पद का केवल संबंध स्पष्ट कर रहा है।
उदाहरण—
- जल का पात्र
- देव का आलय
- हिम का आलय
इनमें कहीं भी “के लिए” अथवा “से” का संबंध नहीं है।
परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण उदाहरण
कुछ सम्बन्ध तत्पुरुष समास ऐसे हैं जो विभिन्न परीक्षाओं में नियमित रूप से पूछे जाते हैं। इनका समास-विग्रह और समास का प्रकार अच्छी तरह याद होना चाहिए।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह |
|---|---|
| राजपुत्र | राजा का पुत्र |
| गृहस्वामी | गृह का स्वामी |
| देवालय | देव का आलय |
| हिमालय | हिम का आलय |
| ग्रामप्रधान | ग्राम का प्रधान |
| देशवासी | देश का वासी |
| नगरवासी | नगर का वासी |
| जलपात्र | जल का पात्र |
| पुस्तकप्रेमी | पुस्तकों का प्रेमी |
| सेनापति | सेना का प्रधान |
इन शब्दों का नियमित अभ्यास सम्बन्ध तत्पुरुष समास की पहचान को अत्यंत सुदृढ़ बनाता है।
इन उदाहरणों का तुलनात्मक विश्लेषण
अब तक दिए गए सभी उदाहरणों का यदि एक साथ अध्ययन किया जाए, तो सम्बन्ध तत्पुरुष की मूल संरचना स्पष्ट दिखाई देती है।
| सामासिक शब्द | दूसरा पद क्या है? | पहला पद क्या बता रहा है? | “का / की / के” लग रहा है? | समास |
|---|---|---|---|---|
| राजपुत्र | पुत्र | संबंध | ✔ | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| गृहस्वामी | स्वामी | स्वामित्व | ✔ | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| देशवासी | वासी | निवास संबंध | ✔ | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| देवालय | आलय | स्थान संबंध | ✔ | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| जलपात्र | पात्र | वस्तु संबंध | ✔ | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| पुस्तकप्रेमी | प्रेमी | रुचि संबंध | ✔ | सम्बन्ध तत्पुरुष |
यदि इस सारणी को ध्यानपूर्वक समझ लिया जाए, तो सम्बन्ध तत्पुरुष की पहचान अत्यंत सरल हो जाती है।
सम्बन्ध तत्पुरुष की पहचान करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
सम्बन्ध तत्पुरुष की पहचान करते समय सबसे पहले समास-विग्रह करना चाहिए। यदि दोनों पदों के बीच “का”, “की” या “के” लगाने पर अर्थ पूर्णतः स्वाभाविक बनता है और पहला पद दूसरे पद के साथ किसी प्रकार का संबंध, स्वामित्व, अधिकार, स्थान या पहचान व्यक्त करता है, तो वह सम्बन्ध तत्पुरुष समास होगा।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कुछ शब्दों में “के लिए” और “का” दोनों लगाने का भ्रम हो सकता है। ऐसी स्थिति में हमेशा यह देखिए कि पहला पद उद्देश्य बता रहा है या संबंध। यदि उद्देश्य है तो सम्प्रदान तत्पुरुष होगा, और यदि संबंध है तो सम्बन्ध तत्पुरुष। यही सूक्ष्म अंतर इन दोनों समासों की सही पहचान का सबसे विश्वसनीय आधार है।
अधिकरण तत्पुरुष समास
अब तक हम तत्पुरुष समास के चार प्रमुख भेदों—कर्म, करण, सम्प्रदान और सम्बन्ध तत्पुरुष—का विस्तार से अध्ययन कर चुके हैं। प्रत्येक भेद की पहचान उसके समास-विग्रह में प्रयुक्त कारक के आधार पर की जाती है। अब हम तत्पुरुष समास के पाँचवें महत्वपूर्ण भेद अधिकरण तत्पुरुष समास को समझेंगे।
अधिकरण तत्पुरुष समास का संबंध मुख्यतः स्थान, आधार या स्थिति से होता है। जब कोई व्यक्ति, वस्तु या अवस्था किसी स्थान में, किसी वस्तु पर अथवा किसी आधार पर स्थित होती है, तब अधिकरण कारक का प्रयोग होता है। समास बनने पर इसी कारक की विभक्ति का लोप हो जाता है।
दैनिक जीवन और साहित्य में जलमग्न, वनवास, शरणागत, गृहप्रवेश, आसनस्थ, रणभूमिस्थ, सिंहासनारूढ़ जैसे अनेक शब्द इसी समास के उदाहरण हैं। इन शब्दों का अर्थ तभी स्पष्ट होता है जब इनके भीतर छिपे “में” या “पर” के संबंध को समझा जाए।
अधिकरण तत्पुरुष समास की परिभाषा
जिस तत्पुरुष समास में दोनों पदों के बीच अधिकरण कारक की विभक्ति “में” अथवा “पर” का लोप हो जाता है, उसे अधिकरण तत्पुरुष समास कहते हैं।
अर्थात् यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “में” या “पर” प्राप्त हो, तो वह अधिकरण तत्पुरुष समास कहलाता है।
इसे सरल शब्दों में इस प्रकार भी समझा जा सकता है—
जहाँ कोई व्यक्ति, वस्तु या अवस्था किसी स्थान, आधार या स्थिति में अथवा उस पर स्थित हो और समास बनने पर “में” या “पर” का लोप हो जाए, वहाँ अधिकरण तत्पुरुष समास होता है।
अधिकरण कारक क्या होता है?
अधिकरण तत्पुरुष समास को सही ढंग से समझने के लिए पहले अधिकरण कारक की अवधारणा स्पष्ट होना आवश्यक है।
व्याकरण में जिस स्थान, आधार या स्थिति में कोई कार्य घटित होता है अथवा जहाँ कोई व्यक्ति या वस्तु स्थित होती है, वहाँ अधिकरण कारक होता है।
उदाहरण—
- पक्षी पेड़ पर बैठा है।
- नाव जल में तैर रही है।
- विद्यार्थी कक्षा में बैठा है।
- सैनिक रणभूमि में डटा हुआ है।
- साधु आसन पर बैठा है।
इन सभी वाक्यों में “में” और “पर” स्थान या आधार का बोध करा रहे हैं। यही अधिकरण कारक का मूल आधार है।
अधिकरण तत्पुरुष समास का मूल सिद्धांत
अधिकरण तत्पुरुष समास में पहला पद सामान्यतः किसी स्थान, आधार या स्थिति का बोध कराता है, जबकि दूसरा पद यह बताता है कि उस स्थान में या उस पर क्या स्थिति उत्पन्न हुई है।
उदाहरण—
जलमग्न
↓
जल में मग्न
यहाँ “जल” वह स्थान है जिसमें कोई वस्तु डूबी हुई है।
इसी प्रकार—
शरणागत
↓
शरण में आगत
यहाँ व्यक्ति शरण में आया है।
दोनों ही उदाहरणों में “में” का संबंध स्पष्ट दिखाई देता है।
अधिकरण तत्पुरुष समास की पहचान
यदि किसी सामासिक शब्द का समास-विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच “में” या “पर” सहज रूप से लगाया जा सके और अर्थ पूर्णतः स्वाभाविक लगे, तो वह अधिकरण तत्पुरुष समास होगा।
नीचे दिए गए उदाहरणों को ध्यानपूर्वक देखें—
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | अधिकरण (स्थान / आधार) |
|---|---|---|
| जलमग्न | जल में मग्न | जल |
| शरणागत | शरण में आगत | शरण |
| आसनस्थ | आसन पर स्थित | आसन |
| गृहप्रवेश | गृह में प्रवेश | गृह |
| सिंहासनारूढ़ | सिंहासन पर आरूढ़ | सिंहासन |
| रणभूमिस्थ | रणभूमि में स्थित | रणभूमि |
इन सभी उदाहरणों में पहला पद किसी स्थान या आधार का बोध कराता है।
अधिकरण तत्पुरुष समास की प्रमुख विशेषताएँ
अधिकरण तत्पुरुष समास को सही प्रकार से पहचानने के लिए उसकी प्रमुख विशेषताओं को समझना आवश्यक है।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| यह तत्पुरुष समास का एक उपभेद है। | उत्तरपद प्रधान रहता है। |
| “में” या “पर” का लोप होता है। | समास-विग्रह में स्पष्ट दिखाई देता है। |
| पहला पद स्थान, आधार या स्थिति का बोध कराता है। | उसी में या उसी पर कार्य घटित होता है। |
| दूसरा पद अवस्था, क्रिया या स्थिति का बोध कराता है। | जैसे—मग्न, आगत, स्थित, प्रवेश, आरूढ़। |
| समस्त पद किसी स्थान या आधार से जुड़ी स्थिति व्यक्त करता है। | यही इसकी मुख्य पहचान है। |
इन विशेषताओं को ध्यान में रखकर अधिकरण तत्पुरुष समास की पहचान आसानी से की जा सकती है।
अधिकरण तत्पुरुष समास की संरचना
अन्य तत्पुरुष समासों की तरह अधिकरण तत्पुरुष समास का निर्माण भी दो पदों के मेल से होता है। अंतर केवल इतना है कि यहाँ दोनों पदों के बीच “में” अथवा “पर” का लोप होता है।
| मूल वाक्यांश | लुप्त विभक्ति | समस्त पद |
|---|---|---|
| जल में मग्न | में | जलमग्न |
| शरण में आगत | में | शरणागत |
| गृह में प्रवेश | में | गृहप्रवेश |
| आसन पर स्थित | पर | आसनस्थ |
| सिंहासन पर आरूढ़ | पर | सिंहासनारूढ़ |
| रणभूमि में स्थित | में | रणभूमिस्थ |
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि समस्त पद बनने पर केवल अधिकरण कारक की विभक्ति हटती है, जबकि दोनों पदों के बीच स्थान या आधार का संबंध बना रहता है।
उत्तरपद की प्रधानता अधिकरण तत्पुरुष में कैसे दिखाई देती है?
अधिकरण तत्पुरुष में भी उत्तरपद ही मुख्य अर्थ प्रदान करता है।
उदाहरण—
जलमग्न
↓
जल में मग्न
यहाँ मुख्य अर्थ “मग्न” शब्द से बन रहा है। “जल” केवल यह बता रहा है कि मग्न होने की स्थिति कहाँ उत्पन्न हुई है।
इसी प्रकार—
आसनस्थ
↓
आसन पर स्थित
यहाँ मुख्य अर्थ “स्थित” (स्थ) है, जबकि “आसन” केवल स्थान का बोध कराता है।
इस प्रकार अन्य तत्पुरुष समासों की तरह अधिकरण तत्पुरुष में भी उत्तरपद ही प्रधान रहता है।
अधिकरण तत्पुरुष समास को समझने का मूल सूत्र
यदि इस पूरे समास को एक सरल नियम में याद रखना हो, तो निम्न सूत्र सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होता है—
जहाँ समास-विग्रह करते समय “में” या “पर” स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो और पहला पद किसी स्थान, आधार या स्थिति का बोध कराए, वहाँ अधिकरण तत्पुरुष समास होता है।
अधिकरण तत्पुरुष समास और करण तत्पुरुष समास में अंतर
अधिकरण तत्पुरुष समास का अध्ययन करने के बाद अब उसका करण तत्पुरुष समास से अंतर समझना आवश्यक है। इन दोनों समासों में भ्रम अपेक्षाकृत कम होता है, फिर भी परीक्षा में ऐसे शब्द दिए जाते हैं जिनमें विद्यार्थी केवल “में”, “पर” अथवा “से” देखकर उत्तर लिख देते हैं। यही कारण है कि कई बार सही अवधारणा होने के बावजूद उत्तर गलत हो जाता है।
वास्तव में इन दोनों समासों का अंतर केवल विभक्ति का नहीं, बल्कि अर्थ (Semantic Relation) का है। करण तत्पुरुष में पहला पद किसी कार्य के साधन, माध्यम, कारण या कर्ता का बोध कराता है, जबकि अधिकरण तत्पुरुष में पहला पद उस स्थान, आधार या स्थिति का बोध कराता है जहाँ कोई कार्य घटित होता है या कोई वस्तु स्थित होती है।
यदि इस मूल अंतर को समझ लिया जाए, तो दोनों समासों की पहचान अत्यंत सरल हो जाती है।
सबसे पहले “से” और “में / पर” का अंतर समझिए
करण तत्पुरुष में समास-विग्रह करने पर सामान्यतः “से” अथवा “के द्वारा” प्राप्त होता है।
उदाहरण—
हस्तलिखित
↓
हाथ से लिखित
यहाँ हाथ लिखने का साधन है।
इसके विपरीत अधिकरण तत्पुरुष में समास-विग्रह करने पर “में” अथवा “पर” प्राप्त होता है।
उदाहरण—
जलमग्न
↓
जल में मग्न
यहाँ जल कोई साधन नहीं है, बल्कि वह स्थान है जहाँ मग्न होने की स्थिति उत्पन्न हुई है।
यही दोनों समासों का सबसे मूलभूत अंतर है।
करण और अधिकरण का मूल सिद्धांत
नीचे दी गई सारणी दोनों समासों के बीच का अंतर स्पष्ट करती है—
| आधार | करण तत्पुरुष | अधिकरण तत्पुरुष |
|---|---|---|
| लुप्त विभक्ति | से / के द्वारा | में / पर |
| पहला पद क्या बताता है? | साधन, माध्यम, कारण | स्थान, आधार, स्थिति |
| मुख्य प्रश्न | किससे? / किसके द्वारा? | कहाँ? / किसमें? / किस पर? |
| संबंध का प्रकार | कार्य सम्पन्न करने वाला माध्यम | कार्य या स्थिति का स्थान |
| उदाहरण | हस्तलिखित | जलमग्न |
यदि इस सारणी को ध्यानपूर्वक समझ लिया जाए, तो दोनों समासों के बीच का अंतर सहज रूप से स्पष्ट हो जाता है।
उदाहरणों द्वारा अंतर समझें
अब दोनों समासों के प्रमुख उदाहरणों को साथ-साथ देखकर अंतर समझते हैं।
| करण तत्पुरुष | समास-विग्रह | अधिकरण तत्पुरुष | समास-विग्रह |
|---|---|---|---|
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित | जलमग्न | जल में मग्न |
| रेखांकित | रेखा द्वारा अंकित | शरणागत | शरण में आगत |
| स्वरचित | स्वयं द्वारा रचित | गृहप्रवेश | गृह में प्रवेश |
| शोकग्रस्त | शोक से ग्रस्त | वनवास | वन में वास |
| हस्तनिर्मित | हाथ से निर्मित | आसनस्थ | आसन पर स्थित |
यदि इन उदाहरणों का विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि करण में पहला पद कार्य सम्पन्न करने वाला माध्यम है, जबकि अधिकरण में वही पद स्थान या आधार का बोध कराता है।
“हस्तलिखित” और “जलमग्न” का विश्लेषण
इन दोनों शब्दों को विस्तार से समझने से करण और अधिकरण का अंतर पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है।
हस्तलिखित
समास-विग्रह—
हाथ से लिखित
यहाँ हाथ लिखने का साधन है।
अतः—
- हाथ = साधन
- “से” = करण कारक
- समास = करण तत्पुरुष
जलमग्न
समास-विग्रह—
जल में मग्न
यहाँ जल वह स्थान है जहाँ कोई वस्तु डूबी हुई है।
अतः—
- जल = स्थान
- “में” = अधिकरण कारक
- समास = अधिकरण तत्पुरुष
दोनों शब्दों में पहला पद अलग-अलग प्रकार का संबंध स्थापित कर रहा है, इसलिए दोनों समास भी अलग हैं।
पहचान का सबसे सरल नियम
किसी भी सामासिक शब्द को देखकर निम्न प्रश्न पूछिए—
- क्या पहला पद किसी कार्य का साधन है?
- या पहला पद किसी स्थान या आधार का बोध करा रहा है?
यदि उत्तर “साधन” है, तो वह करण तत्पुरुष होगा।
यदि उत्तर “स्थान या आधार” है, तो वह अधिकरण तत्पुरुष होगा।
उदाहरण—
- हाथ से लिखित ✔ → करण तत्पुरुष
- मशीन से निर्मित ✔ → करण तत्पुरुष
लेकिन—
- जल में मग्न ✔ → अधिकरण तत्पुरुष
- आसन पर स्थित ✔ → अधिकरण तत्पुरुष
सामान्य गलतियाँ
अभ्यास के दौरान विद्यार्थी प्रायः निम्न त्रुटियाँ करते हैं—
| सामान्य गलती | सही विश्लेषण |
|---|---|
| जलमग्न को करण तत्पुरुष मान लेना | जल में मग्न → अधिकरण तत्पुरुष |
| आसनस्थ में “से” जोड़ देना | सही विग्रह: आसन पर स्थित |
| शोकग्रस्त को अधिकरण समझ लेना | शोक से ग्रस्त → करण तत्पुरुष |
| हस्तलिखित को अधिकरण लिख देना | हाथ से लिखित → करण तत्पुरुष |
| केवल शब्द देखकर उत्तर देना | पहले समास-विग्रह करें, फिर कारक पहचानें। |
एक साथ तुलना
नीचे दी गई सारणी दोनों समासों का त्वरित पुनरावलोकन कराती है—
| समास | लुप्त विभक्ति | पहला पद क्या बताता है? | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| करण तत्पुरुष | से / द्वारा | साधन, माध्यम | हस्तलिखित |
| अधिकरण तत्पुरुष | में / पर | स्थान, आधार | जलमग्न |
| करण तत्पुरुष | से / द्वारा | कारण | शोकग्रस्त |
| अधिकरण तत्पुरुष | में / पर | निवास या स्थिति | वनवास |
| करण तत्पुरुष | से / द्वारा | उपकरण | मशीननिर्मित |
| अधिकरण तत्पुरुष | में / पर | आधार | आसनस्थ |
पहचान की अंतिम जाँच
यदि किसी सामासिक शब्द के बारे में संदेह हो, तो निम्न क्रम अपनाइए—
| स्वयं से पूछें | यदि उत्तर “हाँ” है | समास |
|---|---|---|
| क्या पहला पद कार्य का साधन या माध्यम है? | ✔ | करण तत्पुरुष |
| क्या “से” या “द्वारा” लगाने पर अर्थ स्पष्ट होता है? | ✔ | करण तत्पुरुष |
| क्या पहला पद स्थान या आधार का बोध कराता है? | ✔ | अधिकरण तत्पुरुष |
| क्या “में” या “पर” लगाने पर अर्थ स्वाभाविक बनता है? | ✔ | अधिकरण तत्पुरुष |
इस प्रकार यदि पहले समास-विग्रह किया जाए और फिर कारक के अर्थ को समझा जाए, तो करण तथा अधिकरण तत्पुरुष के बीच कभी भ्रम नहीं होगा। यही पद्धति समास-विश्लेषण, वस्तुनिष्ठ प्रश्नों तथा वर्णनात्मक उत्तरों में सबसे अधिक उपयोगी और विश्वसनीय मानी जाती है।
अब तक हमने तत्पुरुष समास के सभी प्रमुख भेदों—कर्म, करण, सम्प्रदान, सम्बन्ध, अधिकरण और अपादान—का विस्तार से अध्ययन किया। प्रत्येक भेद की परिभाषा, पहचान, समास-विग्रह, उदाहरण तथा अन्य भेदों से उसका अंतर भी समझ लिया।
अब आवश्यकता है कि इन सभी भेदों को एक साथ देखा जाए, ताकि उनके बीच का अंतर और अधिक स्पष्ट हो सके। प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जिनमें एक ही प्रश्न में विभिन्न प्रकार के तत्पुरुष समास दिए जाते हैं और सही भेद चुनना होता है। ऐसे प्रश्नों को हल करने के लिए केवल परिभाषाएँ याद होना पर्याप्त नहीं है; सभी भेदों की तुलनात्मक समझ भी आवश्यक होती है।
तत्पुरुष समास के सभी भेद एक साथ
नीचे दी गई सारणी तत्पुरुष समास के सभी प्रमुख भेदों का संक्षिप्त एवं व्यवस्थित पुनरावलोकन प्रस्तुत करती है।
| तत्पुरुष का भेद | लुप्त विभक्ति | मुख्य प्रश्न | पहला पद क्या बताता है? | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|
| कर्म तत्पुरुष | को | किसको? | क्रिया का लक्ष्य (कर्म) | स्वर्गप्राप्त |
| करण तत्पुरुष | से / द्वारा | किससे? | साधन, माध्यम, कारण | हस्तलिखित |
| सम्प्रदान तत्पुरुष | के लिए | किसके लिए? | उद्देश्य या प्रयोजन | विद्यालय |
| सम्बन्ध तत्पुरुष | का / की / के | किसका? | संबंध या स्वामित्व | राजपुत्र |
| अधिकरण तत्पुरुष | में / पर | कहाँ? | स्थान या आधार | जलमग्न |
| अपादान तत्पुरुष | से | किससे अलग? | वियोग, दूरी, मुक्ति | ऋणमुक्त |
यदि इस सारणी को ध्यानपूर्वक समझ लिया जाए, तो अधिकांश समासों की पहचान कुछ ही क्षणों में की जा सकती है।
एक ही शब्द देखकर तत्पुरुष समास कैसे पहचानें?
परीक्षा में सामान्यतः केवल सामासिक शब्द दिया जाता है। वहाँ समास-विग्रह नहीं दिया जाता। इसलिए सबसे पहले स्वयं समास-विग्रह करना चाहिए और फिर यह देखना चाहिए कि दोनों पदों के बीच कौन-सा कारक स्वाभाविक रूप से आ रहा है।
नीचे दिया गया क्रम इस कार्य को सरल बनाता है—
| यदि समास-विग्रह में… | तो समास होगा… |
|---|---|
| को | कर्म तत्पुरुष |
| से / द्वारा (साधन) | करण तत्पुरुष |
| के लिए | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| का / की / के | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| में / पर | अधिकरण तत्पुरुष |
| से (अलगाव / मुक्ति) | अपादान तत्पुरुष |
यही सबसे सरल और सबसे विश्वसनीय पहचान-पद्धति मानी जाती है।
सबसे अधिक भ्रम किन तत्पुरुष समास के किन भेदों में होता है?
तत्पुरुष समास पढ़ते समय कुछ भेद ऐसे हैं जिनमें विद्यार्थी सबसे अधिक भ्रमित होते हैं। इसका कारण यह है कि उनके समास-विग्रह में प्रयुक्त विभक्तियाँ देखने में समान लगती हैं, जबकि उनका अर्थ अलग होता है।
| भ्रमित करने वाले भेद | भ्रम का कारण | सही पहचान |
|---|---|---|
| करण × अपादान | दोनों में “से” आता है | अर्थ देखें—साधन है या अलगाव |
| सम्प्रदान × सम्बन्ध | “के लिए” और “का” में भ्रम | उद्देश्य है या संबंध |
| कर्म × करण | क्रिया दोनों में होती है | क्रिया का लक्ष्य है या साधन |
| करण × अधिकरण | “से” और “में/पर” का भ्रम | साधन है या स्थान |
| सम्बन्ध × सम्प्रदान | दोनों में दो संज्ञाएँ होती हैं | संबंध है या प्रयोजन |
यदि इन पाँच अंतरों को अच्छी तरह समझ लिया जाए, तो तत्पुरुष समास से जुड़े अधिकांश प्रश्न बिना किसी कठिनाई के हल किए जा सकते हैं।
सभी भेदों के प्रतिनिधि उदाहरण
अब प्रत्येक भेद का एक प्रमुख उदाहरण एक साथ देखते हैं—
| समास | समास-विग्रह | भेद |
|---|---|---|
| स्वर्गप्राप्त | स्वर्ग को प्राप्त | कर्म तत्पुरुष |
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित | करण तत्पुरुष |
| विद्यालय | विद्या के लिए आलय | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| राजपुत्र | राजा का पुत्र | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| जलमग्न | जल में मग्न | अधिकरण तत्पुरुष |
| ऋणमुक्त | ऋण से मुक्त | अपादान तत्पुरुष |
यदि इन छह उदाहरणों का अर्थ स्पष्ट हो जाए, तो पूरे तत्पुरुष समास का आधार समझ में आ जाता है।
एक मिनट में पूरा तत्पुरुष समास याद करें
यदि परीक्षा से ठीक पहले पूरे अध्याय का त्वरित पुनरावलोकन करना हो, तो केवल यह सारणी याद रखिए—
| समास | याद रखने वाला शब्द | मुख्य संकेत |
|---|---|---|
| कर्म | को | क्रिया का लक्ष्य |
| करण | से | साधन / माध्यम |
| सम्प्रदान | के लिए | उद्देश्य |
| सम्बन्ध | का | संबंध / स्वामित्व |
| अधिकरण | में / पर | स्थान / आधार |
| अपादान | से | अलगाव / मुक्ति |
यह सारणी पूरे अध्याय का सबसे संक्षिप्त और प्रभावी पुनरावलोकन है। अधिकांश विद्यार्थी इसी सारणी की सहायता से परीक्षा से पहले कुछ ही मिनटों में सम्पूर्ण तत्पुरुष समास दोहरा लेते हैं।
तत्पुरुष समास पर आधारित अभ्यास
अब तक आपने तत्पुरुष समास के सभी छह भेदों—कर्म, करण, सम्प्रदान, सम्बन्ध, अधिकरण तथा अपादान—का विस्तार से अध्ययन किया। किसी भी व्याकरणिक विषय में वास्तविक दक्षता केवल सिद्धांत पढ़ने से नहीं आती, बल्कि उसके नियमित अभ्यास से विकसित होती है। यही कारण है कि प्रतियोगी परीक्षाओं तथा विद्यालयी परीक्षाओं में समास से संबंधित प्रश्न विभिन्न रूपों में पूछे जाते हैं।
इस अभ्यास खंड का उद्देश्य केवल उत्तर याद कराना नहीं है, बल्कि समास-विग्रह करने, कारक की पहचान करने तथा सही समास-भेद निर्धारित करने की क्षमता विकसित करना है। इसलिए प्रत्येक प्रश्न को हल करते समय पहले स्वयं समास-विग्रह करने का प्रयास करें और उसके बाद ही उत्तर देखें।
अभ्यास – 1
निम्नलिखित सामासिक शब्दों का समास-विग्रह तथा तत्पुरुष समास का भेद लिखिए।
| क्रम | सामासिक शब्द | समास-विग्रह | समास का भेद |
|---|---|---|---|
| 1 | स्वर्गप्राप्त | स्वर्ग को प्राप्त | कर्म तत्पुरुष |
| 2 | हस्तलिखित | हाथ से लिखित | करण तत्पुरुष |
| 3 | विद्यालय | विद्या के लिए आलय | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| 4 | राजपुत्र | राजा का पुत्र | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| 5 | जलमग्न | जल में मग्न | अधिकरण तत्पुरुष |
| 6 | ऋणमुक्त | ऋण से मुक्त | अपादान तत्पुरुष |
| 7 | बसचालक | बस को चलाने वाला | कर्म तत्पुरुष |
| 8 | शोकग्रस्त | शोक से ग्रस्त | करण तत्पुरुष |
| 9 | रसोईघर | रसोई के लिए घर | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| 10 | गृहस्वामी | गृह का स्वामी | सम्बन्ध तत्पुरुष |
अभ्यास – 2
सही विकल्प चुनिए।
1. “माखनचोर” किस समास का उदाहरण है?
(A) करण तत्पुरुष
(B) कर्म तत्पुरुष
(C) सम्बन्ध तत्पुरुष
(D) अपादान तत्पुरुष
उत्तर: (B)
2. “हस्तनिर्मित” में कौन-सी विभक्ति लुप्त है?
(A) को
(B) से
(C) के लिए
(D) में
उत्तर: (B)
3. “वनवास” किस समास का उदाहरण है?
(A) सम्बन्ध तत्पुरुष
(B) अधिकरण तत्पुरुष
(C) कर्म तत्पुरुष
(D) सम्प्रदान तत्पुरुष
उत्तर: (B)
4. “गृहत्यागी” किस समास का उदाहरण है?
(A) करण तत्पुरुष
(B) सम्बन्ध तत्पुरुष
(C) अपादान तत्पुरुष
(D) अधिकरण तत्पुरुष
उत्तर: (C)
5. “विद्यालय” में कौन-सी विभक्ति का लोप हुआ है?
(A) का
(B) में
(C) के लिए
(D) से
उत्तर: (C)
अभ्यास – 3
रिक्त स्थान भरिए।
- जिस तत्पुरुष समास में “को” का लोप होता है, उसे __________ कहते हैं।
- जिस तत्पुरुष समास में “के लिए” का लोप होता है, उसे __________ कहते हैं।
- “राजा का पुत्र” का सामासिक रूप __________ है।
- “जल में मग्न” का सामासिक रूप __________ है।
- “ऋण से मुक्त” का सामासिक रूप __________ है।
उत्तर
- कर्म तत्पुरुष
- सम्प्रदान तत्पुरुष
- राजपुत्र
- जलमग्न
- ऋणमुक्त
अभ्यास – 4
निम्नलिखित तत्पुरुष समासों का प्रकार पहचानिए।
| सामासिक शब्द | समास का प्रकार |
|---|---|
| जनप्रिय | __________ |
| रेखांकित | __________ |
| सभाभवन | __________ |
| देशवासी | __________ |
| आसनस्थ | __________ |
| पथभ्रष्ट | __________ |
| स्वरचित | __________ |
| सत्याग्रह | __________ |
| सिंहासनारूढ़ | __________ |
| भयमुक्त | __________ |
उत्तर
| सामासिक शब्द | समास |
|---|---|
| जनप्रिय | कर्म तत्पुरुष |
| रेखांकित | करण तत्पुरुष |
| सभाभवन | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| देशवासी | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| आसनस्थ | अधिकरण तत्पुरुष |
| पथभ्रष्ट | अपादान तत्पुरुष |
| स्वरचित | करण तत्पुरुष |
| सत्याग्रह | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| सिंहासनारूढ़ | अधिकरण तत्पुरुष |
| भयमुक्त | अपादान तत्पुरुष |
अभ्यास – 5
निम्नलिखित का मिलान कीजिए।
| स्तम्भ – A | स्तम्भ – B |
|---|---|
| (A) कर्म तत्पुरुष | (1) में / पर |
| (B) करण तत्पुरुष | (2) का / की / के |
| (C) सम्प्रदान तत्पुरुष | (3) को |
| (D) सम्बन्ध तत्पुरुष | (4) के लिए |
| (E) अधिकरण तत्पुरुष | (5) से / द्वारा |
| (F) अपादान तत्पुरुष | (6) से (अलगाव) |
उत्तर
| समास | सही मिलान |
|---|---|
| कर्म तत्पुरुष | (3) |
| करण तत्पुरुष | (5) |
| सम्प्रदान तत्पुरुष | (4) |
| सम्बन्ध तत्पुरुष | (2) |
| अधिकरण तत्पुरुष | (1) |
| अपादान तत्पुरुष | (6) |
अभ्यास – 6 (उच्च स्तर)
निम्नलिखित सामासिक शब्दों का समास-विग्रह कीजिए तथा बताइए कि इनमें कौन-सी विभक्ति का लोप हुआ है।
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | लुप्त विभक्ति | समास |
|---|---|---|---|
| शास्त्रज्ञ | शास्त्र को जानने वाला | को | कर्म तत्पुरुष |
| मदांध | मद से अंध | से | करण तत्पुरुष |
| व्यायामशाला | व्यायाम के लिए शाला | के लिए | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| ग्रामप्रधान | ग्राम का प्रधान | का | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| गृहप्रवेश | गृह में प्रवेश | में | अधिकरण तत्पुरुष |
| पदच्युत | पद से च्युत | से | अपादान तत्पुरुष |
तत्पुरुष समास में होने वाली सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)
तत्पुरुष समास का सिद्धांत पढ़ लेने के बाद भी अनेक विद्यार्थी प्रश्न हल करते समय छोटी-छोटी गलतियाँ कर बैठते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वे शब्द देखकर उत्तर देने का प्रयास करते हैं, जबकि समास की सही पहचान हमेशा समास-विग्रह और कारक-संबंध के आधार पर की जाती है।
यदि नीचे दी गई गलतियों से बचा जाए, तो तत्पुरुष समास से जुड़े अधिकांश प्रश्न बिना किसी कठिनाई के हल किए जा सकते हैं।
1. केवल शब्द देखकर समास का प्रकार तय कर देना
यह सबसे सामान्य और सबसे बड़ी गलती है।
उदाहरण के लिए—
हस्तलिखित देखकर कई विद्यार्थी तुरंत करण तत्पुरुष लिख देते हैं, जबकि कुछ विद्यार्थी केवल “लिखित” देखकर कर्म तत्पुरुष मान लेते हैं।
सही तरीका यह है कि पहले समास-विग्रह किया जाए—
हाथ से लिखित
अब स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ “से” साधन का बोध करा रहा है, इसलिए यह करण तत्पुरुष है।
2. समास-विग्रह किए बिना उत्तर लिख देना
समास-विग्रह पूरे अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यदि विग्रह सही होगा, तो समास का प्रकार भी सही होगा।
उदाहरण—
राजपुत्र
यदि कोई विद्यार्थी सीधे सम्बन्ध तत्पुरुष लिख देता है, तो वह केवल याददाश्त के आधार पर उत्तर दे रहा है।
लेकिन यदि वह पहले विग्रह करेगा—
राजा का पुत्र
तो सम्बन्ध कारक स्वयं स्पष्ट हो जाएगा।
3. “से” देखकर हमेशा करण तत्पुरुष मान लेना
यह प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे अधिक होने वाली गलती है।
“से” दो अलग-अलग समासों में मिलता है—
- करण तत्पुरुष
- अपादान तत्पुरुष
लेकिन दोनों का अर्थ अलग होता है।
| शब्द | सही समास | कारण |
|---|---|---|
| हस्तलिखित | करण तत्पुरुष | हाथ साधन है। |
| शोकग्रस्त | करण तत्पुरुष | शोक कारण है। |
| ऋणमुक्त | अपादान तत्पुरुष | ऋण से मुक्ति मिली है। |
| पथभ्रष्ट | अपादान तत्पुरुष | मार्ग से भटक गया है। |
इसलिए केवल “से” नहीं, बल्कि उसके अर्थ को समझना आवश्यक है।
4. “का” और “के लिए” में भ्रम कर देना
सम्प्रदान तथा सम्बन्ध तत्पुरुष में यही सबसे बड़ी समस्या होती है।
उदाहरण—
विद्यालय
सही विग्रह—
विद्या के लिए आलय
यदि कोई इसे “विद्या का आलय” लिख देता है, तो समास का प्रकार पूरी तरह बदल जाएगा।
इसी प्रकार—
राजपुत्र
सही विग्रह—
राजा का पुत्र
यहाँ “राजा के लिए पुत्र” कहना अर्थहीन होगा।
5. स्थान और साधन में अंतर न समझ पाना
कुछ विद्यार्थी अधिकरण और करण तत्पुरुष में भी भ्रमित हो जाते हैं।
उदाहरण—
| शब्द | सही विग्रह | समास |
|---|---|---|
| जलमग्न | जल में मग्न | अधिकरण |
| आसनस्थ | आसन पर स्थित | अधिकरण |
| हस्तलिखित | हाथ से लिखित | करण |
| मशीननिर्मित | मशीन से निर्मित | करण |
यदि पहला पद स्थान बता रहा है, तो अधिकरण होगा। यदि पहला पद साधन बता रहा है, तो करण होगा।
समास हिन्दी व्याकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, और उसके विभिन्न भेदों में तत्पुरुष समास का स्थान सबसे प्रमुख माना जाता है। इसका कारण केवल यह नहीं है कि इसके अंतर्गत अनेक प्रकार के सामासिक शब्द आते हैं, बल्कि यह भी है कि हिन्दी भाषा के दैनिक प्रयोग, साहित्य, पाठ्यपुस्तकों तथा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे अधिक प्रश्न इसी समास से पूछे जाते हैं।
इस पूरे अध्याय में हमने तत्पुरुष समास को केवल परिभाषाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसकी संपूर्ण संरचना, निर्माण प्रक्रिया, पहचान, समास-विग्रह, उत्तरपद की प्रधानता, छहों भेदों, उनके उदाहरणों, तुलनात्मक अंतर, सामान्य गलतियों, अभ्यास प्रश्नों तथा महत्वपूर्ण तथ्यों का क्रमबद्ध अध्ययन किया। प्रत्येक भेद को अलग-अलग समझने के साथ-साथ यह भी देखा कि किसी सामासिक शब्द का सही समास निर्धारित करने के लिए केवल शब्द को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके समास-विग्रह और कारक-संबंध को समझना अनिवार्य है।
यदि पूरे विषय का सार एक वाक्य में कहा जाए, तो वह यह होगा कि—
तत्पुरुष समास की सही पहचान का सबसे विश्वसनीय आधार समास-विग्रह है।
जब भी किसी सामासिक शब्द का प्रकार निर्धारित करना हो, तो सबसे पहले उसका विग्रह कीजिए, फिर दोनों पदों के बीच आने वाली विभक्ति पहचानिए और अंत में उस विभक्ति के अर्थ के आधार पर समास का भेद निश्चित कीजिए। यही पद्धति विद्यालयी परीक्षाओं से लेकर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं तक समान रूप से प्रभावी मानी जाती है।
अध्ययन के दौरान यह भी स्पष्ट हुआ कि प्रत्येक तत्पुरुष समास का अपना विशिष्ट आधार है—
- कर्म तत्पुरुष क्रिया के लक्ष्य को व्यक्त करता है।
- करण तत्पुरुष साधन या माध्यम का बोध कराता है।
- सम्प्रदान तत्पुरुष उद्देश्य या प्रयोजन को स्पष्ट करता है।
- सम्बन्ध तत्पुरुष स्वामित्व या संबंध को व्यक्त करता है।
- अधिकरण तत्पुरुष स्थान या आधार का बोध कराता है।
- अपादान तत्पुरुष अलगाव, दूरी या मुक्ति का संकेत देता है।
इन छहों भेदों का अंतर यदि अच्छी तरह समझ लिया जाए, तो किसी भी सामासिक शब्द का वर्गीकरण करना अत्यंत सरल हो जाता है।
अंत में यह याद रखें कि व्याकरण में सफलता केवल सिद्धांत पढ़ने से नहीं मिलती, बल्कि निरंतर अभ्यास से प्राप्त होती है। इसलिए इस अध्याय में दिए गए उदाहरणों, अभ्यास प्रश्नों और पुनरावलोकन सारणियों का नियमित अभ्यास करते रहें। जितना अधिक समास-विग्रह करेंगे, उतनी ही सहजता से समास की पहचान कर पाएँगे।



